मेंटेनेंस के नाम पर अब बिल्डर नहीं कर पाएंगे खेल! रेरा ने जारी किए नए नियम – AajTak

उत्तर प्रदेश में घर खरीदने वालों के लिए अच्छी खबर आई है. अक्सर देखा जाता है कि बिल्डर मेंटेनेंस सिक्योरिटी के नाम पर ग्राहकों से लाखों रुपये जमा करा लेते हैं, लेकिन बाद में उस पैसे का कोई हिसाब-किताब नहीं मिलता. अब इस मनमानी पर लगाम लगाने के लिए यूपी रेरा (UP RERA) ने एक बड़ा फैसला लिया है.
रेरा ने नियमों में बदलाव करते हुए इंटरेस्ट फ्री मेंटेनेंस सिक्योरिटी (IFMS) यानी मेंटेनेंस के नाम पर जमा होने वाले पैसे को लेकर बेहद सख्त और नए नियम लागू कर दिए हैं. ये नियम तुरंत प्रभाव से लागू भी हो गए हैं. इन नए नियमों से घर खरीदारों को काफी फायदा होने वाला है.
नए नियमों के मुताबिक, जब भी आप फ्लैट की रजिस्ट्री कराएंगे, तो बिल्डर जो मेंटेनेंस सिक्योरिटी का पैसा आपसे लेगा, उसे वो अपने पर्सनल या चालू खाते में नहीं रख सकता. बिल्डर को इस पैसे के लिए एक अलग और खास बैंक अकाउंट खोलना होगा. सिर्फ खाता खोलना ही काफी नहीं होगा क्योंकि इस पैसे को उस बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) करना होगा जो सबसे ज्यादा ब्याज दे रही हो. इससे ग्राहकों का पैसा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा और उस पर मिलने वाला ब्याज भी बढ़ता रहेगा.
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किस साइज के फ्लैट पर कितना लगेगा चार्ज?
 
UP RERA ने प्रॉपर्टी के साइज और कैटेगरी के हिसाब से मेंटेनेंस सिक्योरिटी की दरें भी तय कर दी हैं जिससे बिल्डर अपनी मर्जी से मनमाना चार्ज न वसूल सकें. नियमों के मुताबिक
 
RWA या AOAको सौंपना होगा पाई-पाई का हिसाब
बिल्डर अक्सर प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद भी मेंटेनेंस का पैसा दबाकर बैठ जाते हैं. लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा. जैसे ही सोसायटी का कॉमन एरिया (जैसे पार्क, लिफ्ट, क्लब हाउस) निवासियों की संस्था यानी RWA या AOA को सौंपा जाएगा, बिल्डर को मेंटेनेंस सिक्योरिटी का पूरा पैसा RWA या AOA के खाते में ट्रांसफर करना होगा. इसके साथ ही बिल्डर को एक-एक पैसे का लिखित हिसाब देना होगा कि किस फ्लैट मालिक से कितना पैसा मिला, उसमें से कितना खर्च हुआ और अब खाते में कितना बैलेंस बचा है.
पैसे के इस्तेमाल और ऑडिट के कड़े नियम
इस फंड से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल केवल सोसायटी की लिफ्ट, पार्क, जेनरेटर और सामूहिक उपकरणों की मरम्मत या उन्हें बदलने के लिए ही किया जा सकेगा. इस पैसे को रोजमर्रा के दूसरे मेंटेनेंस खर्चों से बिल्कुल अलग रखना होगा. यही नहीं, अब RWA या AOA की भी जिम्मेदारी होगी कि वो इस पैसे के खर्च का पूरा हिसाब-किताब रखे. हर साल एक चार्टर्ड अकाउंटेंट से इसका ऑडिट कराना जरूरी होगा. ऑडिट रिपोर्ट आने के तीन महीने के भीतर इसे सोसायटी की आम सभा (AGM/GBM) में सभी निवासियों के सामने पेश करना अनिवार्य होगा ताकि कोई हेराफेरी न हो सके.
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क्या बोले यूपी रेरा के अध्यक्ष?
UP RERA के अध्यक्ष संजय आर. भूसरेड्डी ने इस फैसले पर कहा कि घर खरीदार ये पैसा सोसायटी की सुविधाओं को लंबे समय तक चालू रखने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई से देते हैं. इसलिए जरूरी है कि ये फंड पूरी तरह सुरक्षित रहे और इसका सही इस्तेमाल हो. नए नियमों से पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी, बिल्डरों की जवाबदेही तय होगी और RWA/AOA की भूमिका और ज्यादा मजबूत होगी.
 
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