पीएम मोदी के 25 साल से लेकर युवाओं तक… भारत 24 कॉन्क्लेव में क्या बोले केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह? – Bharat24live

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Date: 06-10-26 17:55
नई दिल्ली: भारत24 के कॉन्क्लेव में केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह खास मेहमान के तौर पर शामिल हुए. इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन के 25 साल, उनके काम करने के तरीके, देश में आए बदलाव, युवाओं की आकांक्षाओं, विपक्ष की राजनीति, एसआईआर, लोकतंत्र, स्पोर्ट्स, रोजगार और स्टार्टअप जैसे कई मुद्दों पर सवालों के जवाब दिए.
सवाल: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन के 25 साल पूरे होने पर सेवा पखवाड़ा आप लोग चला रहे हैं. किस तरीके से ग्रास रूट लेवल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इन 25 वर्षों को आप लोग सेलिब्रेट कर रहे हैं और इससे जनता को फायदा क्या होगा?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
नहीं मुझे लगता है सबसे पहले तो हमारे लिए एक बड़ी गर्व की बात है. प्रसन्नता की तो है ही है. लेकिन मुझे लगता है कि एक नया कीर्तिमान है जिसके हम साक्षी बनने जा रहे हैं. कल 25 बरस एज हेड ऑफ गवर्नमेंट मुकम्मल करना. मुझे नहीं लगता कि विश्व में इस तरह का कोई और उदाहरण है. और वह भी एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हो सकता है कम्युनिस्ट कंट्रीज में इस तरह का होता हो या जहां पर मोनार्कीज है वहां हो लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में 25 बरस निरंतर हेड ऑफ गवर्नमेंट रहना मुझे लगता है अपने में एक बहुत बड़ा कीर्तिमान है.
उसको हासिल करने वाले तो एक महान व्यक्तित्व के मालिक नरेंद्र मोदी जी हैं, लेकिन उसके साक्षी बनने वाले हम और आप हैं. तो हमारे हिस्से में यह खुशनुमा पल तो आया.
सवाल: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोजमर्रा के जीवन की आपको प्रभावित भी करती हो और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी करती हो?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
नहीं रोजमर्रा की जिंदगी में मैं समझता हूं अगर संक्षेप में आप कहें तो खैर उनकी ऊर्जा की तो खैर जवाब नहीं जिस तरह की एनर्जी है लेकिन बहुत परिश्रमी एंड साथ ही साथ ही इज अ वेरी गुड लर्नर वि ईच वन ऑफ अस शुड बी.
आप कोई भी विषय लेकर के जाए उनका ब्रीफ करने के लिए तो उन्होंने पहले से ही इस कदर तैयार बैठे होंगे कि आपको एक दो और आईडिया देंगे और आप यह चौंक जाएंगे कि विषय तो मेरा है. विशेषज्ञ मैं हूं. तो मुझे यह आइडिया क्यों नहीं आया जो इन्हें आया?
वो तभी संभव होता है जब कोई व्यक्ति किसी विषय का अध्ययन करके उसमें बिल्कुल खो जाए और उस पर मंथन करे. यह बात बहुत सीखने लायक है उनमें.

सवाल: भारत24 के फ्लैगशिप प्रोग्राम ‘द अनटोल्ड स्टोरीज ऑफ मोदी’ में आपकी भी एक अनटोल्ड स्टोरी ऑफ मोदी हमने चलाई थी. ऐसी कौन सी बात है जो शायद ही किसी को पता हो?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
नहीं लेटेस्ट तो एक ऐसी कहानी है जो शायद स्वयं उनको भी याद ना हो जी के 26 मई 2014 को शपथ ग्रहण हुआ प्रधानमंत्री के रूप में उनका लगभग साय काल 6:00 बजे तो मैं पहले तो आने नहीं वाला था शपथ ग्रहण के लिए क्योंकि मुझे लगा कि यह तो राष्ट्रपति भवन में होता है और वहां तो दो चार बड़े सीनियर लोग रहते हैं लेकिन यहां कार्यालय वालों ने फोन पर मुझे कहा कि नहीं इस बार मोदी जी को लेकर के बहुत ज्यादा उत्साह है तो हो सकता है खुले आंगन में हो हम और इसलिए मैं आ गया यह सोच करके क्योंकि मुझे तुरंत लौटना उसके बाद तो मुझे सुबह सुबह 7:00 बजे यहां जहां मैं ठहरा था वहां फोन आया कि और वहां पर दूसरी तरफ प्रेजिडेंट कमिश्नर थे गुजरात भवन के तो उन्होंने कहा कि प्रेसिडेंट प्राइम मिनिस्टर डेेजिग्नेट वांट्स टू टॉक टू यू ओके तो मैंने कहा नहीं शायद आपको गलती लगी है मेरा तो कुछ लेना देना नहीं ना वास्ता है तो मैंने फोन काट दिया.
तो वो फिर दूसरी बार आया तो फिर उन्होंने मुझे पूछा क्या फला फला बोल रहे हैं जितेंद्र सिंह बोले मैंने कहा मैं बोल रहा रहा हूं. लेकिन मैंने आपको यही रिक्वेस्ट किया कि मैं वो नहीं हूं जिसको आप शायद मिलाने की कोशिश कर रहे हैं.
