वैराग्य सर्वश्रेष्ठ है! IIT मुंबई से महाकुंभ तक… प्रयागराज की रेती पर दर्शन और ज्ञान बांचने वाले युवा योगी की कहानी – Aaj Tak

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“सादगी, सरलता… एक पिंजरा है. पिंजरे में बैठा पक्षी, जिसे उसने स्वयं बनाया है, अब उड़ने से डरता है. क्या होगा अगर… क्या होगा अगर… क्या होगा अगर… मन रोता है… और मस्तिष्क में उमड़ते-घुमड़ते इन सभी सवालों पर विचार करते-करते सारी ऊर्जा खत्म हो जाती है.”
“पक्षी पिंजरे की खिड़की से देखता है, किसी के स्वयं से मुक्त होने का इंतजार करता है.”
“लेकिन कोई और नहीं है, यह एक पक्षी है जो शून्य में पिंजरे में बैठा है. पिंजरा, शून्य, सब कुछ मन में मौजूद है.”
दर्शन और ज्ञान के ये वाणी उसी संत के हैं जिन्होंने आईआईटी मुंबई से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद साइंस लैब ज्वाइन करने के बजाय संतई, फक्कड़पन और वैराग्य को ज्वाइन कर लिया. 
आज वे महाकुंभ में प्रयागराज में संगम के तट पर भटकते फिरते हैं और जीवन की डोर को सुलझाने की कोशिश करते हैं. उनका एक इंटरव्यू सही मायनों में वायरल हुआ और जब लोगों ने जाना कि जिस आईआईटी में दाखिला लेने के लिए ही प्रतिस्पर्द्धा की पराकाष्ठा है वहां से ग्रेजुएट एक युवा करोड़ों के पैकेज, कॉरपोरेट का आकर्षण छोड़कर संन्यासी बन गया है तो वे स्तब्ध रह गये. 
प्रयागराज की रेती पर बैठे योगी का ज्ञान
ये संन्यासी आज प्रयागराज की रेती पर बैठा है और जीवन-दर्शन की बातें बता-सुना रहा है. ऊपर जो पंक्तियां आपने पढ़ी उसे इन्होंने अपनी अंग्रेजी की पुस्तक ‘A beautiful place to get lost’ में मनाली में बैठकर लिखा है. 
इस संन्यासी का सबसे बड़ा आकर्षण है इनकी जीवन यात्रा. न्यूज 18 से इंटरव्यू में जब इनसे पूछा गया कि इस अवस्था को कैसे प्राप्त हुए तो वे बालकों सा मुस्कुराए और कहा, “ये अवस्था तो सबसे बेस्ट अवस्था है… ही ही ही… ज्ञान के पीछे चलते जाओ, कहां जाओगे, यहीं पर आओगे”
अपनी खिलखिलाती हंसी का रहस्य भी उन्होंने दार्शनिक अंदाज में दिया और कहा- क्या करें दुनिया में कभी भी अंत हो सकता है. हंसते हंसते मरूंगा मैं… नहीं हंसे तो एकदम से लगेगा मैं तो बिजी था? भगवान से कहना पड़ेगा. रुको-रुको टाइम को रोको, मौत  को रोको… शांत भी हो सकते हैं, जरूरी नहीं है हंसना,पर हंसना Blissful स्टेट होता है.
मसानी गोरख,बटुक भैरव, राघव, माधव… कौन सा नाम बताऊं?
जब कुंभ में इनसे नाम पूछा गया तो इन्होंने अपने उत्तर से चकित कर दिया. उन्होंने कहा, “कौन सा वाला नाम, मेरे बहुत सारे नाम हैं, मसानी गोरख,बटुक भैरव, राघव, माधव, सर्वेश्वरी, जगदीश्वरी, जगदीश.”
हालांकि वो यह भी कहते हैं वे स्वयं को न तो संत मानते हैं न ही वैरागी. अभय सिंह के नाम से पढ़ाई लिखाई करने वाला ये इंजीनियर खुद को वैरागी कहलाता पसंद करता है. इसकी वजह भी अभय सिंह बताते हैं. कुंभ में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “संत या साधु कहना विवाद पैदा करता है, फिर लोग पूछते हैं तुमने दीक्षा किससे ली है, संन्यास किससे लिया है, लेकिन मान लो कि तुम अकेले ही ज्ञान की खोज में निकल पड़ो, मुझे एक दुकान वाले ज्ञान मिल गया, चाय गुरु, बिजनेस गुरु.”
