वाराणसी, प्रमुख संवाददाता। हरियाणा के करनाल स्थित गेहूं एवं बाजरा अनुसंधान संस्थान में डीएवी पीजी कॉलेज के प्रो. अनूप कुमार मिश्र ने कृषि वैज्ञानिकों, कृषि विद्यार्थियों और किसानों के बीच व्याख्यान दिया। सोमवार को हुए इस विशिष्ट व्याख्यान में प्रो. मिश्र ने ‘भारत की खाद्य सुरक्षा के सामने नई आर्थिक चुनौती’ विषय पर कहा कि भारत की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ रहे गेहूं को अब पोषण सुरक्षा, किसान आय और जलवायु-सक्षम कृषि-अर्थव्यवस्था के नए दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि केवल पर्याप्त अनाज का उत्पादन खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, लेकिन स्वस्थ और सक्षम भारत के लिए कृषि व्यवस्था को पोषण-सुरक्षित और टिकाऊ खाद्य व्यवस्था में परिवर्तित करना होगा।
प्रो. मिश्र ने कहा कि हरित क्रांति के बाद गेहूं ने भारत को खाद्यान्न-अभाव और आयात-निर्भरता से निकालकर आत्मनिर्भरता की राह दिखाई। न्यूनतम समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने गेहूं को केवल कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि किसान आय, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का रणनीतिक आधार बना दिया। अब भारत की खाद्य सुरक्षा का अर्थ बदल रहा है। आज प्रश्न देश में पर्याप्त अनाज की पैदावार का नहीं, बल्कि यह भी है कि देश की थाली कितनी पौष्टिक है। प्रो. मिश्र ने विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के संदर्भ में कहा कि देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में शामिल उत्तर प्रदेश के लिए अब उत्पादन बढ़ाने के साथ गेहूं की पोषण गुणवत्ता बढ़ाना भी कृषि नीति का महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए। गेहूं की उन्नत किस्में आयरन, जिंक और अन्य पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के बीच गेहूं की उत्पादकता पर भी जोखिम बढ़ रहा है। ऐसे में भविष्य की कृषि-अर्थव्यवस्था का लक्ष्य ‘कम पानी, कम संसाधन और अधिक पोषण के साथ अधिक किसान आय’ होना चाहिए।
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