भास्कर संवाददाता | सारंगपुर
दिगंबर जैन मुनि प्रवर सागर महाराज ने कहा कि संसार में मनुष्य का जीवन भी सूर्य के उदय और अस्त की तरह है। शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अजर-अमर है। आत्मा केवल एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है। इसलिए मनुष्य को शरीर की बजाय आत्मा के कल्याण की चिंता करनी चाहिए। वे सारंगपुर में चल रहे चातुर्मास के दौरान आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद मिथ्यात्व है। सत्य को सही रूप में नहीं समझने और गलत मान्यताओं को सत्य मानने से व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होता जाता है। मिथ्यात्व के कारण मोह, अहंकार, क्रोध और अन्य विकार जीवन में हावी हो जाते हैं। आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना और सही दृष्टिकोण विकसित करना ही जीवन को सार्थक बनाने की पहली सीढ़ी है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को बांस की तरह कठोर और अड़ियल नहीं, बल्कि घास की तरह विनम्र और लचीला होना चाहिए। बाढ़ में बांस उखड़ सकता है, लेकिन घास पानी के बहाव के साथ झुक जाती है और पानी उतरने पर फिर खड़ी हो जाती है। इसी तरह जीवन में सुख-दुख और अनुकूल-विपरीत परिस्थितियां आती रहती हैं। व्यक्ति को अहंकार और हठ छोड़कर परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना चाहिए। उन्होंने कहा कि सुखी जीवन के लिए व्याकुलता छोड़ना जरूरी है। इच्छाओं के पीछे लगातार भागने से मन अशांत रहता है। संतोष, संयम और आत्मचिंतन को जीवन में स्थान देकर शांत मन से जीना चाहिए।
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