भारत की तरह टैरिफ पर जापान की भी ट्रंप से बिगड़ी बात, क्या चाहता है अमेरिका जिसे मानना मुश्किल? – AajTak

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को दो दिवसीय जापान दौरे पर पहुंचे और उनके दौरे से ठीक एक दिन पहले गुरुवार को जापान ने अमेरिका के साथ अपनी ट्रेड डील को टाल दिया. जापान के व्यापार वार्ताकार रोसेई अकाजावा ने आखिरी समय में अमेरिका का अपना दौरा रद्द कर दिया जिससे टैरिफ को लेकर अमेरिका-जापान का समझौता बेपटरी होता दिख रहा है. यह ऐसे वक्त में हो रहा है जब अमेरिका के साथ भारत की ट्रेड डील विफल हो चुकी है और अमेरिका ने भारत पर 50% का टैरिफ लागू कर दिया है. 
दरअसल, जापान के व्यापार वार्ताकार अकाजावा टैरिफ में ढील दिए जाने को लेकर एक समझौते को अंतिम रूप देने अमेरिका जाने वाले थे. टैरिफ में ढील के बदले में जापान ने अमेरिका में 550 अरब डॉलर निवेश करने की बात कही है लेकिन अब इस समझौते के देरी हो रही है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने बताया कि अकाजावा गुरुवार को अमेरिका जाने वाले थे जहां वो 550 अरब डॉलर के निवेश पैकेज की पुष्ट करते और इस निवेश का पूरा ब्योरा देकर इसे औपचारिक रूप देते.
अमेरिका के वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लटनिक ने भी इसी हफ्ते जापान के 550 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी. लेकिन अकाजावा ने आखिरी वक्त में अमेरिका का दौरा रद्द कर ट्रंप प्रशासन को करारा झटका दिया है.
जापानी सरकार के प्रवक्ता योशिमासा हयाशी ने अकाजावा के अमेरिका दौरा रद्द करने के संबंध में कहा, ‘हमें लग रहा है कि अमेरिका के साथ इस मामले में समन्वय के लिए प्रशासनिक स्तर पर कुछ पॉइंट्स पर चर्चा की जरूरत है. इसलिए, यात्रा रद्द कर दी गई है.’
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले जापान पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा की थी लेकिन जापान ने टैरिफ कम करने के बदले में निवेश का प्रस्ताव दिया जिसे अमेरिका की तरफ से स्वीकार कर लिया गया.
जिस तरह भारत से ट्रंप प्रशासन की बात नहीं बनी, उसी तरह अब जापान और अमेरिका भी टकराव की स्थिति में हैं. जापान लंबे समय से अमेरिका का रणनीतिक सहयोगी रहा है, खासकर सुरक्षा और एशिया-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता के मामले में. लेकिन जब बात व्यापार की आती है तो समीकरण बदल जाते हैं.
ट्रंप प्रशासन ने जापान से निवेश के अलावा यह भी मांग रखी है कि टैरिफ कम करो और अमेरिकी उत्पादों को अपने यहां ज्यादा बाजार दो.
अमेरिका चाहता है कि जापान अपनी ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में अमेरिकी गाड़ियों के लिए दरवाजे खोले. लेकिन जापान की कार इंडस्ट्री बेहद मजबूत और प्रतिस्पर्धी है. वहां टॉयोटा, होंडा और निसान जैसी कंपनियां पहले से ही दुनिया भर में छाई हुई हैं. अगर जापान अमेरिकी कंपनियों को अपनी कार कंपनियों की तरह अवसर देने लगा तो उसकी घरेलू कंपनियों को बड़ा झटका लग सकता है. इसीलिए जापान अमेरिका की मांगें मानने के लिए तैयार नहीं है. 
जापान टैरिफ को 25% से घटाकर 15% करने के एवज में अमेरिका में भारी निवेश को राजी हो गया. लेकिन ट्रंप ने जापानी निवेश को लेकर कुछ ऐसा बयान दे दिया जिससे जापान बेहद नाराज हो गया है और अब इसी का नतीजा है कि जापानी वार्ताकार ने अपना अमेरिका दौरा रद्द कर दिया है.
दरअसल, ट्रंप ने दावा किया था कि जापान की तरफ से आने वाला निवेश पैकेज ‘हमारा पैसा है जिसे हम अपनी इच्छानुसार निवेश कर सकते हैं.’ ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका निवेश का 90 प्रतिशत लाभ अपने पास रखेगा. जापानी अधिकारियों ने इससे असहमति जताई है कहा है कि निवेश तभी होगा जब फायदा बराबर बंटेगा.
जापानी सरकार के प्रवक्ता हयाशी ने राष्ट्रपति ट्रंप के आदेश में संशोधन का भी अनुरोध किया और कहा, ‘हमारा अनुरोध है कि आपसी टैरिफ से संबंधित राष्ट्रपति के आदेश को जल्द से जल्द यथाशीघ्र संशोधित करने के लिए उपाय किए जाएं. हमारा अनुरोध है कि ऑटो पार्ट्स पर टैरिफ कम करने के लिए राष्ट्रपति का आदेश जारी किया जाए.’
