मुख्य बातें
Supreme Court Pension Rule: रिटायरमेंट के बाद अगर किसी सरकारी अधिकारी को दोबारा सरकारी पद पर नियुक्ति मिलती है, तो क्या उसे नई नौकरी की पूरी सैलरी के साथ पुरानी नौकरी की पेंशन भी मिल सकती है? इस अहम सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति साफ की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कुछ मामलों में नई नियुक्ति की सैलरी तय करते समय पहले की सरकारी सेवा से मिलने वाली पेंशन को समायोजित करना ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी की पेंशन हमेशा के लिए बंद कर दी जाएगी। अदालत ने साफ किया कि यह मामला उन नियुक्तियों से जुड़ा है, जहां संबंधित सेवा नियमों में ‘Pay Minus Pension’ का प्रावधान मौजूद है।
यह मामला उत्तराखंड लोक सेवा आयोग यानी UPSC (Uttarakhand Public Service Commission) से जुड़ा है। लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) एम. सी. भंडारी भारतीय सेना से 30 अगस्त 2006 को रिटायर हुए थे। इसके बाद उन्हें 3 नवंबर 2006 को उत्तराखंड लोक सेवा आयोग का चेयरमैन नियुक्त किया गया। नई नियुक्ति के बाद उनकी सैलरी तय करते समय उन्हें पहले की सेवा से मिलने वाली ₹17,627 मासिक पेंशन को समायोजित किया गया। आयोग के एक अन्य सदस्य के वेतन के मामले में भी इसी तरह का प्रावधान लागू हुआ। दोनों अधिकारियों ने इस नियम को उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अप्रैल 2010 में रेगुलेशन 7(2) को असंवैधानिक मानते हुए इसे रद्द कर दिया था। अधिकारियों का तर्क था कि पेंशन की राशि को नई नौकरी की सैलरी से घटाना उचित नहीं है, बाद में उत्तराखंड सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एस. वी. एन. भट्टी और एन. वी. अंजारिया की बेंच ने उत्तराखंड सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि संबंधित अधिकारियों की नियुक्ति उस समय लागू सेवा नियमों के तहत हुई थी,े यानी पद स्वीकार करते समय उन्हें उन शर्तों और लाभों की जानकारी थी, जो उस नियुक्ति से जुड़े थे। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति की नियुक्ति में पहले से लागू नियम के तहत वेतन से पेंशन की राशि समायोजित करने का प्रावधान है, तो बाद में उस नियम को चुनौती देना उचित नहीं माना जा सकता।
अधिकारियों ने इस मामले में ‘Equal Pay for Equal Work’ यानी समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत का हवाला दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यहां यह सिद्धांत लागू नहीं होता। दोनों अधिकारियों की सैलरी किसी भेदभाव के कारण कम नहीं की गई थी, बल्कि उनके पद पर लागू सेवा नियमों के अनुसार तय की गई थी। अदालत ने यह भी माना कि अगर पुरानी पेंशन और नई नौकरी की पूरी सैलरी दोनों बिना किसी समायोजन के दी जाएं, तो कुल मिलने वाली रकम उस पद के वास्तविक वेतन से अधिक हो सकती है।
मामले में एक और दलील यह थी कि 16 सितंबर 2008 के ऑफिस मेमोरेंडम को पुरानी नियुक्तियों पर लागू किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि अधिकारियों की नियुक्ति के समय से ही संबंधित सेवा नियम लागू थे। इसलिए 2008 का स्पष्टीकरण इस मामले में नियमों को पीछे की तारीख से लागू करने जैसा नहीं था। इस स्पष्टीकरण में यह भी कहा गया था कि कुछ मामलों में पिछली सेवा की पेंशन को दोबारा नियुक्त किए गए चेयरमैन या सदस्यों के मूल वेतन से समायोजित किया जा सकता है। हालांकि, दिव्यांगता या चोट से जुड़ी पेंशन को अलग रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोनों अधिकारियों ने पद संभालने और लंबे समय तक काम करने के बाद नियम को चुनौती दी। अदालत के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी पद को उससे जुड़े नियमों और शर्तों की जानकारी के साथ स्वीकार करता है, तो बाद में उन्हीं शर्तों पर सवाल उठाने की उसकी क्षमता सीमित हो सकती है। इस मामले में अधिकारियों ने नियुक्ति के दो साल से ज्यादा समय बाद और कार्यकाल खत्म होने के करीब पहुंचने पर कानूनी चुनौती दी थी।
यह फैसला हर रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी पर एक जैसा लागू नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा नहीं कहा है कि रिटायरमेंट के बाद दूसरी नौकरी करने वाले हर व्यक्ति की पेंशन बंद हो जाएगी। इस फैसले का मुख्य संदेश यह है कि अगर किसी दोबारा सरकारी नियुक्ति पर लागू सेवा नियमों में पेंशन को सैलरी तय करते समय समायोजित करने का प्रावधान है, तो सरकार उस नियम के अनुसार वेतन तय कर सकती है। इसलिए रिटायरमेंट के बाद किसी सरकारी पद को स्वीकार करने से पहले कर्मचारी को उस नियुक्ति के सर्विस रूल्स, वेतन संरचना और पेंशन से जुड़े प्रावधानों को ध्यान से समझ लेना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि पुरानी सरकारी सेवा की पेंशन और नई नियुक्ति की सैलरी का मामला हर जगह एक जैसा नहीं होता। सब कुछ उस पद पर लागू नियमों और नियुक्ति की शर्तों पर निर्भर करता है, यानी अगर नियम पहले से मौजूद हैं और नियुक्ति उन्हीं शर्तों के तहत स्वीकार की गई है, तो ‘Pay Minus Pension’ व्यवस्था को केवल समान काम के लिए समान वेतन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।
सर्वेश्वर पाठक अक्टूबर 2022 से ‘लाइव हिंदुस्तान’ में सीनियर कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में बिजनेस और ऑटो सेक्शन के लिए काम कर रहे हैं। सर्वेश्वर बिजनेस और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की खबरों, रिव्यू और गहराई से किए गए एनालिसिस के लिए जाने जाते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्हें 7 साल से अधिक का अनुभव है, जिसमें उन्होंने अपनी मजबूत पकड़ और समझ के जरिए एक अलग पहचान बनाई है। उन्होंने देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री हासिल की और वर्ष 2019 में ईटीवी भारत के साथ अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने दैनिक जागरण और एडिटरजी जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में भी काम किया, जहां उन्होंने अपनी लेखन शैली और विश्लेषण क्षमता को और निखारा।
उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर से आने वाले सर्वेश्वर केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। उन्हें बाल शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और जागरूकता से जुड़े अभियानों में विशेष रुचि है। अपने विश्वविद्यालय के दिनों में उन्होंने महाराष्ट्र के गोंदिया में दो महीने से अधिक समय तक सोशल वेलफेयर से जुड़े कार्य किए, जहां उन्होंने कई स्कूलों और विश्वविद्यालयों के छात्रों को उच्च शिक्षा के प्रति प्रेरित किया। लेखन के अलावा सर्वेश्वर को बचपन से ही क्रिकेट खेलने और डांस का शौक है, जो उनके व्यक्तित्व को संतुलित और ऊर्जावान बनाता है। उनका उद्देश्य सिर्फ खबरें लिखना ही नहीं, बल्कि लोगों को जागरूक और प्रेरित करना भी है।
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