द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका ने विश्व समुदाय को यह एहसास कराया कि दुनिया की रक्षा के लिए विश्व में एक प्रभावी, मजबूत एवं निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय संगठन का होना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से 24 अक्तूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई और चार्टर को मान्यता दी गई। वर्तमान में इस संगठन के 193 सदस्य देश हैं। कहना गलत नहीं होगा कि संयुक्त राष्ट्र केवल राष्ट्रों का ही संगठन नहीं है, बल्कि वैश्विक शांति, बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा मानव भविष्य की सामूहिक आकांक्षा का प्रतीक है। आज जब पूरा विश्व युद्ध, भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, जलवायु संकट, आतंकवाद, आर्थिक असमानता और विभिन्न तकनीकी एवं अन्य चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और प्रासंगिकता पर विचार करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
इसका काम विश्व के विभिन्न देशों के बीच आपसी सहयोग और मित्रता को बढ़ावा देना है। यह संगठन अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने या यूं कहें कि देशों के बीच विवादों का शांतिपूर्ण समाधान, कूटनीतिक संवाद, शांति स्थापना और संघर्षों की रोकथाम करने, युद्धों को रोकने, मानवाधिकारों की रक्षा करने तथा गरीब और जरूरतमंद देशों की सहायता करने और वैश्विक सामाजिक-आर्थिक विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इतना ही नहीं यह संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के क्षेत्र में भी कार्य करता है। इसके अलावा, यह प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय संकटों (जैसे कि युद्ध, विस्थापन, महामारी और प्राकृतिक आपदाओं) के समय प्रभावित लोगों को सहायता प्रदान करता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून का विकास करने में भी इस संगठन की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। दरअसल, यह संगठन राष्ट्रों के बीच नियम-आधारित व्यवस्था, संधियों और कानूनी सहयोग को प्रोत्साहित करता है। इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन से निपटने, जैव-विविधता बचाने और सतत विकास को बढ़ावा देने या यूं कहें कि पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी इस संगठन की भूमिका बहुत विशेष है।
पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में ही नहीं, विभिन्न वैश्विक समस्याओं जैसे कि स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी चुनौतियों पर सामूहिक कार्रवाई के लिए भी यह संगठन मंच उपलब्ध कराता है। कुल मिलाकर, यह बात की जा सकती है कि, संयुक्त राष्ट्र विश्व में शांति, सुरक्षा, समानता और सहयोग स्थापित करने का प्रयास करता है।
सुनील कुमार महला, टिप्पणीकार
द्वितीय विश्वयुद्ध की विनाशलीला और वैश्विक त्रासदी के बाद अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और सहयोग स्थापित करने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी। विडंबना है कि इसकी प्रभावशीलता और प्रासंगिकता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। जिस संस्था का मूल उद्देश्य दुनिया को युद्ध की विभीषिका से बचाना था, वही आज असहाय दिखाई देती है।
विडंबना यह है कि वैश्विक शांति बनाए रखने की विशेष जिम्मेदारी रखने वाली शक्तियों के बीच ही गंभीर मतभेद देखने को मिलते हैं। फ्रांस में गृह युद्ध की स्थिति, रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-ईरान, इजरायल-हमास सहित आधी दुनिया युद्ध की स्थिति से गुजर रही है। ऐसे संघर्षों को रोकने या सुलझाने में संयुक्त राष्ट्र असमर्थ रहा है। सुरक्षा परिषद में वीटो के इस्तेमाल और स्थायी सदस्यों के परस्पर विरोधी हितों के कारण अनेक प्रस्ताव प्रभावी कार्रवाई में नहीं बदल पाते।
संयुक्त राष्ट्र की संरचना में सुधार की मांग भी लंबे समय से उठ रही है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप सुरक्षा परिषद का विस्तार और प्रतिनिधित्व अधिक न्यायसंगत बनाना आवश्यक है। भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील जैसे देश स्थायी सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी पेश करते रहे हैं। इसके बावजूद, दशकों से लंबित सुधार प्रक्रिया संगठन की निर्णय क्षमता और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना केवल राष्ट्रों को एक मंच पर लाने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया को युद्ध से बचाने के लिए हुई थी। यदि वह अपने मूल उद्देश्य को प्रभावी ढंग से पूरा नहीं कर पाता, तो सदस्य देशों की बढ़ती संख्या के बावजूद उसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठते रहेंगे।
विनोद कुमार विक्की, टिप्पणीकार
वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र कई अभूतपूर्व और जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है। तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था, महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता और नए प्रकार के संकटों ने इसके कामऔर प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सुरक्षा परिषद में प्रमुख शक्तियों द्वारा वीटो पावर के दुरुपयोग और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के कारण यह वैश्विक संघर्षों में त्वरित निर्णय लेने में अक्सर विफल रहता है। इसके अतिरिक्त, 1945 के पुराने ढांचे में वर्तमान विश्व व्यवस्था के अनुसार उचित प्रतिनिधित्व का अभाव है, जिसके ढांचागत सुधार की मांग लगातार हो रही है। यह संस्था गहरे वित्तीय संकट, संसाधनों की कमी, जटिल नौकरशाही और सदस्य देशों द्वारा राष्ट्रीय संप्रभुता के नाम पर मानवीय हस्तक्षेप के विरोध जैसी समस्याओं से भी जूझ रही है।
दीपक कुमार, टिप्पणीकार
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