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दिल्ली की जामा मस्जिद (Jama Masjid, Delhi) के शाही इमाम ने मंगलवार को बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ कथित दुर्व्यवहार को “निंदनीय” बताया है और देश की अंतरिम सरकार से ऐसे कृत्यों को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की अपील की. इसी साल, अगस्त में शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद से ही भारत बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं पर हमलों को लेकर चिंता व्यक्त करता रहा है.
जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने एक बयान में कहा, “एक विश्वसनीय पड़ोसी, बांग्लादेश के करीबी सहयोगी और साझा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षक के रूप में, मैं बांग्लादेश के मौजूदा प्रमुख, नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस से हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी नाइंसाफी को रोकने के लिए तत्काल कदम उठाने की उम्मीद करता हूं.”
बुखारी ने बांग्लादेश में हाल के घटनाक्रमों का हवाला देते हुए कहा कि यूनुस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनकी इंटरनेशनल प्रतिष्ठा बेदाग रहे.
‘हमारा सहयोगी रहा है बांग्लादेश…’
ऐतिहासिक जामा मस्जिद के शाही इमाम ने कहा कि यह भी एक तथ्य है कि अलग-अलग विचारधाराओं वाली वैकल्पिक और विरोधी राजनीतिक ताकतें मौजूद हैं, जो भारत-बांग्लादेश संबंधों के सिलसिले में अपेक्षाकृत प्रतिकूल रुख रखती हैं. उन्होंने हसीना के बाहर निकलने की वजहों का जिक्र करते हुए कहा, “ये ताकतें अब सत्ता में हैं और उन्हें लोकप्रिय समर्थन प्राप्त है.”
बुखारी ने कहा, “बांग्लादेश की स्थापना के बाद से, भारत के नेशनल लीडरशिप, मीडिया, नागरिक समाज और प्रभावशाली हलकों ने शेख मुजीबुर रहमान, उनकी बेटी शेख हसीना और उनकी पार्टी अवामी लीग के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे हैं.
बुखारी ने कहा, “कूटनीति और क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय मामलों और मुस्लिम वर्ल्ड से जुड़े अन्य मामलों के संदर्भ में बांग्लादेश हमेशा हमारे साथ एक करीबी सहयोगी के रूप में खड़ा रहा है.” उन्होंने आरोप लगाया कि हसीना के भारत आने के बाद उनके खिलाफ प्रतिक्रिया में अवामी लीग के मुस्लिम और गैर-मुस्लिम समर्थक दोनों ही उनके निकलने के बाद भड़की अशांति का निशाना बन गए.
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इमाम ने कहा, “इस बिंदु तक, यह बांग्लादेश का आंतरिक मामला बना रहा. हालांकि, हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ चल रहा अन्याय, हमले और एकतरफा कार्रवाई निंदनीय है और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए. ऐसी कार्रवाइयों का कोई औचित्य नहीं है.” उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की सरकार को अपनी आजादी, उसके बाद की विकास प्रक्रिया और देश के लाखों शरणार्थियों के समर्थन और देखभाल के शानदार इतिहास में भारत की भूमिका को स्वीकार करना चाहिए.
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