जापानी अधिकारियों ने कहा है कि वो निवेश की डिटेल्स पर कोई डॉक्यूमेंट जारी करने से पहले इंतजार करेंगे कि राष्ट्रपति ट्रंप संशोधित कार्यकारी आदेश जारी करें.
जापान की मीडिया आउटलेट क्योदो न्यूज ने कहा है कि अभी यह फैसला नहीं लिया गया है कि व्यापार वार्ताकार अमेरिका जाने का अपना प्रोग्राम कब बनाएंगे. हालांकि, रॉयटर्स का कहना है कि अकाजावा अगले सप्ताह अमेरिका जा सकते हैं.
हालिया कदम से जापान ने साफ कर दिया है कि जापान ट्रंप की टैरिफ स्ट्रैटजी का शिकार नहीं बनने वाला और अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा.
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के फेल होने के पीछे सबसे बड़ी वजह ट्रंप प्रशासन की मनमानी शर्ते थीं जिसे भारत ने मानने से इनकार कर दिया. ट्रंप ने भारत पर पहले 25% का टैरिफ लगाया था. लेकिन बाद में भारत पर अतिरिक्त 25% का टैरिफ लगा दिया गया जो कि 27 अगस्त से लागू भी हो गया है.
ट्रंप ने अतिरिक्त टैरिफ के पीछे भारत के रूसी तेल की खरीद को बताया. हालांकि, भारत ने ट्रंप को आईना दिखाते हुए साफ कह दिया है कि रूसी तेल का सबसे बड़ा खरीददार चीन है और अमेरिका, यूरोप भी रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं. लेकिन निशाना भारत को बनाया जा रहा है जो कि ट्रंप प्रशासन का दोहरा मानदंड है.
टंप अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही भारत को टैरिफ किंग बुलाते रहे हैं. भारत अपनी घरेलू इंडस्ट्री और किसानों की सुरक्षा के लिए कई अमेरिकी प्रोडक्ट्स पर आयात शुल्क यानी टैरिफ लगाया है. लेकिन ट्रंप का कहना है कि यह अनुचित है. वो मांग करते रहे हैं कि अमेरिकी कंपनियों को भारत के बड़े बाजार में बेरोक-टोक एंट्री मिले जो भारत के लिहाज से बिल्कुल सही नहीं है.
व्यापार वार्ता के दौरान अमेरिका मांग कर रहा था कि भारत इलेक्ट्रॉनिक प्रॉडक्ट्स, मेडिकल डिवाइसेज और कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम करे. लेकिन भारत ने साफ किया कि अगर वो आयात शुल्क कम करता है तो घरेलू उद्योगों को बड़ा झटका लगेगा. इन्हीं सब कारणों से दोनों देशों की व्यापार वार्ता विफल हुई जिसके बाद ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ लगा दिया है.
ट्रंप प्रशासन शुरु से ही अमेरिका फर्स्ट की नीति पर आगे बढ़ रा है. ट्रंप का कहना है कि अमेरिका का व्यापार घाटा बढ़ता जा रहा है. व्यापार घाटा यानी अमेरिका दूसरे देशों से ज्यादा खरीदता है और उन्हें कम बेचता है. भारत और जापान दोनों ही देशों के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा ज्यादा है और ट्रंप इस घाटे को कम करने की कोशिश कर रहे हैं.
लेकिन इसके लिए वो टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. वो दूसरे देशों से अपनी शर्तें मनवाने के लिए टैरिफ बढ़ाकर दबाव बना रहे हैं. हालांकि, उनका यह दबाव उनके ही खिलाफ जाता दिख रहा है. जिस तरह भारत ने दबाव में आकर अपने घरेलू हितों से समझौता करने से इनकार कर दिया, अब जापान भी वही कर रहा है और दुनिया के कई देश भी इसी राह पर हैं.
ट्रंप के टैरिफ की वजह से दुनिया के देशों का अमेरिका से विश्वास उठता जा रहा है और उन्होंने अमेरिकी दबाव में आने से साफ इनकार कर दिया है.
एक्सपर्ट्स भी सुझाव दे रहे हैं कि भारत जैसे देशों को अपने ट्रेड पार्टनर्स में विविधता लानी चाहिए. इंफोसिस के पूर्व मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) मोहनदास पई ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए कहा कि भारत को जापान के साथ मुक्त व्यापार वार्ता करनी चाहिए.
वो कहते हैं, ‘ट्रंप किसी की बात नहीं सुनने वाले… वो वही करेंगे जो उनका मन करेगा. वो भारत पर चिढ़े हुए हैं क्योंकि वो रूस को संदेश देना चाहते हैं… भारत को जापान के साथ मुक्त व्यापार समझौता करना चाहिए, वो हमारा दुश्मन नहीं है. हमें जापान के साथ खुलकर व्यापार करना चाहिए. जापान आनेवाले 20 सालों में हर साल 30-40 अरब डॉलर का निवेश कर सकता है.’
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