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भारत और चीन के बीच करीबी रिश्तों की वकालत करते हुए अमेरिका के जाने-माने अर्थशास्त्री जेफ्री सैक्स ने कहा कि ये दोनों देश मिलकर एक “न्यू वर्ल्ड ऑर्डर” बना सकते हैं, खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका लगातार “अस्थिर” होता जा रहा है.
‘इंडिया टुडे ब्रिक्स राउंडटेबल 2026′ में बोलते हुए सैक्स ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आम धारणा के उलट भारत की सफलता में चीन की बहुत बड़ी हिस्सेदारी है और यही एक मुख्य वजह है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ब्रिक्स समिट के लिए दिल्ली आ रहे हैं.
भारत 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में अपने चौथे ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करने जा रहा है. 2023 में G20 की मेजबानी के बाद यह भारत में होने वाला सबसे बड़ा ग्लोबल इवेंट होगा. इस सम्मेलन की एक खास बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली द्विपक्षीय बैठक होगी. सात साल में शी का यह पहला भारत दौरा होगा और यह दौरा गलवान बॉर्डर पर हुई जानलेवा झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्तों में धीरे-धीरे आ रहे सुधार के माहौल में हो रहा है.
‘भारत को QUAD छोड़ देना चाहिए’
सैक्स ने इस बात पर ज़ोर दिया कि एशिया की इन दो बड़ी ताकतों के बीच करीबी रिश्ते एक ज़्यादा संतुलित और मल्टीपोलर ग्लोबल सिस्टम बनाने में मदद कर सकते हैं. उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि चीन के साथ अपने रिश्तों को मजबूत करने पर ध्यान देने के लिए भारत को QUAD छोड़ देना चाहिए. QUAD, अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया का एक अनौपचारिक समूह है जिसे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए बनाया गया था.
सैक्स ने कहा, “भारत की सफलता में चीन की बहुत बड़ी भागीदारी है. अमेरिका चीन पर दबाव बना रहा है. इससे काम नहीं चलेगा. अब अमेरिका अपनी मनमानी नहीं कर सकता.”
जाने-माने अर्थशास्त्री ने इस बात से भी असहमति जताई कि भारत की तरक्की के लिए चीन को काउंटर करके ही हो सकती है. हालांकि सैक्स ने सीमा विवाद और पाकिस्तान के साथ चीन के रिश्तों से जुड़ी चिंताओं को माना, लेकिन उन्होंने कहा कि दोनों देशों के लिए रिश्ते बेहतर बनाना बहुत ज़रूरी है.
सैक्स ने कहा, “भारत तेजी से विकास की राह पर है. भारत को चीन से कोई खतरा नहीं है.”
साथ ही सैक्स ने यह भी माना कि चीन खुद ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह अमेरिका या ब्रिटेन की जगह लेकर अकेला ग्लोबल लीडर बन सके.
उन्होंने कहा, “चीन ऐसी स्थिति में नहीं है कि ब्रिटेन या अमेरिका की तरह दुनिया को चला सके. हम कई ताकतों वाली दुनिया में रह रहे हैं, जिनमें से भारत एक है.”
सैक्स का कहना है कि इसीलिए ग्लोबल ऑर्डर को नए सिरे से बनाने में भारत, चीन के लिए एक अहम पार्टनर हो सकता है. उन्होंने कहा, “दुनिया को बेहतर ढंग से फिर से बनाने में भारत एक बेहतरीन पार्टनर है. इसीलिए शी भारत आ रहे हैं.”
‘अमेरिका का भ्रम सबसे बड़ा खतरा’
सैक्स ने कहा कि दुनिया के सामने “सबसे बड़ा खतरा” अमेरिका का भ्रम है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “हम एक मल्टीपोलर (बहुध्रुवीय) दुनिया में हैं. अमेरिका की सोच एकतरफा है. यह एक खतरनाक सोच है.”
उन्होंने भारत को आज दुनिया की “चार महाशक्तियों” में से एक बताते हुए कहा कि उन्हें एकतरफ़ा दबदबे के लिए मुक़ाबला करने के बजाय साथ मिलकर रहने की ज़रूरत है.
सैक्स ने तर्क दिया कि अमेरिका को किसी देश को यह नहीं बताना चाहिए कि वह किन देशों के साथ व्यापार कर सकता है. उन्होंने ज़ोर दिया कि ब्रिक्स समिट से अमेरिका को यह संदेश जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, “ब्रिक्स को यह कहना चाहिए कि हम पश्चिम-विरोधी नहीं, बल्कि साम्राज्यवाद-विरोधी हैं. अमेरिका भारत को ईरान या रूस के साथ व्यापार करने के बारे में हुक्म नहीं चला सकता. ब्रिक्स इतना बड़ा है कि वह अमेरिका से शांत रहने के लिए कह सकता है.”
ब्रिक्स समिट के लिए तीन प्राथमिकताएं
जैसे-जैसे भारत ब्रिक्स समिट की मेज़बानी की तैयारी कर रहा है, सैक्स ने इस समूह के लिए तीन प्राथमिकताएं बताईं.
सबसे पहले सैक्स ने कहा कि ब्रिक्स को मल्टीपोलर सिस्टम, खासकर संयुक्त राष्ट्र की रक्षा में ज़्यादा मज़बूत भूमिका निभानी चाहिए. साथ ही इस समूह को “एकतरफ़ा दबदबे वाली वर्ल्ड ऑर्डर” के खिलाफ एक साफ संदेश देना चाहिए.
सैक्स ने कहा, “ब्रिक्स को बहुपक्षीय व्यवस्था का रक्षक होना चाहि. इसकी भूमिका यह होनी चाहिए कि वह डटकर कहे कि हम एकतरफ़ा दबदबे वाली दुनिया को स्वीकार नहीं करेंगे.”
दूसरी, सैक्स ने कहा कि ब्रिक्स को अमेरिका से ईरान युद्ध से “पीछे हटने” और एकतरफ़ा सैन्य हस्तक्षेप का विरोध करने के लिए कहना चाहिए.
तीसरी बात उन्होंने एक ऐसे मल्टी-करेंसी पेमेंट सिस्टम को बनाने की मांग की जो अमेरिका की एकतरफा प्रतिबंध लगाने की क्षमता को सीमित कर सके.
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