चुनाव आयोग ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया है। फॉर्म 6 नया वोटर बनने के लिए इस्तेमाल होने वाला ऑनलाइन फॉर्म है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान जो अतिरिक्त घोषणा मांगी जा रही थी, वह अलग दस्तावेज है। आयोग ने माना कि ऑनलाइन पोर्टल पर घोषणा को फॉर्म के साथ दिखाने से बदलाव जैसा लग सकता था। इसलिए 21 अक्टूबर से ऑनलाइन प्रक्रिया को दो हिस्सों में बांट दिया गया है- फॉर्म 6 अलग और SIR घोषणा अलग। यह फिजिकल फॉर्म जैसा ही है।
चुनाव आयोग ने हलफनामे में कहा कि फॉर्म 6 में कोई भी बदलाव करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। यह मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत तय है। SIR घोषणा को वैधानिक फॉर्म में शामिल नहीं किया गया था। यह घोषणा ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म 6 के साथ इसलिए दिखाई जाती थी ताकि आवेदक एक ही OTP और इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर से काम पूरा कर सकें।
दरअसल, यह हलफनामा राकेश कुमार सिंह की याचिका के जवाब में दिया गया। याचिकाकर्ता ने फॉर्म 6 में बदलावों को चुनौती दी थी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर सवाल उठाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी किया था।
SIR के दौरान अतिरिक्त घोषणा विवाद का विषय रही। इसमें आवेदक को बताना होता था कि उनका नाम, या उनके माता-पिता/दादा-दादी का नाम, पुराने वोटर लिस्ट में था या नहीं। आलोचकों का कहना था कि इससे पहली बार वोट देने वालों को, खासकर जिनके परिवार पुराने रोल में नहीं थे, परेशानी हो सकती है। यह मामला 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में आया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा था कि कोर्ट ने फॉर्म 6 के किसी बदले हुए वर्जन को मंजूरी नहीं दी है और रिकॉर्ड की जांच करना चाहता है।
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24 जून 2025 के आदेश में बिहार में SIR शुरू करने का निर्देश दिया गया था। इसमें नए वोटरों को फॉर्म 6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणा (Annexure D) देनी होती थी, जिसमें खुद को या अपने माता-पिता को 2002 से पहले के वोटर लिस्ट से जोड़ना था। जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR पूरा हो चुका है, वहां ऑनलाइन फॉर्म 6 से अतिरिक्त घोषणा हटा दी गई है। जहां प्रक्रिया अभी चल रही है, वहां यह जरूरत जारी है।
चुनाव आयोग ने यह भी साफ किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने SIR से जुड़े फैसले अकेले नहीं लिए। सभी तीन SIR आदेश (24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026) तीनों सदस्यों की एकमत से लिए गए थे। हलफनामे को भी तीनों ने मंजूरी दी। आयोग ने कहा कि फाइलें आमतौर पर एक चुनाव आयुक्त से दूसरे तक और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त के पास जाती हैं। जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक मंजूरी ली जाती है और बाद में रिकॉर्ड में दर्ज की जाती है। अलग-अलग आयुक्तों के सुझाव या सवाल अपने आप में आयोग का फैसला नहीं माने जाते।
इससे पहले 29 जुलाई को दो चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर कार्य आवंटन आदेश पर आपत्ति जताई थी। RTI जवाब से पता चला कि कैबिनेट सचिवालय ने अलग-अलग पत्र होने के कारण स्वतंत्र कार्रवाई नहीं की। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 28 जुलाई का कार्य आवंटन आदेश एक अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकारी ने जारी किया था। 30 जुलाई को दोनों चुनाव आयुक्तों के संयुक्त निर्देश के बाद उसे लागू नहीं किया गया। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि अगर कोई अधिकारी अपने अधिकार से बाहर जाकर आदेश जारी करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
देवेन्द्र कश्यप पिछले 13 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अगस्त 2025 से वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं। संस्थान की होम टीम का वह एक अहम हिस्सा हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर उनकी पैनी नजर रहती है। वायरल कंटेंट के साथ-साथ लीक से हटकर और प्रभावशाली खबरों में उनकी विशेष रुचि है।
देवेन्द्र ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2013 में महुआ न्यूज से की। करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने बिहार की राजधानी पटना में रिपोर्टिंग की। इस दौरान राजनीति के साथ-साथ क्राइम और शिक्षा बीट पर भी काम किया। इसके बाद उन्होंने जी न्यूज (बिहार-झारखंड) में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 2015 में ईनाडु इंडिया के साथ डिजिटल मीडिया में कदम रखा। इसके बाद राजस्थान पत्रिका, ईटीवी भारत और नवभारत टाइम्स ऑनलाइन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में कार्य किया।
मूल रूप से बिहार के भोजपुरी बेल्ट रोहतास जिले के रहने वाले देवेन्द्र कश्यप ने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पटना से प्राप्त की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की और MCU भोपाल से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रवास कर रहे हैं।
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