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गांधीनगर के विश्व प्रसिद्ध रूपाल में स्थित जगतजननी श्री वरदायिनी माताजी के मंदिर में हर साल की तरह कल पारंपरिक ‘पल्ली महोत्सव’ का अत्यंत भव्य आयोजन किया गया. देश-विदेश से लगभग 20 लाख से अधिक श्रद्धालु माताजी का आशीर्वाद लेने के लिए उमड़ पड़े थे. आधी रात को 12 बजे के बाद पांच दिव्य ज्योतियों वाली ‘पल्ली’ (रथ) गांव के 27 निर्धारित चौकों का भ्रमण करने के लिए निकली. इस धार्मिक यात्रा के दौरान भक्तों ने पल्ली पर करोड़ों रुपये मूल्य के शुद्ध घी का अभिषेक किया, जिससे रूपाल गांव की गलियों और सड़कों पर मानो घी की नदियां बह रही हों, ऐसा दृश्य देखने को मिला.
सुबह जब पल्ली रथ अपने मंदिर लौटा, तो माताजी के दर्शन के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी. गांधीनगर के निकट रूपाल गांव में आश्विन मास की नवमी (आसो नोम) के पवित्र दिन वरदायिनी माताजी के पारंपरिक पल्ली महोत्सव का आयोजन किया गया था. भक्तों ने अपनी मनोकामना पूरी करने और मां वरदायिनी के दर्शन के लिए रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक आयोजित इस शोभायात्रा में पल्ली पर लाखों लीटर शुद्ध घी का अभिषेक किया.
एक अंदाज के मुताबिक करीब 70 से 80 करोड का घी इस बार पल्ली पर चढाया गया. भक्तों की भारी भीड़ और घी के चढ़ावे के कारण गांव की सड़कों पर घी की नदियां बहती हुई दिखाई दीं. यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा लाए गए घी को केन (कंटेनर), डिब्बों और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में एकत्र किया गया था, जिसे बाद में पल्ली पर चढ़ाया गया जिसके कारण सड़कों पर घी की नदी बह रही थी.
क्यों माता की पल्ली सर्वधर्म समभाव का प्रतीक है
पल्ली का अर्थ है माता के लिए लकड़ी का बना, बिना घोड़ों वाला रथ. सबसे पहले पांडवों ने सोने की पल्ली बनाई थी. उसके बाद पाटन के राजा सिद्धराज जयसिंह ने खेजड़ी की लकड़ी से पल्ली बनवाई थी. वर्तमान में रूपाल की पल्ली बनाने के लिए अठारह समुदाय मिलकर काम करते हैं. कहा जा सकता है कि यह पल्ली सर्वधर्म समभाव का प्रतीक है.
पल्ली बनाने के लिए गांव के वाल्मीकि समुदाय के लोग रथ हेतु खेजड़ी का पेड़ काटकर लाते हैं. उससे गांव के लोग माता का पल्ली-रथ गढ़कर तैयार करते हैं. बाद में नाई समुदाय के लोग ‘वरखड़ा’ (एक प्रकार की झाड़ी/पौधे) की टहनियां लाकर रथ के चारों ओर बांधते हैं और उसे कलात्मक ढंग से सजाते हैं. फिर पल्ली-रथ को ‘पल्लीवाला वास’ (निर्धारित स्थान) में ले जाकर वहां माता का गोख (छोटा मंदिर/स्थान) और माता की प्रतिमा स्थापित की जाती है. उस स्थान को शुद्ध (अबोत) करके गंगाजल, गाय के गोबर और गोमूत्र से पवित्र करने के बाद ही पल्ली रखी जाती है.
इसके बाद कुम्हार (प्रजापति) समुदाय के लोग पल्ली पर मिट्टी के पांच कुंडे (पात्र) स्थापित करते हैं. फिर पिंजारा समुदाय के लोग उसमें कपास भरते हैं. पंचाल समुदाय के लोग लकड़ी की कीलें उपलब्ध कराते हैं. माली समाज के लोग माताजी को फूलों की मालाओं से सजाते हैं और इस प्रकार माता का सुंदर ‘पल्ली-रथ’ तैयार होता है. माताजी का प्रसाद पंचोली ब्राह्मण समाज के लोग बनाते हैं, व ‘खिचड़ा’ (नैवेद्य) अर्पित करने के लिए टोकरी (छाब) वाल्मीकि समाज के लोग तैयार करके चावड़ा परिवार के पास पहुंचाते हैं. इस प्रकार, गांव में रहने वाले सभी समुदायों के लोग अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार माता की सेवा करते हैं.
पल्ली की पांडल कालिन परंपरा
पांडव काल से शुरू हुई वरदायिनी माता की परंपरा आज भी रूपाल गांव में जीवित है. हर साल नवरात्रि की नौवीं रात को माता की ‘पल्ली’ का आयोजन होता है. वरदायिनी माता देवस्थान संस्था के अनुसार, पांडव काल की बात करें तो, 12 वर्षों के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान पांडव रूपाल के वन क्षेत्र में आए थे. अर्जुन सहित पांडवों ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र यहां के ‘वरखडा’ वृक्ष के नीचे छिपाए थे और शस्त्रों की रक्षा के लिए मां वरदायिनी की अखंड आराधना की थी.
कुरुक्षेत्र के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद पांडवों, भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी ने आश्विन शुक्ल नवमी के दिन माताजी की सोने की ‘पल्ली’ बनाई, पांच कुंड स्थापित किए, गांव में पल्ली-यात्रा निकाली और पंचबलि यज्ञ किया था. उस समय से लेकर आज तक यह परंपरा श्रद्धापूर्वक निरंतर चली आ रही है.
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