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आईआईटी की यात्रा के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, “मैं बहुत छोटे शहर झज्जर का रहने वाला था, 12वीं तक तो IIT का नाम भी नहीं सुना था, फिर स्कूल में कोचिंग के बारे में पता चला, एक साल ड्रॉपकर दिल्ली आया और सेलेक्शन हो गया, माइंड तो शार्प था ही.”
ऑल इंडिया में 731वीं रैंक 
हरियाणा के झज्जर का ये लड़का JEE इंट्रेंस में 731वीं रैंक लाकर पास हुआ. एयरोस्पेस इंजीनियरिंग चुनने की वजह बताते हुए उन्होंने कहा, “पैसा कोई वजह नहीं था, बड़ा कॉलेज होगा तो घरवाले भी दूर जाने देंगे, फिर मैंने देखा कि रैंक के हिसाब से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग सही चीज होगी, मजेदार होगा.नौकरी वगैरह के बारे में नहीं सोचा. ” 
एयरोस्पेस इंजीनियरिंग पढ़ने गये इस लड़के को दर्शन शास्त्र की बातों ने सबसे प्रभावित किया. Post modernism, Epistemology से इनका लगाव बढ़ता गया, ये वो समय था जब आने वाले जीवन की घटनाएं काल के द्वार पर दस्तक दे रही थी. 
आड़ी तिरछी लकीरों, डिजाइनिंग में  इन्हें शुरू से ही रुचि थी. अभय सिंह ने आईआईटी में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के साथ इनकी भी पढ़ाई की. 
आगे की यात्रा के बारे में वो कहते हैं, “आईआईटी के बाद मेरे सामने सवाल था कि लाइफ में अब क्या करना है, इसी का जवाब दूढ़ने के लिए मैं फिलॉसफी पढ़ रहा था, टीचर से मेरी बहुत बहस होती थी, सर आप प्रैक्टिकल तो कुछ बताओ, लाइफ में जिसे यूज कर सकें, थियरी तो ठीक है. इसने ये कहा, उसने वो कहा, लेकिन मैं क्या करूं.” 
इन्हीं सवालों टकराते हुए अभय सिंह को समझ में आया जो चीज तुम्हें पसंद है वो करो. इसमें जिंदगी समर्पित कर सकते हो. यही वजह रही कि इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद डिजाइनिंग Master in Design (MDes)  पढ़ी. बाद में कोचिंग में फीजिक्स पढ़ाया. ये 2012 से 14 की बात है. 
फैशन की टॉप पत्रिका में किया काम
बाबा अभय सिंह ने अपने सपनों को पूरा करने कि लिए आईआईटी की इंटर्नशिप के दौरान 2 महीने तक उत्तराखंड में फोटोग्राफी की. फिर फैशन जगत की प्रसिद्ध पत्रिका Vouge और g q के लिए काम किया.  फैशन फिल्मों में काम किया, एड फिल्में डायरेक्ट की.  
एबीपी से बात करते हुए जब उनसे पूछा गया कि इतने व्यापक अनुभव के बाद ये वैराग्य कैसा? इसके जवाब में इस युवा योगी का उत्तर सचमुच में एक इंसान के अंदर वैराग्य पैदा कर सकता है. उन्होंने सरल भाषा में कहा, “तभी वैराग्य है, तुम देख लेते हो चीजें, इस संसार में ऐसा है, जबतक आप देखते नहीं है तबतक fascination रहता है उस चीज का. तुम्हें लगता होगा ये लोग कैसे होते होंगे, बहुत खुश दिखते हैं, लेकिन आप देखते हैं कि कुछ नहीं है, ये तो ऊपर की नौटंकी है. फिर अपने आप तुम उस चीज से ऊपर उठ जाते हो. कुछ और देखते हैं आगे बढ़ो.” 
डिजाइनिंग के बाद जब नौकरी के क्षेत्र में आए तो पहली नौकरी 12 लाख की मिली. 
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यह युवा संन्यासी हर नई नौकरी से उबता रहा. आखिरकार वे धर्मशाला पहुंचे और यहां जिंदगी की बुनियादी जरूरतें सिखीं. 2017 में वे गंभीर अवसाद में चले गये. दोस्तों की मदद से वे इससे बाहर आए. फिर कनाडा का रास्ता पकड़ा. इसके लिए उन्होंने बेहद मुश्किल परीक्षा ILETS पास की. लेकिन कनाडा में भी वे टिक नहीं सके. इस बीच कोविड भी आ गया. 
