देश की राजनीति में इन दिनों एक नया और बड़ा भूचाल आया हुआ है. मुद्दा जुड़ा है देश के सबसे बड़े सदन यानी लोकसभा से. सरकार चाहती है कि लोकसभा में सांसदों की सीटें बढ़ाई जाएं, महिलाओं को 33% आरक्षण दिया जाए और नए सिरे से चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं (परिसीमन) तय की जाएं. लेकिन इस पर विपक्षी दलों का रुख क्या है और सरकार के साथ इसे लेकर क्या खींचतान चल रही है, आइए इसे समझते हैं.
पूरा मामला क्या है और किरेन रिजिजू ने क्या कहा?
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने एक बड़ा बयान दिया है. उन्होंने साफ किया है कि सरकार लोकसभा और देश की सभी विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने के लिए पूरी तरह से गंभीर है. इसके साथ ही सरकार लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को भी बढ़ाना चाहती है.
रिजिजू ने बताया कि सरकार ने इस बिल को पास कराने के लिए विपक्ष के साथ कई दौर की बातचीत की है और सभी दलों से सकारात्मक सहयोग की उम्मीद जताई है. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखकर उन सभी आरोपों को खारिज कर दिया, जिसमें कहा जा रहा था कि सरकार विपक्ष को नजरअंदाज कर रही है. सरकार ने बातचीत के दौरान डीएमके, समाजवादी पार्टी, वाईएसआरसीपी, एनसीपी (शरद पवार), शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजू जनता दल जैसे कई दलों के साथ बैठकें की हैं.
इस साल अप्रैल में क्या हुआ था?
इस साल 17 अप्रैल को सरकार ‘संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026’ लेकर आई थी. इसका मुख्य मकसद दो बड़े काम करना था. पहला लोकसभा सीटों की अधिकतम संख्या को बढ़ाकर 850 करना और दूसरा साल 2029 के आम चुनावों से ही महिलाओं को 33% आरक्षण देना.
लेकिन खेल तब बिगड़ गया जब संसद में इस पर वोटिंग हुई. इस बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े और विरोध में 230 वोट आए. संविधान संशोधन के लिए जितने बहुमत (दो-तिहाई) की जरूरत होती है, सरकार उतना आंकड़ा नहीं जुटा पाई. इस तरह यह बिल पास नहीं हो सका.
इस हार के बाद सरकार को इससे जुड़े दो अन्य बिल भी वापस लेने पड़े, पहला, जो 2011 की जनगणना के आधार पर सीटों के पुनर्निर्धारण (परिसीमन) को अनिवार्य बनाता था, और दूसरा, जो केंद्र शासित प्रदेशों में इसी तरह के बदलाव लागू करने से जुड़ा था.
प्रमुख विपक्षी दलों का क्या रुख है?
इस पूरे प्रस्ताव पर देश के मुख्य विपक्षी दलों की अपनी-अपनी चिंताएं और राजनीति जुड़ी हुई है. आइए एक-एक कर समझते हैं
कांग्रेस पार्टी का मानना है कि महिलाओं को 33% आरक्षण जरूर मिलना चाहिए, लेकिन इसके लिए लोकसभा की नई सीटें बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है. कांग्रेस चाहती है कि महिलाओं को जो कोटा मिले, वह लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों के भीतर से ही निकाला जाना चाहिए.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी का कहना है कि संसद ने 2023 में ही महिला आरक्षण कानून पास कर दिया था, जिसे बिना किसी देरी के लागू किया जाना चाहिए. राहुल गांधी ने चेन्नई में छात्रों से बात करते हुए लोकसभा सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव को “तमिलनाडु पर हमला” बताया था. कांग्रेस का यह भी तर्क है कि लोकसभा की मौजूदा सीटों की संख्या को अगले 25 सालों तक बिल्कुल नहीं बदला जाना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के समय में सीटों को फ्रीज कर दिया गया था.
समाजवादी पार्टी
लोकसभा में अच्छे खासे सांसद रखने वाली समाजवादी पार्टी इस विधेयक के सख्त खिलाफ है. पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का मानना है कि इस तरह जल्दबाजी में बिना पुख्ता जातिगत और जनसंख्या के आंकड़ों के परिसीमन करना सही नहीं है. इससे उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के राजनीतिक समीकरण और प्रतिनिधित्व पर बुरा असर पड़ सकता है. जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल को देखते हुए एसपी इस प्रस्ताव का समर्थन बिल्कुल नहीं करेगी.
