भारतीय सेना की मांग पर 'जोरावर' लाइट टैंक की सेना में शामिल होने की प्रक्रिया में देरी हो सकती है, क्योंकि इसकी सुरक्षा को और मजबूत किया जा रहा है। इस …और पढ़ें
जोरावर टैंक। (सोशल मीडिया)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत और चीन सीमा (एलएसी) पर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए तैयार हो रहा भारत का पहला स्वदेशी लाइट टैंक ‘जोरावर’ अब कुछ देरी से सेना में शामिल हो सकता है। भारतीय सेना ने इस टैंक की सुरक्षा को और अभेद्य बनाने के लिए इसमें अतिरिक्त सुरक्षा कवच लगाने की मांग की है। इस नए बदलाव की वजह से जो टैंक साल 2027 तक सेना में आने वाला था, अब उसके लिए 2028 या 2029 तक का इंतजार करना पड़ सकता है।
समझिए क्या है देरी की मुख्य वजह?
मिली जानकारी के अनुसार भारतीय सेना चाहती है कि जोरावर टैंक को ‘स्टैनैग लेवल 4’ से भी ज्यादा मजबूत सुरक्षा मिले। स्टैनैग नाटो (NATO) द्वारा तय किया गया एक अंतरराष्ट्रीय पैमाना है, जो बताता है कि कोई टैंक दुश्मनों के हमलों को कितना झेल सकता है। इतना ही नहीं यह भारी मशीन गन की गोलियों और 10 किलो टीएनटी के बारूदी सुरंग धमाकों को आसानी से झेल सकता है।
भारतीय सेना इसे और मजबूत बनाना चाहती है, ताकि यह दुश्मनों के 25mm से 30mm के तोप के गोलों और 155mm आर्टिलरी (तोपखाने) के हमलों के बावजूद सुरक्षित रहे।
बता दें कि टैंक की सुरक्षा बढ़ाने के लिए उसमें भारी आर्मर (लोहे/कवच की परतें) जोड़नी होंगी, जिससे टैंक का वजन बढ़ेगा। लेकिन चुनौती यह है कि लद्दाख जैसे ऊंचे और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में तेजी से चलने के लिए इस टैंक का वजन 25 टन से कम रखना बेहद जरूरी है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) और लार्सन एंड टुब्रो के इंजीनियर अब इसी गुत्थी को सुलझाने में जुटे हैं कि बिना वजन बढ़ाए टैंक को और ज्यादा मजबूत कैसे बनाया जाए।
गौरतलब है कि साल 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ हुए गतिरोध के बाद भारत ने इस लाइट टैंक को बनाने का फैसला किया था, क्योंकि चीन ने वहां अपने ‘टाइप-15’ लाइट टैंक तैनात कर दिए थे। लद्दाख को जीतने वाले महान जनरल जोरावर सिंह के नाम पर बने इस टैंक की खूबियां लाजवाब हैं। इसे रिकॉर्ड 19 महीनों में विकसित किया गया है। यह चीन के टैंक से वजन में हल्का है, लेकिन मारक क्षमता में उसके बराबर या उससे बेहतर है।
इसमें 105mm की ऑटोलोडिंग गन, मशीन गन, रिमोट-कंट्रोल वेपन स्टेशन और खतरनाक ‘नाग मार्क-2’ एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें लगी हैं। इसके अलावा 760 हॉर्सपावर के दमदार इंजन के साथ यह पहाड़ी रास्तों पर 70 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ सकता है।
अभी 25 टन से कम वजन होने के कारण इसे भारतीय वायुसेना के छोटे और मध्यम मालवाहक विमानों (जैसे C-390) के जरिए आसानी से सीधे लद्दाख पहुंचाया जा सकता है। ऐसे में अगर इसका वजन 25 टन से ऊपर गया, तो इसे ले जाने के लिए सिर्फ C-17 ग्लोबमास्टर या इल्युशिन-76 जैसे बहुत बड़े विमानों की ही जरूरत पड़ेगी।
याद दिला दें कि 2020 के तनाव के दौरान भारत ने अपने भारी-भरकम टी-72 और टी-90 टैंकों को इन्हीं बड़े विमानों के जरिए लद्दाख एयरलिफ्ट किया था। गौर करने वाली बात यह है कि भारतीय सेना ऐसे 354 टैंक अपनी सेना में शामिल करने वाली है। शुरुआती 59 टैंकों का निर्माण एलएंडटी (L&T) कंपनी गुजरात के हजीरा प्लांट में कर रही है।
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