तो इतनी देर में शायद यह पास ही बैठे होंगे तो उन्होंने फोन ले लिया तो बोले जितेंद्र सिंह वो वही वैष्णो देवी वाले मैंने कहा जी हां तो बस तुम्ही को कह रहे हैं तुम 9:00 बजे आ जाना. गुजरात हो तो ये बात शायद उनको भी याद ना रहा योग क्योंकि इतने व्यस्त है वो.
तो फिर उसके बाद आपने ऐसा सोचा कि वो मैं पहला वाला फोन ये कह के ना काटता कि आप गलत व्यक्ति से बात कर रहे हैं. उस बारे में सोचा आपने फिर उसके बारे में? थोड़ी सी शायद शर्मिंदगी भी महसूस हुई. लेकिन अब क्या है कि हमें तो कोई उम्मीद नहीं थी कि हमें ऐसे बुलावा आएगा या हमें और इस तरह का कभी एंबिशन रखा भी नहीं है. जो जिस दुनिया में थे उसी में थे बल्कि वो फिर मेरे पास कपड़े भी नहीं थे. जी शब्द जाने के लिए. यहीं से कहीं से कोट-वोट लिया पहन के गए.
सवाल: आने वाले 10 साल अगर आप उनकी दूरदर्शिता से समझें इस देश के लिए वो क्या करना चाहते हैं?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
नहीं मुझे लगता है कि अगर आप एक वाक्य में सम अप करें जो आपने बहुत अच्छी बात कही तो उसको अंग्रेजी में यह कह सकते हैं कि प्राइम मिनिस्टर मोदी थिंक्स बिग एंड थिंग्स इन लॉन्ग टर्म ऐसा नहीं है कि वो 5 साल योजना बनाएंगे या एक साल की अभी भी आप देखिए 2047 की योजना बनाते हैं. लॉन्ग टर्म सोचना और बड़े पैमाने पर सोचना.
अब आप देखिए प्रधानमंत्री बनने के बाद बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं है. जब भारत मंडप बना आपका अक्सर यह शिकायत रहती है कि साहब हमारे पास कोई इस तरह का कोई इस तरह का हमारे पास कन्वेंशन हॉल नहीं है जहां पर क्योंकि मैं मेडिकल प्रोफेशन में कई साल कॉन्फ्रेंसेस करता रहा ऑर्गेनाइज हमको दिक्कत आती थी. दिल्ली में ही नहीं था कोई जहां 8100 लोग अकोमोडेट हो जाए जब बड़े डेलीगेट्स बुलाए तो इस तरह की कल्पना करना और बड़ा सोचना.
जहां भी बाहर जाते हैं वो विदेश वहां से भी आइडियाज उठाते हैं वो भी लाके चाहते हैं कि हिंदुस्तान भी उस पर अमल करे तो उस तरह का जैसे मैंने कहा ही इज़ अ वेरी कीन ऑब्जर्वर एंड अ कीन रिस्चर इन माइंड रिसर्च का मतलब यह नहीं है कि आपको पीएचडी करना होता तो हर चीज की गहराई में जाना उसको को समझना हम और उसको किस तरह से अमली जामा पहनाना है और भारत को निखारने के लिए हम तो उनकी विदेश यात्रा भी एक तरह का जो खबरों में आता है सुर्खियों में आता है वो तो एक तरफ रहा लेकिन जो वो वहां से पिकअप करके अपने ज़हन में जो ख्याल और आइडियाज लाते हैं वो चाहे शायद अन कहे रहते हैं लेकिन उनको उनपे जब अमल होता है तो तब समझ में आता है.
बाबा साहब अंबेडकर ने दूसरा यह है कि उन्होंने इन 101 वर्षों में हमारी सोच बदली. हमारा माइंडसेट बदला. मैं तो ये कहूंगा दे ही हैज़ गिवेन अस अ ग्लोबल ग्लोबली कॉम्पिटिटिव माइंडसेट.
हम पहले हम इसी बात से समझौता कर बैठे थे कि ठीक है. अमेरिका है तो टेलीविज़ वहां चल रहा है. यहां तो जब आएगा सो आएगा. वो तो अमेरिका की बात है. 1950 के दशक में अमेरिका में टेलीविज़ चलता था. यहां दिल्ली में तो हमें पहला चित्रहार 1970 में देखने को मिला.
कंप्यूटर है. हां साहब वो बड़े मुल्क है वहां तो होता ही होता है. इंटरनेट भी यहां देर से पहुंचा. कंप्यूटर अब ऐसा नहीं है. अब देखिए यहां पे हमारा क्वांटम मिशन भी है. हम चंद्रयान भी जा रहा है. न्यूक्लियर एनर्जी में भी बहुत आगे हैं. हम देश के बाकी विश्व के बाकी देशों के साथ पर प्रथम कतार में खड़े हैं और बहुत सारी बातों में उनसे आगे भी बढ़ गए.
हम उसका यह नतीजा हुआ और खासतौर से जो हमारी नई पीढ़ी है उनके उनके माइंड सेट में यह कॉन्फिडेंस आया है सेल्फ कॉन्फ कि वी कैन डू इट वी कैन डू इट बेटर देन अदर्स.
सवाल: आज सड़कों पर एक विरोध देखने को मिल रहा है और उसे नाम दिया गया है सेफ डेमोक्रेसी मार्च. एसआईआर का एक ऐसा मुद्दा है जो कहीं पर भी फिलहाल रुकता थमता हुआ नजर नहीं आ रहा. आज के प्रोटेस्ट पर क्या कहेंगे?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
नहीं नहीं वो अनुभव उतना ही है जितना आपने देखा. कुछ ऐसा जो हमने ना देखा हो. उसको छोड़ ही देते हैं.
