ममता सरकार के फैसलों पर शुभेंदु का पलटवार, लेटरहेड से हटाई हिंदी-उर्दू भाषा; छिड़ी बहस – Jagran

कृपया धैर्य रखें।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सरकारी लेटरहेड से हिंदी और उर्दू को हटाकर उसे द्विभाषी (बांग्ला-अंग्रेजी) बना दिया है। उन्होंने 'बिस्वा बांग्ला' लोगो क …और पढ़ें
बंगाल में भाषा और प्रतीकों की नई राजनीति शुरू (फाइल फोटो)
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने लेटरहेड से हिंदी-उर्दू हटाई।
‘बिस्वा बांग्ला’ लोगो की जगह ‘अशोक स्तंभ’ को प्रमुखता।
यह कदम बंगाली अस्मिता और राष्ट्रवाद का प्रतीक।
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल में सत्ता परिवर्तन और भाजपा की नई सरकार बनने के बाद केवल एक प्रशासनिक फेरबदल या सरकारी स्टेशनरी में बदलाव मात्र नहीं है, बल्कि यह बंगाल की भावी राजनीति की दिशा तय करने वाला एक बड़ा वैचारिक मोड़ है।
नवनियुक्त मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपने आधिकारिक लेटरहेड से उर्दू और हिंदी को हटाकर उसे एक बार फिर ‘द्विभाषी’ (बांग्ला और अंग्रेजी) बना दिया है। इसके साथ ही उन्होंने ममता बनर्जी सरकार के सबसे पसंदीदा प्रतीक ‘बिस्वा बांग्ला’ का ‘बी’ वाला लोगो को भी हटा दिया है।
मुख्यमंत्री के इस एक फैसले ने राज्य में भाषाई और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक नई बहस को जन्म दे दिया है। साल 2011 में सत्ता में आते ही ममता बनर्जी ने सरकारी लेटरहेड को ‘चतुर्भाषी’ (चार भाषाओं वाला) बना दिया था, जिसके तहत बांग्ला और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी और उर्दू को भी जगह दी गई थी।
करीब डेढ़ दशक पुरानी इस व्यवस्था को पलटकर शुभेंदु अधिकारी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि उनकी सरकार ‘तुष्टीकरण’ के बजाय विशुद्ध ‘बंगाली अस्मिता’ और राष्ट्रीय प्रतीकों को प्राथमिकता देगी।
इस बदलाव का सबसे दिलचस्प और धारदार पहलू प्रतीकों की यह जंग ही है। नए लेटरहेड में ‘बिस्वा बांग्ला’ की जगह राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ को न केवल वापस लाया गया है, बल्कि उसके आकार को काफी बड़ा किया गया है। साथ ही नीचे लिखे ‘सत्यमेव जयते’ के फांट को भी प्रमुखता दी गई है।
भाजपा लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस पर बंगाल में ‘अरबी संस्कृति’ को बढ़ावा देने और तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। भाजपा का मानना है कि 10 प्रतिशत से अधिक उर्दू भाषी आबादी वाले क्षेत्रों में उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा देना इसी राजनीति का हिस्सा था। अब अधिकारी सरकार के इस कदम को भाजपा ‘बंगाली गौरव और पहचान’ की पुनर्स्थापना के रूप में देख रही है।
जानकारों का मानना है कि यह कदम एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। शुभेंदु अधिकारी इसके जरिए ममता बनर्जी के उस बंगाली नैरेटिव को भेदना चाहते हैं, जिसमें भाजपा को अक्सर ‘बाहरी’ या ‘हिंदी पट्टी’ की पार्टी के रूप में चित्रित किया जाता था।
लेटरहेड पर केवल बंगाली और अंग्रेजी को बनाए रखकर उन्होंने खुद को स्थानीय बंगाली हितों का सबसे बड़ा रक्षक साबित करने का दांव खेला है, जबकि राष्ट्रीय प्रतीक को बड़ा करके अपने राष्ट्रवाद के एजेंडे को भी मजबूती दी है। आने वाले दिनों में यह भाषाई और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण बंगाल की राजनीति को और अधिक आक्रामक बनाएगा, इसमें कोई दो राय नहीं है।
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