बुरी संगति से बेहतर है कि व्यक्ति अकेले रहना सीखे, अकड़ से रिश्तों में दूरी बनती है – Dainik Bhaskar

भास्कर न्यूज | बालोद
समता भवन बालोद में चातुर्मास के दौरान विराजित शासनदीपक अक्षय मुनि मसा ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि आजकल रिश्तों में अकड़ आ गई है और यही अकड़ संबंधों में दूरी पैदा कर रही है। इंसान को अपने जीवन में विनम्रता के साथ रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन में दो धाराएं चलती हैं, एक सकारात्मक और दूसरी नकारात्मक। व्यक्ति को नकारात्मक विचारों से बचते हुए जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अपेक्षाएं जीवन के लिए बोझ हैं। जितनी अपेक्षाएं बढ़ेंगी, उतनी ही परेशानी और विवाद बढ़ेंगे। जिंदगी में सुकून चाहिए तो अपेक्षाओं को कम करना होगा। मनुष्य को आत्मबोध की दिशा में बढ़ना चाहिए। जिस दिन व्यक्ति को अपने भीतर का बोध हो जाएगा, उस दिन जीवन के अनेक बोझ स्वतः हल्के हो जाएंगे। अक्षय मुनि ने कहा कि तन का बोझ बढ़ जाए तो तपस्या करो, मन का बोझ बढ़े तो संवर की ओर बढ़ो और धन का बोझ बढ़ जाए तो दान करो। इंसान को निरंतर दान करते रहना चाहिए। दान से समाज में प्रेम और सहयोग की भावना मजबूत होती है। उन्होंने भगवान महावीर द्वारा बताई गई दान, शील, तप और क्षमा की भावनाओं को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। व्यक्ति दूसरों की गलतियां तलाशने में लगा रहता है, उसे पहले स्वयं की कमियों को देखना चाहिए।
अक्षय मुनिजी ने कहा कि शारीरिक दुख समय के साथ ठीक हो सकता है, लेकिन मानसिक दुख जीवन को प्रभावित कर देता है। मानसिक परेशानी से राहत के लिए व्यक्ति को आध्यात्म की ओर बढ़ना चाहिए। संत-महापुरुषों के सानिध्य से जीवन को सही दिशा मिलती है। उन्होंने कहा कि अपने जीवन का फैसला स्वयं करना चाहिए। अपनी जिंदगी को सकारात्मक रखें और अपनी समस्याओं का समाधान खुद तलाशें। संसार के बहुत से काम न पूरी तरह रुकते हैं और न ही पूरी तरह समाप्त होते हैं, इसलिए व्यक्ति को अनावश्यक चिंता से बचना चाहिए। उन्होंने कहा िक गुरु से ज्ञान, पिता से संघर्ष और मां से ममता मिलती है, बाकी चीजें दुनिया सिखा देती है। बुरी संगति में रहने से बेहतर है कि व्यक्ति अकेले रहना सीखे। आत्मचिंतन से ही आत्मबोध का मार्ग खुलता है।
महिलाओं की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता जैन संत ने कहा कि महिलाओं के कारण ही परिवार, समाज और जिनशासन की व्यवस्था आगे बढ़ रही है। महिलाओं की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। व्यक्ति को दूसरों द्वारा किए गए सहयोग और उपकार को कभी नहीं भूलना चाहिए। पुण्य के उदय में व्यक्ति के जीवन में सुख-सुविधाएं आती हैं, जबकि पाप का उदय होने पर परिस्थितियां विपरीत हो सकती हैं।
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