सवाल: एसआईआर का मुद्दा था और अब उसमें ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक पहुंची है. ऐसे में क्या कहेंगे?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
रिगार्डलेस ऑफ एसआईआर या इलेक्शन कमीशन इसको इस तरह से जोड़ना कि सेव डेमोक्रेसी एक ऐसा देश जिसने भारी बहुमत से तीन बार मोदी जी को प्रधानमंत्री चुना है. ऐसा तो नहीं है कि वह किसी नॉमिनेशन के माध्यम से आए या कोई डिक्टेटरशिप के के विकल्प को इस्तेमाल करके आए हैं.
मोदी जी एक वाहिद एक ऐसा नाम है इस समय देश में अक्रॉस दी पार्टी लाइंस. मैं सिर्फ भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता होने के नाते बात नहीं करता. आप कांग्रेस ले लीजिए, आम पार्टी लीजिए. कौन सी ऐसी पार्टी है? सभी अक्रॉस दी पार्टीज एक व्यक्ति जिसकी एक्सेप्टेबिलिटी पूरे देश में है.
हम नॉर्थ साउथ ईस्ट वेस्ट नॉर्थ ईस्ट तक हम ऐसा कोई प्रधानमंत्री भी नहीं हुआ पहले बहुत सारे प्रधानमंत्री थे यूपी से चुनकर के आते थे उत्तर भारत में उनकी लोकप्रिय होती थी दक्षिण में उनको एक्सेप्टेंस नहीं होती नॉर्थ ईस्ट में ना होता या कोई साउथ से कभी कबभार आ गए तो उसी एक पॉकेट में उनका एक्सेप्टेबिलिटी रहता था वो कई बार कोिशन की पॉलिटिक्स में उभर के आते थे.
यहां तो जमीन से उभरा हुआ एक ऐसा नाम है जिसकी एक्सेप्टेबिलिटी हर जगह है.
मैं 2015 में जब शायद प्रधानमंत्री बनने के बाद इनका पहली बार मेघालय का दौरा था तो मैं वहां था व्यवस्था में तो हमने वहां सरकार भी दूसरी थी. वहां हमें उससे पहले वोट भी नहीं था मिलता. अब तो मिल अब तो सारे प्रदेशों में भी सरकार तो हमें चिंता हो गई. हमने सभा तो मांग ली कि हमारी क्राउड कहां से आएगी.
तो मैंने कहा कि आगे पीछे के प्रदेशों से गाड़ियों का करते हैं व्यवस्था कि प्रधानमंत्री जी आ रहे हैं. पहली बार तो उनको आमंत्रित किया है तो उसकी शोभा भी वैसी रहनी चाहिए.
लेकिन आप हैरान होंगे कि जब वो लैंड हुए हैं स्पॉनटेनियसली स्कूल की बच्चियां छोटी-छोटी अपने वो फ्रॉक पहने हुए जैसे वो कॉन्वेंट स्कूल की यूनिफार्म होती है कतार बना के ह्यूमन चेन बना के चेहरे पर वो मोदी जी का वो मास्क लगा के खड़ी हैं वेलकम करने के लिए.
इतना एंथूजियाज्म था उन बच्चों में भी. इन अ स्टेट व्हिच वाज़ स्टिल नॉट वेरी फमिलियर विद बीजेपी.
हम तो मोदी जी का एक अपना और मुझे लगता है वह हमारा एसेट है. उसी एसेट की वजह से आज भारत की भी मान्यता है बाकी देशों में. हम भारत का वकार इसलिए बनता है कि उनको लगता है कि एक लोकप्रिय नेता 25 साल से जिसने स्थिरता दी है. इसलिए हमारा व्यापार भी बढ़ा दूसरे देशों को हमारे से उम्मीदें भी बढ़ी.
सवाल: एसआईआर को लेकर ट्रस्ट डेफिसिट है. इलेक्शन कमीशन को लेकर अपोजिशन को ट्रस्ट डेफिसिट है. सुप्रीम कोर्ट में हियरिंग चल रही है. ऐसे में कैसे इसका समाधान निकल पाएगा?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
नहीं मुझे लगता है जो संबंधित लोग हैं इस विषय के को हैंडल कर रहे हैं. उनके वो कुछ सोच के रखा होगा. उनके संज्ञान में होगा. तो इस विषय में बहुत ज्यादा जाना भी नहीं चाहता.
सवाल: राजनीति में अपोजिशन का निम्न स्तर पर जाना आज की तारीख में चिंता का विषय है. इसे कैसे देखते हैं?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
बिल्कुल आपने बिल्कुल ठीक कहा. जिस तरह से यह निम्न स्तर है. यह बात शायद इनको समझौता ही नहीं कर पा रहे कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. मोदी जी प्रधानमंत्री हैं और मोदी जी प्रधानमंत्री केवल भारतीय जनता पार्टी के नहीं है. वो उतने ही उनके भी हैं जितने भारतीय जनता पार्टी के तो यह एक इंटेग्रिटी ये एक मर्यादा जो इस लोकतंत्र के लिए एक विशेषता थी भारतीय लोकतंत्र वो अब जाती रही.
