नई दिल्ली। नीट पेपर लीक की कोख से उपजा आंदोलन, सोनम वांगचुक के अनशन से सहानुभूति बटोरने में सफल रहा और अब सोमवार को संसद मार्च में बड़ी संख्या में सड़कों पर छात्र उतरे तो बड़ी संख्या में आई स्वतः स्फूर्त भीड़ ने राजनीतिक दलों को भी चौंकाने का काम किया। यही वजह है कि संसद में छात्रों की आवाज उठाने की होड़ दिखी। अब बड़ा सवाल है कि क्या यह आंदोलन सही दिशा और एजेंडे को व्यापक बनाकर अपना वांछित लक्ष्य हासिल कर पाएगा।
फिलहाल छात्रों का संसद मार्च कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस प्रदर्शन की खास बात यह रही कि इसमें बड़ी संख्या में ऐसे युवा शामिल हुए, जो किसी स्थापित राजनीतिक दल या पारंपरिक छात्र संगठन के बैनर से नहीं जुड़े थे। इसकी वजह से सत्ता पक्ष के नेता सकते में दिखे, वहीं विपक्ष को इस आंदोलन में आई जान से अपनी रणनीति सधती हुई नजर आई।
कई जानकारों का मानना है कि अन्ना हजारे आंदोलन के बाद पहली बार राजधानी की सड़कों पर युवाओं की इतनी बड़ी स्वतःस्फूर्त भागीदारी देखने को मिली है। हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि अन्ना आंदोलन से इसकी तुलना जल्दबाजी है। फिलहाल इतना तय है इस आंदोलन में केवल नीट अभ्यर्थी ही नहीं, बल्कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी, नौकरी की तैयारी कर रहे युवा और भर्ती प्रक्रियाओं से असंतुष्ट बड़ी संख्या में छात्र भी शामिल थे। छिटपुट भागीदारी कुछ राजनीतिक दलों से जुड़े कार्यकर्ताओं की भी रही। लेकिन बड़ा वर्ग ऐसा था जिसका कोई लीडर नहीं था, उन्हें कॉकरोच पार्टी ने एक प्लेटफार्म दे दिया। इस भीड़ ने यह संकेत भी दे दिया है कि युवाओं के आक्रोश को सही तरीके से समझकर नहीं निपटाया गया तो यह कभी भी बड़ा रूप ले सकता है।
सियासी गलियारों में खासतौर पर विपक्ष के बीच सबसे बड़ा सवाल तैर रहा है कि क्या यह आंदोलन केवल तत्काल विरोध तक सीमित रहेगा या फिर एक लंबे जनआंदोलन का रूप ले पाएगा। कई तरह की आशंकाएं भी राजनीतिक दलों के बीच है जिनका उत्तर आने वाले दिनों में मिलेगा। इसके आधार पर ही आगे की घेराबंदी भी नजर आएगी। जानकारों का कहना है कि किसी भी बड़े आंदोलन की सफलता केवल भीड़ जुटाने से तय नहीं होती, बल्कि उसकी संगठनात्मक क्षमता, स्पष्ट नेतृत्व, साझा एजेंडा और दीर्घकालिक रणनीति पर निर्भर करती है। फिलहाल इस आंदोलन में छात्रों का उत्साह तो दिखाई दिया, लेकिन नेतृत्व और भविष्य की रूपरेखा को लेकर कई सवाल अभी भी बने हुए हैं।
राजनीतिक दृष्टि से इस आंदोलन पर सभी दलों की नजर है। विपक्ष के सामने चुनौती यह होगी कि वह छात्रों के मुद्दों के साथ किस तरह खड़ा होता है, जबकि आंदोलन के आयोजकों के सामने यह चुनौती होगी कि वे अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखें। अब तक आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्वतःस्फूर्त भागीदारी रही है, लेकिन समय के साथ किसी भी बड़े आंदोलन में विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक समूहों की सक्रियता बढ़ना स्वाभाविक माना जाता है। आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव को लेकर अभी अलग-अलग तरह के आकलन सामने आ रहे हैं। इसकी दिशा अगले कुछ दिनों में स्पष्ट होगी।
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पंकज कुमार पाण्डेय हिंदुस्तान मीडिया ग्रुप के साथ जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और असिस्टेंट एडिटर हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्हें लगभग 24 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में नेशनल रिपोर्टिंग की है। राजनीति, आंतरिक सुरक्षा, शिक्षा और विदेश नीति से जुड़े मुद्दों पर उनकी विशेष पकड़ मानी जाती है।
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