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK)
दक्षिण भारत की प्रमुख पार्टी डीएमके ने अप्रैल में इस संविधान संशोधन बिल के खिलाफ वोट दिया था. पार्टी और वहां के नेताओं का मानना है कि अगर जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाई गईं, तो उन दक्षिणी राज्यों को नुकसान होगा जिन्होंने परिवार नियोजन के नियमों का बहुत अच्छे से पालन किया है. हालांकि, तमिलनाडु की राजनीति में कुछ अंदरूनी उठापटक के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि डीएमके आगे क्या रुख अपनाती है. लेकिन राज्य विधानसभा में उन्होंने पहले ही मांग कर दी है कि मौजूदा 543 सीटों को ही रखा जाए.
तृणमूल कांग्रेस (TMC)
पश्चिम बंगाल की पार्टी टीएमसी ने अप्रैल में इस बिल को हराने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी. हालांकि, हाल ही में बंगाल विधानसभा चुनावों में हार के बाद टीएमसी के भीतर नेतृत्व को लेकर कुछ आंतरिक बगावतें देखने को मिली हैं, जिससे पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर थोड़ी ताकत प्रभावित हुई है. इसके बावजूद, ममता बनर्जी और उनकी पार्टी अभी भी इस संवैधानिक संशोधन विधेयक का जमकर विरोध कर रही है और अन्य विपक्षी दलों से भी इसे संसद में रोकने की अपील कर रही है.
शिवसेना (यूबीटी – उद्धव ठाकरे गुट)
उद्धव ठाकरे की पार्टी भी इस विधेयक के विरोध में खड़ी है. हालांकि पार्टी में टूट के बाद लोकसभा में अब उनके सांसदों की संख्या काफी कम रह गई है, फिर भी उनकी वैचारिक स्थिति इस प्रस्ताव के खिलाफ ही है. उनका मानना है कि सीटों का यह नया गणित महाराष्ट्र जैसे राज्यों के हितों के खिलाफ जा सकता है.
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी – शरद पवार (NCP-SP)
एनसीपी (शरद पवार) इस मामले में थोड़ा अलग और संतुलित रुख अपनाती दिख रही है. पार्टी ने इस बिल का समर्थन करने का थोड़ा संकेत दिया है और कहा है कि सभी राज्यों में सीटों की संख्या में 50% की वृद्धि होनी चाहिए. हालांकि, पार्टी नेता सुप्रिया सुले ने यह भी साफ किया है कि वे कोई भी अंतिम फैसला लेने से पहले अपने अन्य विपक्षी साथियों के साथ इस पर लंबी चर्चा करेंगी, क्योंकि उन्हें भी दक्षिणी राज्यों के हितों की चिंता है.
वामपंथी दल
कम्युनिस्ट पार्टियां (CPI, CPI-M और CPI-ML) इस पूरे संशोधन बिल का पूरी तरह से विरोध कर रही हैं. उनका साफ कहना है कि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और नए परिसीमन की इस कवायद को तुरंत रोका जाना चाहिए और सीटों पर लगी रोक (फ्रीज) को जारी रखा जाना चाहिए.
आगे क्या होगा?
सरकारों और दलों की इस खींचतान के केंद्र में असल में ‘सत्ता और संतुलन’ का खेल है. दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि जनसंख्या नियंत्रित करने के कारण उनकी लोकसभा सीटें कम हो जाएंगी और उत्तर भारत के राज्यों का दबदबा संसद में बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा. वहीं विपक्षी पार्टियां चाहती हैं कि महिलाओं को आरक्षण तो मिले, लेकिन बिना सीटों की संख्या में भारी फेरबदल किए.
सरकार का मानना है कि देश की बढ़ती आबादी के हिसाब से सांसदों का प्रतिनिधित्व बढ़ना जरूरी है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक रूप से अपने खिलाफ एक चाल मान रहा है. अब देखना यह होगा कि सरकार विपक्ष के साथ आम सहमति बनाने में कितनी कामयाब होती है और क्या आने वाले समय में यह बिल दोबारा संसद के पटल पर आ पाता है या नहीं.
संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.
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