अब एक जमाना था जब वाजपेई जी अपोजिशन में थे तो तब भी जो हमारे विपक्ष के लोग थे वो उनकी इज्जत करते थे और वाजपेई जी का भी उसी तरह का था लेकिन अभी ऐसा हुआ है कि विपक्ष हमें हमें विरोधी ना मान के हमें शत्रु मानने लगा और गाली गलौज पे उतर आए और व्यक्तिगत गाली गलौज और यह भी शायद कभी ख्याल नहीं रहता कि हम जिसको गाली दे रहे हैं उसको गाली देने से हमारे हमारे अपनी भी हमारी हमारी छवि को क्षति पहुंचती है विश्व भर में क्योंकि वो व्यक्ति किसी दूसरे दल का ही व्यक्ति नहीं है. प्रधान नहीं है. वो हमारा भी प्रधान है.
हम तो मुझे लगता है कि बहुत ज्यादा चिंतन मंथन की आवश्यकता है. राजनीतिक हलकों में भी.
सवाल: लेकिन बीजेपी भी तो किसी भी तरीके से विपक्ष को देखिए छोड़ती नहीं है.
डॉ. जितेंद्र सिंह:
नहीं राजनीति में तो देखिए राजनीति में राजनीति में छोड़ने का सवाल इसलिए नहीं पैदा होता कि वो तो फिर राजनीति नहीं ना रही उसका नाम जैसे बर्नर शाह ने कहा था आई डोंट लीव एन एनिमी बिहाइंड.
तो राजनीति में आप जाकर अगर जो दूसरा हथकंडा इस्तेमाल करता है तो फिर उसका पलटवार तो करना अनिवार्य हो जाता है.
सवाल: समित माछर की बहादुरी को लेकर विपक्ष ने तारीफ क्यों नहीं की?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
पहले तो इसी मंच से स्मिथ माछर और उनकी बहादुरी के लिए एक बार जोरदार तालियां होनी चाहिए. क्योंकि इंडियन हीरो इंडियन कैप्टन ने 174 लोगों की जान अपनी सूझबूझ से बचाई.
अब देखिए इस तरह को लेकर के भी और आपने कह दिया कि अपोजिशन ने स्मिथ मा की तारीफ की. बिल्कुल नहीं इस विषय में भी अपोजिशन ने कोई दाद नहीं दी. तारीफ नहीं की. जहां विश्व भर में इस बात का जश्न मनाया जा रहा है. इजराइल ने तो एक किस्म की दीपावली मनाई है रूस ने हर देश ने.
लेकिन हमारे यहां क्योंकि विपक्ष को लगता है कि ना मालूम उनकी तारीफ से कोई सत्ताधारी पार्टी को फायदा हो जाएगा.
हालांकि समित कोई भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता नहीं है. सदस्य नहीं है. हम ना ही भारतीय जनता पार्टी ने उसको जहाज में बिठाया था अपना बहादुरी का कारनामा अंजाम करने के लिए.
लेकिन इसका अर्थ ये हुआ कि इतने ज्यादा वो कॉम्प्लेक्स के शिकार हैं वो. इसलिए इस तरह से किया जा रहा है और मुझे नहीं लगता किसी व्यक्ति ने भी इस बात की प्रशंसा की है उनके अपने दल में भी हम कि इस तरह का उनका व्यवहार रहा इस इस विषय को लेकर के समित के विषय को लेकर.
सवाल: प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचर से दिमागी नक्सल का जिक्र किया तो विपक्ष ने ले लिया और कहा कि हम भी दिमागी नक्सल हैं. इसे कैसे देखते हैं?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
हां तो जो तो आप दिमागी नक्सल को खत्म करना चाहते हैं उस सोच को नहीं अच्छी बात है जो जो दिमागी नक्सल है वो स्वयं अपने आप को आइडेंटिफाई करके सामने आ रहे हैं कि हां मैं दिमागी नक्सल हूं मुझे ढूंढने की जरूरत नहीं है.
तो मुझे नहीं लगता है लोग हर चीज समझते हैं हम और प्रधानमंत्री जी ने किस भाव से कहा उस बात को भी समझते हैं. हम तो क्यों उस सोच को समझने में प्रॉब्लम क्या है या सिर्फ ये तय किया है कि हमें विरोध करना है प्रधानमंत्री कुछ कहेंगे बीजेपी कुछ कहेगी.
सोच की प्रॉब्लम ये है कि कांग्रेस पार्टी में एक सेंस ऑफ एंटाइटलमेंट होता है कि पैदा होते ही व्यक्ति प्रधानमंत्री बन जाता है. बल्कि मां की कोख में ही प्रधानमंत्री होता है. लगता है कि प्रधानमंत्री पैदा होने वाला है.
अब परिस्थितियां बदली है. लोकतांत्रिक देश है. कई साल निकल गए. आधी शताब्दी बीत गई. वो इच्छा पूरी नहीं हुई. तो इस तरह से मैं फ्रस्ट्रेशन तो नहीं कहूंगा. दैट्स नॉट अ वेरी काइंड वर्ड लेकिन वो फिर आगे पीछे के ख्यालात आने लगते हैं जो आदमी को थोड़ा सा गुमराह कर देते हैं.
