India Russia Trade Relation: जैसे ही अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ का तड़का लगाया, रूस ने मौके को भाँपते हुए भारतीय व्यापार को भुने जाने लायक ऑफर दे डाला। रूसी राजनयिक रोमन बाबूश्किन ने साफ शब्दों में कहा अमेरिका दोस्ती के नाम पर टैक्स ठोक रहा है, लेकिन रूस में तो स्वागत है, वो भी डिस्काउंट के साथ।
बाबूश्किन ने प्रेस को संबोधित करते हुए अमेरिका की अर्थनीति को आर्थिक हथियारों की होलसेल दुकान बता डाला। बोले- दोस्ती का मतलब होता है साथ देना, न कि इंपोर्ट ड्यूटी की चाबुक चलाना। रूस, अमेरिका नहीं है न हम दोस्ती में पाबंदी लगाते हैं, न ही टैरिफ का हथियार दिखाते हैं।
रूसी डिप्टी चीफ ने बताया कि भारत को जो 40 फीसदी क्रूड ऑयल सप्लाई रूस कर रहा है वह न सिर्फ जारी रहेगा बल्कि उस पर 5 प्रतिशत एक्स्ट्रा डिस्काउंट भी जारी रहेगा। यानी अमेरिका अगर सप्लाई रोकने की उम्मीद कर रहा था, तो उसे तेल-तर्क की एक और चुटकी मिल गई।
बाबूश्किन के मुताबिक अमेरिका का ये टैरिफ-प्रेम एकतरफा है। ऐसा प्रेम जो महंगे गिफ्ट की जगह महंगे टैक्स देता है। उन्होंने कहा कि डॉलर की साख खुद अमेरिका की नीतियों ने हिला दी है। भारत-रूस व्यापार इस बीच और मजबूत हुआ है। 2030 तक 100 अरब डॉलर पार करना है और हम तैयारी में हैं। भारत से चाहिए चाय, चावल, और फार्मा… अमेरिका रख ले अपनी हॉट डॉग।
रूस ने संकेत दिया कि वह भारत से चाय, चावल, दवाएं और मशीनें आयात बढ़ाना चाहता है। अमेरिका के लिए यह एक और झटका हो सकता है क्योंकि अब देसी चाय रूस में गर्म होने वाली है, जबकि अमेरिकी कॉफी वहीं ठंडी पड़ी रह सकती है।
बाबूश्किन ने भारत के ऑपरेशन सिंदूर का हवाला देते हुए कहा कि यह रूसी हथियारों की रीयल टाइम टेस्टिंग का सुनहरा मौका था। उन्होंने कहा कि एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम समेत अन्य हथियार भारत-रूस मिलकर बनाते रहेंगे। हमारा रक्षा गठबंधन कोई ड्राफ्ट एग्रीमेंट नहीं, ये फील्ड टेस्टेड फ्रेंडशिप है।
उन्होंने बताया कि शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात संभावित है। इसमें व्यापार, तेल और शायद अमेरिकी नीतियों पर एक कप चाय के साथ दो-तीन व्यंग्य भी परोसे जा सकते हैं।
अमेरिका भले ही टैरिफ से भारत को कसने की कोशिश कर रहा हो लेकिन रूस ने तेल, व्यापार और तंज से उसकी चाल को जवाब दे दिया है। दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र और सबसे पुराने ठंडे दोस्त के बीच ये ‘टैक्टिकल पार्टनरशिप’ अब गर्म होती वैश्विक राजनीति में नया आयाम जोड़ रही है। अगर यही हाल रहा तो अगली बार अमेरिका को सिर्फ इंपोर्ट टैक्स ही नहीं इम्पोर्टेंट रिश्तों की भी समीक्षा करनी पड़ेगी।
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