इसकी वजह वे खुद बताते हैं, “कोविड की वजह से जिंदगी और भी टेंस हो गयी. मैंने मेडिटेशन की. मेरे अंदर कई सवाल पनपने लगे, जैसे मेरे अंदर शक्ति क्यों नहीं आ रही है, मुझे पता था मैं कर सकता हूं पर कर नहीं पा रहा था.मैं इनके बारे में लगातार सवाल पढ़ रहा था.” 
इसके बाद वे अभय सिंह वापस इंडिया की टिकट पड़ी. ये 2021 का समय था. 
इस संन्यासी के अनुसार उनके घर में अशांति थी. कलह होता रहता था. वे बताते हैं कि मानसिक तनाव की अवस्था में इंसान तीन चीजें करता है, फाइट, फ्लाइट या फ्रीज. मैं फ्रीज वाली स्थिति में चला जाता था. लेकिन मैं इस अवस्था में नहीं जाना चाहता था. 
गर्लफ्रेंड और माता-पिता 
अभय सिंह के अनुसार अपने स्वभाव की वजह से उनका अपने माता पिता से टकराव हुआ. उन्होंने कहा कि कई बार घर वाले पुलिस बुला लेते थे और कहते थे कि इसे ले जाओ. अच्छा हुआ मैं इससे बाहर निकल पाया. वे अपने वीडियो में इसे पैरेंटल ट्रैप कहते हैं. वो कहते हैं कि माता पिता भगवान नहीं है. उन्हें भी भगवान ने बनाया है. सतयुग वाला कॉन्सेप्ट कलियुग में प्रयोग नहीं हो सकता है. उन्होंने कहा है कि जब मां बाप अहंकार और स्वार्थ ये युक्त होकर अपने आप को भगवान मान लेते हैं तभी नरसिम्हा भगवान आकर उनके अहंकार का विनाश करते हैं.  
न्यूज 18 से बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी बताया कि आईआईटी मुंबई में उनकी महिला मित्र भी रही हैं और ये सहज स्वभाविक है. 
शन्यू की अवस्था के बाद जागता है इंसान
वे बताते हैं कि जीवन में कई मौके आए जब लगता था कि मेरी मृत्यु हो जाएगी. लेकिन तभी लगा कि हो जाएगी तो जाएगी. इसके बाद मुझे मन से परे दिखने लगा. ये उनके लिए जागृति का समय था. वे कहते हैं- 2021 में मुझे लगा कि जिस चीज को धर्म कहते हैं, सत्य कहते हैं उसे लेकर आना है. इसके बाद मैंने विष्णु स्तुति सुननी शुरू की, एकतारा बजाना शुरू किया. ट्रूथ सीरीज शुरू किया.”
इसके वीडियो अभय सिंह के इंस्टा अकाउंट पर मौजूद हैं. वो कहते हैं मैं सदगुरु के पास गया. नौ महीने सदगुरु के आश्रम में रहा. वहां मेरा अहंकार कटता गया. कहां आईआईटी मुंबई और कनाडा का लड़का, कहां सदगुरु का आश्रम. 
अभय सिंह कहते हैं कि उन्होंने सारी धर्मों की किताबें पढ़ी. कुरान, हदीस, बौद्ध धर्म की किताबें. चीन, इजिप्ट का इतिहास, भौतिकी, विज्ञान, गणित, सांख्यिकी, वास्तुशास्त्र, ज्योतिषी सब कुछ पढ़ डाला.  ये है क्या? मैं ठंडे पानी से नहाने का अभ्यास करता. हाथ सिकुड़ जाता, कांपने लगता. 
सब महादेव डायरेक्ट कर रहे हैं
उन्होंने बताया कि मैंने मनाली से पदयात्रा शुरू की, खीरगंगा गया, पूरा छान डाला, सब महादेव डायरेक्ट कर रहे थे. वो सिखा भी रहे थे. मुझे फर्स्ट हैंड अनुभव मिला कि ये जिंदगी जीना क्या होता है. केदारनाथ देखा, धुनी लगाना, चिमटा रखना सब सीखा. उत्तराखंड में चारों धामों की यात्रा की , सब पैदल, हर दिन 20 किलोमीटर, कान में कुछ वीडियो लगा लेता था ज्ञान की, फिर चलते जाओ, प्रकृति की दी चीजें खाते जाओ. 
अभय सिंह कहते हैं कि अभी कनाडा की कमाई काम कर रही है. वहां डॉलर में कमाया था. वही पैसा चल रहा है. कभी कभी मैं महादेव को कहता था पैसे खत्म हो जाएंगे तो कहते हैं अभी तो है न खर्च करो. तुम बस अपने कर्तव्य पर ध्यान दो. 
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