सवाल: आजकल युवाओं को जैसी से क्या अचानक से लगाव हुआ कि नहीं ऐसा नहीं है?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
जय ये तो नाम रख दिया मीडिया ने. वरना हर पीढ़ी में युवा होते हैं. हर पीढ़ी में प्रोटेस्ट भी होते हैं. हर पीढ़ी में आंदोलन भी होते हैं. हर पीढ़ी में शरारतें भी होती हैं. हमारी भी पीढ़ी थी इनसे ज्यादा थी. हम तो रहे ही आंदोलनात्मक मोड़ में. ये तो नाम मीडिया ने बना दिया.
सवाल: आपको लगता है कि आप कैटर कर पाए हैं उस एक वर्ग?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
हां नहीं ये देखिए इसमें तो कोई इंकार नहीं कर सकता कि हमारी इस समय 70% से अधिक आबादी 40 वर्ष से कम है और लगभग उससे भी अधिक होगी जो 30 35 तो एक मेजर चंक ऑफ पॉपुलेशन है.
तो लोकतांत्र एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब आप रीच आउट करते हैं या आउट रीच करते हैं टू एव्री सिटीजन तो जो सबसे बड़ा वर्ग है उसका एक महत्व तो रहता ही रहता है.
लेकिन इसी महत्व को अगर कोई और अपने साथ लाने की कोशिश अगर आप तो आप कहते हैं कि इनका छूट का कार्यक्रम आप देखिए आज तर्क आधारित युग है. मैंने क्या कह दिया वो स्वीकार कर लिया जाए ऐसा भी नहीं और कोई दूसरा कुछ कह दे तो ऐसा भी नहीं.
आप देखिए गत 11 12 वर्षों में युवाओं में भी कितना बदलाव आया है. मैं मैं तो ये कहूंगा कि एक एक वाक्य देयर इज़ अ डेमोक्रेटाइजेशन ऑफ़ ओपोरर्चुनिटी टुडे.
आज आईएएस में छोटे-छोटे कस्बों से बच्चे आ रहे हैं. पहले सिर्फ एलट होता था. वो इसलिए कि उनको ऐसे अवसर मिले, मौके मिले तैयारी करने के. इंटरनेट की कनेक्टिविटी हो गई हर जगह. कोई पैसे खर्चने की आवश्यकता नहीं है. अगर आप में जुनून है तैयारी करने का.
छोटे अभी आपको मैं कई उदाहरण दे सकता हूं. 2 बरस पहले 11थ टॉपर एक बच्ची थी. पहली अटेम्प्ट में ग्रेजुएशन कहां की हुई? कि वो सरहदी जिला है एक पुछ का जो ऑपरेशन सिंदूर में बड़ा मशहूर था. आप अंदाजा लगाइए क्या वहां कोचिंग होगी.
और वो 11th टॉपर मेरे ख्याल 2015 या 16 में एक ट्रांसपोर्टर्स की फैमिली थी जिनका कोई लेना देना नहीं था बहुत ज्यादा सिविल सर्विस उनका एक बच्चा सेकंड टॉपर अमृतसर से.
यानी यह वो बच्चे हैं जिन्होंने कभी सिविल सर्विज की कल्पना नहीं की थी. आजकल टॉपर आपके कहां से आ रहे हैं? हरियाणा से. आप दिल्ली से कश्मीर से पहले तो समझा जाता था कि आईएएस केवल तमिलनाडु केरल और बिहार के लिए है.
हम और इस बार तो मैं इस बात से मुझे हैरानगी हो गई कि आंध्र प्रदेश की तुलना में हरियाणा के बच्चे ज्यादा आए जो पिछले बैच में हम ये क्यों संभव हुआ? इसलिए संभव हुआ कि आपने उनको उस तरह की सुविधा दी.
लड़कियां टॉपर आ रही हैं आजकल हर जगह. 40% इस नए बैच में आईएएस में लड़कियां जहां कहीं 2% होते थे.
यह बदलाव है युवाओं के जो किया हम पूछते हैं क्या किया ये किया शायद ये युवा उस समय को नहीं देखे हुए और हमारा ये फर्ज है कि उनको बार-बार याद करवाएं.
के एक जमाना था कि हम समझते थे कि हमारे जमाने में अगर हमको कोई थीसिस लिखना होता मेरा गाइड कह देता साहब फला किताब है तो मैं पूछता कहां से मिलेगी तो बोले साहब ब्रिटिश लाइब्रेरी हुआ एक बार मेरे साथ ब्रिटिश लाइब्रेरी गए बोले साहब हां किताब तो है लेकिन कोलकाता वाला वो हमारा काउंसलेट ऑफिस ले गया दो महीने लग जाएंगे जब तक वह वापस पहुंची, चार किस्म की लकीरें थी उसमें.
एक नीले रंग की, एक लाल रंग की, हर हर छात्र ने अपनी-अपनी लकीर लगाई थी. हमारे हिस्से में लकीर लगाने की भी जगह नहीं थी.
आज वही आज इतना बढ़िया एक तंत्र हमें दिया है. लार्जेस्ट यूज़र्स ऑफ नेट सब कुछ इसमें है.
मेरे पास एक 12वीं कक्षा पास करके आईआईटी में उसने आईआईटी जेई का इम्तिहान क्लियर किया था. तो मैं इन बच्चों से इसलिए मिलता हूं कि इनसे सीखने को मिलता है और यह भी समझ में आता है कि वो हमारे बारे में क्या सोचते हैं और उनको उनकी क्या जरूरत है.
