टीईटी के विरोध में गुरुवार को शिक्षकों का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने टीईटी को खेल के बीच में नियम बदलने जैसा नियम बताया। शिक्षकों ने राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के बैनर तले डीएम कार्यालय पर प्रदर्शन किया और प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन सौंपा। कहा कि 15-20 साल की निष्कलंक सेवा के बाद योग्यता का नया पैमाना मौलिक अधिकार का हनन है। शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम लागू होने से पूर्व नियुक्त बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षकों पर टीईटी परीक्षा अनिवार्य किए जाने के विरोध में राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (प्राथमिक संवर्ग) की जिला इकाई ने जिलाधिकारी कार्यालय पर विरोध प्रदर्शन किया।
प्रदर्शन का नेतृत्व करते हुए महासंघ के मंडल/जिला अध्यक्ष शांति भूषण वर्मा ने कहा कि आरटीई एक्ट के अस्तित्व में आने से पूर्व सेवा में आए सभी शिक्षक तत्कालीन वैधानिक नियमों के अंतर्गत ही नियुक्त हुए थे। आज ढाई से तीन दशक (25 से 30 वर्ष) की सेवा पूर्ण कर चुके इन अनुभवी शिक्षकों की नियुक्ति को नियम विरुद्ध मानकर उन्हें पुनः परीक्षा के लिए विवश करना पूरी तरह अनुचित है।महामंत्री अकरम हुसैन ने कहा कि विभाग द्वारा शिक्षकों को निरंतर जटिल गैर शैक्षणिक दायित्वों में उलझाकर रखा जाता है। जिला उपाध्यक्ष सचिन शुक्ला ने कहा कि हम तो 15 साल से क्लासरूम के भीतर परिणाम दे रहे हैं। हमारा मूल्यांकन हमारे छात्रों के नतीजों, स्कूल के ”निपुण लक्ष्यों की प्राप्ति और हमारे विभागीय फीडबैक से होना चाहिए। प्रदेश महामंत्री जोगेन्द्र पाल सिंह,अजय पाल सिंह, रमेश चंद्र मिश्रा, सचिन शुक्ला, हरप्रीत कौर, राजकुमार शर्मा, मुकेश कुमार आदि मौजूद रहे।
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