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‘गुरुग्राम वाले, अब तो नोएडा आ जाओ…’ सोमवार शाम जब भारी बारिश के बाद पूरा दिल्ली-एनसीआर जलमग्न हो गया, तब सोशल मीडिया पर ये तंज तेजी से वायरल होने लगा. वीकेंड पार्टियों के लिए गुरुग्राम का रुख करने वाले नोएडा वासियों ने भले ही इस पर राहत की सांस ली हो, लेकिन गुरुग्राम के लिए ये कोई मजाक नहीं है.
हर बार बारिश होते ही गुरुग्राम पूरी तरह ठप हो जाता है. ठीक ऐसे ही डरावने मंजर दिल्ली के द्वारका से भी सामने आते हैं. सोशल मीडिया पर सामने आईं तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि कैसे बारिश के बाद सड़कें झीलों में तब्दील हो जाती हैं और अंडरपास लबालब भर जाते हैं.
ऐसे में ये सवाल उठता है कि एक ही समय और एक ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के तहत विकसित हुए शहरों में इतना बड़ा अंतर क्यों है? आइए समझते हैं कि नोएडा, गुरुग्राम और द्वारका के ड्रेनेज सिस्टम में क्या फर्क है.
1. नोएडा ने टावर बनाने से पहले नाले बनाए, गुरुग्राम ने किया उल्टा
नोएडा और गुरुग्राम दोनों ही उदारीकरण के बाद की देन हैं, लेकिन दोनों के निर्माण का ढांचा बिल्कुल अलग रहा. नोएडा अथॉरिटी ने पहले जमीन का अधिग्रहण किया, वहां चौड़ी सड़कें, सीवर लाइनें और बड़े ट्रंक ड्रेन्स बिछाए, उसके बाद बिल्डरों को रहने या कमर्शियल यूज के लिए जमीन दी.
इसके अलावा, नोएडा को भौगोलिक रूप से यमुना और हिंडन जैसी दो बड़ी नदियों का प्राकृतिक आउटफॉल मिलता है, जिससे बारिश का पानी तेजी से शहर से बाहर निकल जाता है.
लेकिन गुरुग्राम में प्राइवेट कॉलोनियां और ऊंची-ऊंची इमारतें पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर से पहले बनकर खड़ी हो गईं. गुरुग्राम के पास पानी की निकासी के लिए कोई सीधी नदी नहीं है. यहां का पानी तीन नालों के जरिए नजफगढ़ नाले में जाता है.
अरावली बचाओ सिटीजन्स मूवमेंट की ट्रस्टी और पर्यावरण संरक्षणवादी वैशाली राणा के मुताबिक, ‘गुरुग्राम में लगभग 550 किलोमीटर लंबे स्टॉर्म वॉटर ड्रेन हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर पर अतिक्रमण हो चुका है या वो आगे बंद हैं.’
उन्होंने बताया कि शहर का सबसे अहम 28 किलोमीटर लंबा बादशाहपुर नाला, जो बारिश के पानी को बाहर निकालने का असल जरिया था, उसका 18 किलोमीटर का हिस्सा अतिक्रमण और अवैध निर्माण की भेंट चढ़ चुका है. वो अब केवल एक ‘कूड़ा नाला’ और सीवर बनकर रह गया है.
2. गुरुग्राम ने अपनी ही प्राकृतिक जल-निकासी को कंक्रीट से पाट दिया
गुरुग्राम का भूगोल पानी की निकासी के लिए बेहतरीन था. पूर्व और दक्षिण-पूर्व में स्थित अरावली की पहाड़ियों से उत्तर-पश्चिम में स्थित नजफगढ़ बेसिन के बीच लगभग 60 से 78 मीटर का प्राकृतिक ढलान है. केंद्रीय शहरी विकास मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी अगस्त 2025 में संसद में स्वीकार किया था कि अरावली और नजफगढ़ नाले के बीच का ये 78 मीटर का ढलान प्राकृतिक रूप से पानी को बहाकर ले जाता था.
लेकिन अंधाधुंध शहरीकरण की वजह से पारंपरिक जोहड़, तालाब, प्राकृतिक नाले और बांध गायब हो गए या कंक्रीट के नीचे दब गए.
पर्यावरणविदों के मुताबिक, गुरुग्राम में वन विभाग के रिकॉर्ड में कभी 110 चेक डैम दर्ज थे, जिनमें से अब 20 से भी कम बचे हैं. आधे से ज्यादा शहर को कंक्रीट का जंगल बना दिया गया है. मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता खत्म हो चुकी है. बारिश का पानी जो पहले जमीन के अंदर जाता था, अब बहकर बंद पड़े नालों और सड़कों पर जमा हो जाता है.
3. गुरुग्राम बना ‘टापू’, द्वारका भी क्यों फंसा?
आर्किटेक्ट और अर्बन डिजाइनर दिक्षु सी. कुकरेजा के मुताबिक, गुरुग्राम का विकास ‘कटे हुए टापुओं’ की तरह हुआ. बिल्डरों ने किसानों से जमीन खरीदी और अपनी चारदीवारी के भीतर तो बेहतरीन ड्रेनेज और पंप लगा लिए, लेकिन जैसे ही वो पानी बाहर सड़क पर आता है, आगे मास्टर ड्रेन गायब मिलता है या बंद होता है.
इसके अलावा, गुरुग्राम में जवाबदेही तय न होना सबसे बड़ी समस्या है. यहां मुख्य नाले GMDA संभालता है, स्थानीय नाले नगर निगम (MCG) के पास हैं, और हाईवे का काम NHAI देखता है. इसके अलावा PWD, HSVP और HSIIDC का भी अलग-अलग अधिकार क्षेत्र है. कोई भी एक एजेंसी पूरे शहर की जल-निकासी की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होती.
प्लान्ड होकर भी क्यों डूबा दिल्ली का द्वारका?
दिल्ली के द्वारका की बात करें, तो ये दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) का पूरी तरह प्लान करके बसाया गया उप-शहर है. इसके बावजूद द्वारका में भी गुरुग्राम जैसे हालात देखने को मिलते हैं. इसकी वजह ये है कि द्वारका के मास्टर ड्रेंस और लोकल नालों में भारी सिल्टिंग और अतिक्रमण है.
वहीं, कई सेक्टरों में स्टॉर्म वॉटर नालों का लिंक मुख्य नजफगढ़ नाले से अधूरा छूटा हुआ है. इसके अलावा दिल्ली का ओवरऑल ड्रेनेज मास्टर प्लान दशकों पुराना है, जो एडवांस कंक्रीट बेस्ड निर्माण और भारी बारिश का दबाव झेलने में असमर्थ साबित हो रहा है.
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निष्कर्ष
कुल मिलाकर नोएडा ने मॉनसून को हराया नहीं है, क्योंकि यहां भी पानी भर जाता है. लेकिन इससे बारिश के पानी को बाहर निकलने का रास्ता साफ हो गया है और वो आमतौर पर डूबता नहीं है. लेकिन गुरुग्राम और द्वारका ने या तो बेतरतीब ढंग से ड्रेनेज सिस्टम बना लिए थे या उन्हें पहले से मौजूद नालों का इस्तेमाल करना पड़ा.
नालियां सबकी जिम्मेदारी बन गईं और लेकिन कोई जवाबदेह नहीं बना. जब तक यह नहीं बदलता, हर भारी बारिश के साथ वही पानी भरी सड़कें, फंसी हुई गाड़ियां और ये सवाल उठता रहेगा कि ये सारा पानी कहां जाएगा?
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