तो मैंने उसको कहा वो कहां से आई थी? एक उन दिनों काफी मिलिटेंसी थी सात छ सात पांच साल पहले जस्ट बिफोर कोविड और एक आतंक प्रभावित क्षेत्र कश्मीर का वहां से तो उस बच्ची को हमने यहां लाया उसको घुमाया वगैरह भी.
तो 12 12वीं कक्षा क्या होता है? 15 16 साल की बच्ची तो मैंने उसको कहा मैंने कहा बेटे तूने तो कमाल कर दिया ना कोई कोचिंग और घर में भी उस तरह की व्यवस्था नहीं कोई आर्थिक हालात भी नहीं और तूने आईआईटी कर दिया.
तो जानती है उसने क्या किया उसने जेब से ये निकाला और मुझे कहती है कि अंकल 14 आवर्स 8 मंथ्स आईआईटी क्रैक मुझे फार्मूला समझाती है कि 14 घंटे पढ़ाई करनी है 8 महीने लगाओ सिर्फ तेल डाल के ही हो जाता है.
ये कॉन्फिडेंस जो बच्चों में जैसे मैंने कहा भारत के नागरिक में एक सेल्फ कॉन्फिडेंस है वो इस समय युवा में आया है और एस्पिरेशन लेवल भी बड़ा.
ये जो आप कहते हैं साहब वो उन्होंने प्रोटेस्ट किया क्यों किया प्रोटेस्ट बिकॉज़ दे थिंक वी आल्सो डिर्व इट एक तरह का इसका पॉजिटिव एंगल भी है.
हम हमारी पीढ़ी के लोग तो घर में बैठ गए थे कि साहब तो ये तो हमारे हिस्से में नहीं है. अब जो परमात्मा का जो पिछले जन्म का कर्म था और जो परमात्मा ने हमारे मुकद्दर में लिखा था वही है. लेकिन आज वो एस्पिरेशन सर्ज है युवा में.
सवाल: लोकतंत्र में सहमतियों का भी सम्मान होता है. डिफरेंसेस अगर हैं उनका भी सम्मान होता है. इस बदलते सिनेरियो में आपको डायलॉग की जरूरत कितनी नजर आती है?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
नहीं देखिए कैसे हम वो वो जैसे वो कहते हैं कि यू कांट शेक हैंड्स विद अ क्लैप्ड हैंड. हम जब डायलॉग तो तब किया जाता है दूसरी तरफ से भी डायलॉग हो.
अब आप डायलॉग करें और दूसरी तरफ उसे गाली पड़े तो कैसे डायलॉग होगा? अब जैसे पार्लियामेंट में आपने जो दृश्य देखा वहां कहां चर्चा का माहौल है?
तो डायलॉग के तो पक्ष में हम भी हैं. लेकिन डायलॉग तो हैज़ टू हैपन बिटवीन टू पार्टीज. अकेले अपने आप से तो मैं बात करता ही रहता हूं.
सवाल: कुछ उन बातों का जिक्र जो अपने आप से जब ये सिनेरियो चल रहा होता है सर लोकसभा में इतना हंगामा चल रहा होता है राज्यसभा में इतना हंगामा चल रहा होता है तो आपका अंतर्मन आपसे उस वक्त क्या कह रहा होता है?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
बाहर से तो सब कह रहे हैं आपने बहुत अच्छी बात कही मेरे मन में ये खौफ रहता है क्योंकि मैं एक चुना हुआ प्रतिनिधि हूं कि कहीं मैं इसका हिस्सा ना बन जाऊं क्योंकि मेरे लोग मुझे माफ नहीं करेंगे.
मैं बार-बार अपने क्षेत्र से चुनकर आया हूं कि ऐसा क्षेत्र जो पहले कांग्रेस की सीट हुआ करता था और मैंने उनके साथ इस तरह का जुड़ाव रखा है तो मुझे यह बहुत ज्यादा वो हो जाता है कि साहब कहीं इस दृश्य का हिस्सा मुझे ना समझा जाए नहीं तो मेरे लोग माफ़ नहीं करेंगे.
और सच पूछिए तो आम जनता ये पसंद नहीं करती करती है ये शायद लगता है कि अब टेलीविजन की मेहरबानी है कि इतना बढ़ा चढ़ा के दिखाते हैं तो उनको लगता है कि हम सारे नायक बन गए हीरो बन गए लेकिन जो वोटर डालने वाला है वो बोलता नहीं है हम लेकिन समझता सब कुछ है और आपको जाहिर भी नहीं करेगा लेकिन मतदान के दिन वहां सीक्रेट बैलेट है वहां वो अपना जो ओपिनियन है वो दर्ज करा के आता है इन साइलेंट वोटर्स ने.
सवाल: बीजेपी जैसे अभी एक ट्रांजिशन फेस से गुजर रही है. नितिन नबीन आए राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. युवा मोर्चा में रहे. फिर उसके बाद अभी आपने नई कार्यकारिणी का गठन किया. उसमें फीमेल्स का रिप्रेजेंटेशन रहा. उत्तर प्रदेश का चुनाव सबसे क्रूशियल और सबसे पहला चुनाव जो अब 27 में देखने को मिलेगा उसे लेकर पार्टी कितनी आश्वस्त नजर आ रही है?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
नहीं आश्वस्त तो हम पूरी तरह से हैं लेकिन हुआ क्या है कि भारतीय जनता पार्टी एक बड़े संगठन का हिस्सा है और इसकी सदा से इसी तरह की पद्धति रही यहां पर कोई सेंस ऑफ एंटाइटलमेंट नहीं रहता.
यहां कोई पद बड़ा या छोटा नहीं होता. जिम्मेवारी कार्यकर्ता की क्षमता के अनुसार और उस परिस्थिति की जरूरत के अनुसार दी जाती है.
यहां दायित्व परिवर्तन होता है. यहां प्रमोशन या डिमोशन वाली बात नहीं रहती. ये बात शायद कांग्रेस को समझनी है. हम लोग जो उस पद्धति से निकले हैं.
हमें अब चूंकि भारत में उस भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में कभी इस तरह की सरकार नहीं रही. तो पीपल दी अपोजिशन पार्टीज मोस्टली आर गेटिंग यूज्ड टू दिस.
हम तो यह एक एक और इसमें समय-समय पर जो निर्णय लिए जाते हैं बड़े सामूहिक ओपिनियन के साथ लिए जाते हैं.
ये नहीं है कि रसोई में बैठे हुए या डाइनिंग टेबल पर बैठे हुए मां बेटा फैसला कर लेते हैं कि किसको सीट देनी है और किसको क्या बनाना है. तो यहां डवर्स ओपिनियंस के बाद होता है.
हम और इसलिए मुझे लग रहा है कि इनको शायद समझ लेकिन असल में देखा जाए तो भारत की जो इनहेरेंट डेमोक्रेटिक पार्टी है वह भारतीय जनता पार्टी ही है क्योंकि ये भारत की आजादी के बाद इसका जन्म हुआ और भारत की परिस्थितियों को एड्रेस करने हेतु डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ये पार्टी बनाई थी.
हम बल्कि कांग्रेस पार्टी तो फ्रीडम स्ट्रगल की पार्टी थी. महात्मा गांधी का तो यह कहना था कि इसे वाइंड अप कर दो. अब लेकिन उनको क्योंकि आ गया स्वाद लग गया और वह परिवारवाद में चले गए तो देखा जाए तो इनहेरेंटली डेमोक्रेटिक पार्टी तो मात्र एक है हम और यहां पर फैसले भी उसी तरह सामूहिक ओपिनियन के साथ होते हैं.
सवाल: लेकिन सामूहिक फैसले में विपक्ष को आप शामिल नहीं करते. ये नहीं विपक्ष को आरोप लगता रहा?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
ऐसा नहीं है. जैसे मैंने कहा कि बातचीत तब की जाती है जब दूसरा पक्ष भी बातचीत के लिए उसी तरह से तैयार हो.
जब वह अपना ओपिनियन सुबह और शाम में बदलते रहे. खुद ही भूल जाए कि सुबह क्या कहा था.
जैसे कुछ उदाहरण के तौर पर डॉक्टर जितेंद्र सिंह बताइएगा. जैसे आप कह रही थी कि मैं मनाने गया था तो वहां पे भी ऐसे ही हुआ.
पहले कहा जी पार्लियामेंट में चर्चा करो. वो एक घंटा हमसे मशक्कत करवाई. जब वापस लौटे कह दिया ठीक है करवा लेते हैं. बोले नहीं अब त्यागपत्र लाओ. तो उस तरह से नहीं हो पाता. बिकॉज़ उसके लिए भी इंटेग्रिटी चाहिए. हम और कंसिस्टेंसी चाहिए.
सवाल: तो आप लोगों ने चाय पर चर्चा कम कर दी है क्या?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
चाय पे तो चाय का स्वाद लगता है उतने अच्छे तरीके से पहुंच नहीं पा रहा है. तो संभवत शायद वो समन्वय बन नहीं पा रहा है.
अभी फिलहाल लार्जर पिक्चर तो यही दिखती है. नॉट दैट कि मीडिया उसको बढ़ा चढ़ा कर दिखाता है. मुझे लगता है लार्जर पिक्चर तो अभी फिलहाल यही दिखती है कि विपक्ष सरकार की बात सुनने के लिए तैयार नहीं है. सरकार ये कहता है कि हम तो विपक्ष से बात करने को तैयार हैं लेकिन विपक्ष सुनने के लिए तैयार नहीं है.
तो ये एक स्टैंड स्टिल पोजीशन है. इसको कैसे ब्रेक करेंगे? यह तो आने वाले समय में पता चलेगा.
सवाल: स्पोर्ट्स को लेकर बधाई. एशियन गेम्स में भारत जिस तरीके से काबिले तारीफ प्रदर्शन कर रहा है. ये बदलाव भी इन्हीं 12 साल में आया?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
अब स्पोर्ट्स का जो आज स्पोर्ट्स का जो क्षेत्र है सबसे ज्यादा तिरस्कृत था इस देश में. स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट में कोई अधिकारी पोस्टिंग पसंद नहीं करता था. स्पोर्ट्स मिनिस्टर कोई बनना पसंद नहीं करता था.
आज स्पोर्ट्स को इतना एक ऐसा दर्जा मिला, ऐसा रुतबा मिला है कि इट्स बिकम अ मैटर ऑफ़ प्रेस्टीज फॉर अस. और ये भी सोच में बदलाव मोदी जी के आने के बाद हुआ.
सवाल: कुछ ऐसे चैलेंजेस डॉक्टर जितेंद्र सिंह आपकी सरकार देखती है जिनको प्रायोरिटी वाइज अभी पहली दूसरी तीसरी प्राथमिकता देश के लिहाज से कि हमें इसका समाधान निकालना है?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
पहली दूसरी तीसरी कोई चुनौती आप लोग मुझे लगता है क्योंकि 29 में फिर चुनाव होने देखिए बात करनी बड़ी आसान रहती है.
वो विपक्ष भी कह देता है साहब नौकरियां कहां है? नौकरियां दो नौकरियां दो. लेकिन पहली बार एक एहसास गत 10 वर्षों में जागा कि नौकरी का या रोजगार का मतलब केवल और केवल सरकारी नौकरी नहीं है.
हम ये एक फ्यूडल लेगसी से हम आए थे 200 बरस अंग्रेजों का राज देख के तो हमें लगता था कि साहब रोजगार के मतलब कि किसी की नौकरी करनी है.
इन 10 वर्षों में यह प्रयास हुआ है. हम के सरकारी नौकरी से बाहर हटकर के रोजगार के जो प्रावधान उपलब्ध करवाए गए हैं वो उससे भी ज्यादा लोकेलेटिव है.
हम जब ये सरकार आई थी तो उदाहरण के तौर पर हमारे यहां सिर्फ 350 स्टार्टअप थे. आज बढ़कर के उसकी संख्या 2ाई लाख से अधिक हो गई. हम दुनिया में तीसरे दर्जे पर आन खड़े हुए और उसमें से भी महत्वपूर्ण बात ये है कि 50% से अधिक बी टाउन से आते हैं.
दिल्ली, मुंबई, बोर से नहीं आते. छोटे-छोटे कस्बों से, अमृतसर से, सूरत से. यानी ये जो बदलाव है, यही चुनौती थी.
और इसी को आगे मोदी जी बढ़ा भी रहे हैं. कोई ऐसी योजना यह मुद्रा योजना यह जो आपने कहा कि युवाओं के लिए क्या हुआ यह सब अभी हुआ है और युवाओं को भी लगा कि साहब हमें सरकारी नौकरी पर ही पूरी तरह निर्भर नहीं करना है.
तो ये सोच में बदलाव भी इसलिए आया कि हालात में बदलाव लाने की कोशिश की गई और यही हमारे लिए आगे चुनौती रहेगी टू एड्रेस देयर एस्पिरेशन.
जैसे मैंने कहा एस्पिरेशियल सर्ज हुआ और एस्पिरेशियल सर्ज भी कोई बुरी बात नहीं है. वो इसलिए हुआ कि उन्हें लगा कि एक ऐसी सरकार है जो हमारी अपेक्षाओं को पूरा कर सकती है.
वो गालिब का शेर है कि जब तवको ही उठ गई गालिब क्यों किसी का गिला करे कोई तो गिला वहां किया जाता है जहां लगता है इसके पास कोई देने को है. ये देगा भी.
तो मोदी जी के आने के बाद उनको एक भरोसा है. इसीलिए बच्चों में एस्पिरेशन इसीलिए वो और मांगे रखते. पहले तो था माता-पिता भी डांड देते थे. अरे तुझे पता नहीं है तेरे नसीब में है नहीं चुप करके घर बैठ. अब एक कॉन्फिडेंस पेरेंट्स में भी है, बच्चों में भी है.
सवाल: स्काई रूट जैसी प्राइवेट कंपनी को स्पेस सेक्टर में आप लोगों ने आने का मौका दिया. ऐसी प्राइवेट कंपनीज के आने में सबसे ज्यादा श्रेय किसे जाता है?
डॉ. जितेंद्र सिंह:
इसमें भी सबसे ज्यादा श्रेय के लिए आयाम सबसे बड़ा श्रेय प्रधानमंत्री मोदी जी को जाता है. कभी किसी ने कल्पना नहीं की थी कि स्पेस सेक्टर को प्राइवेट प्लेयर्स के लिए खोल दिया जाएगा. ये निर्णय भी 2019-20 में हुआ. एक बड़ा क्रांतिकारी निर्णय था क्योंकि यहां तो लोग समझौता कर बैठे थे कि स्पेस सेक्टर ने तो सरकारी सेक्टर में ही काम करना है. गोपनीयता के पर्दे पे काम करना है. अब तो वो खुल चुका है. ये कोई भी लॉन्चिंग होती है.
वहां पर कम से कम000 एक तो मीडिया वाले होते हैं और 10 15 हजार बच्चे नागरिक देखने को आते हैं. और स्पेस इकॉनमी ऑलमोस्ट ज़ीरो थी. आज बढ़कर के 9 बिलियन यूएस डॉलर हो गई. और जिस तरह से तेज रफ्तार से बढ़ रही है. मुझे लगता है अगले 8 10 सालों में हम 45 बिलियन यूएस डॉलर तक पहुंच जाएंगे.
यानी स्पेस हमारी अर्थव्यवस्था का प्रमुख हिस्सा बना. और अब तो न्यूक्लियर सेक्टर को भी प्राइवेट के लिए खोल दिया गया. तो ये सारे क्रांतिकारी निर्णयों के ही परिणाम स्वरूप ऐसा हुआ है कि आज स्काई रूट या अन्य प्राइवेट प्लेयर्स भी वो मुकाम हासिल कर रहे हैं.
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