संतान की लंबी उम्र के लिए कब रखें अहोई अष्टमी व्रत? जानें तारीख, पूजा विधि और जरूरी नियम – Bharat24live

Rashmi Singh
Date: 28-10-26 14:37
Ahoi Ashtami 2026: हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी जीवन की कामना के लिए रखा जाता है. इस दिन माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं और अपने बच्चों की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं. यह पर्व करवा चौथ के चार दिन बाद मनाया जाता है. हर साल की तरह इस बार भी व्रत की तारीख और पूजा के शुभ समय को लेकर लोगों के बीच असमंजस है.
साल 2026 में अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर को रखा जाएगा या 2 नवंबर को, इसे लेकर पंचांग की तिथियों को समझना जरूरी है. अगर आप भी इस व्रत की तैयारी कर रही हैं, तो यहां जानिए अहोई अष्टमी की सही तारीख, पूजा का शुभ मुहूर्त, तारों को अर्घ्य देने का समय और व्रत से जुड़े जरूरी नियम.
अहोई अष्टमी 2026: 1 या 2 नवंबर, किस दिन रखा जाएगा व्रत?
हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2026 में अहोई अष्टमी का व्रत रविवार, 1 नवंबर को रखा जाएगा. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस व्रत में शाम के समय अष्टमी तिथि के दौरान अहोई माता की पूजा करना और तारों को अर्घ्य देना विशेष महत्व रखता है. इस वर्ष अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर शुरू होगी और 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी. 2 नवंबर की शाम तक नवमी तिथि होने के कारण अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर को रखना उचित माना गया है.
अहोई अष्टमी 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त
अहोई अष्टमी पर पूजा के लिए प्रदोष काल को महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दौरान अहोई माता की पूजा, व्रत कथा और आरती की जाती है. व्रत रखने वाली महिलाएं संतान की सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं. दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार, अहोई अष्टमी की पूजा का शुभ समय शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक रहेगा. तारों के दर्शन का समय शाम 5 बजकर 22 मिनट से बताया गया है. हालांकि, वास्तविक समय स्थान और स्थानीय सूर्यास्त के अनुसार अलग हो सकता है.
अष्टमी तिथि का प्रारंभ 1 नवंबर को दोपहर 2:51 बजे और समापन 2 नवंबर को दोपहर 1:10 बजे होगा. चंद्रोदय का समय रात 11:40 बजे बताया गया है, लेकिन अहोई अष्टमी के पारंपरिक व्रत में तारों को अर्घ्य देने की परंपरा अधिक प्रचलित है.
ऐसे करें अहोई माता की आराधना
अहोई अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें. इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करके संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत का संकल्प लें. परंपरा के अनुसार, कुछ महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि कुछ फलाहार के साथ व्रत करती हैं.
पूजा के लिए घर की दीवार पर अहोई माता और स्याहु यानी सेई का चित्र बनाया जाता है. इसके साथ उनके बच्चों का चित्र भी बनाया जाता है. अगर दीवार पर चित्र बनाना संभव न हो, तो अहोई माता का कैलेंडर या तस्वीर स्थापित की जा सकती है. इसके बाद पूजा की चौकी पर कलश स्थापित करें और उस पर कलावा बांधकर स्वास्तिक बनाएं.
शाम के समय अहोई माता को हलवा, पूरी, पेड़े या घर में बने अन्य पकवानों का भोग लगाएं. पूजा के दौरान हाथ में गेहूं के सात दाने लेकर अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनें. कथा पूरी होने के बाद माता की आरती करें और संतान की खुशहाली की प्रार्थना करें.
तारों को अर्घ्य देने के बाद खोलें व्रत
अहोई अष्टमी पर तारों के दर्शन का विशेष महत्व है. शाम को आसमान में तारे दिखाई देने के बाद परंपरा के अनुसार जल से अर्घ्य दिया जाता है. इसके बाद अहोई माता से संतान की लंबी उम्र और सुखी जीवन की प्रार्थना की जाती है. पूजा पूरी होने पर घर के बड़ों का आशीर्वाद लें और परंपरा के अनुसार बायना अर्पित करें. इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है. अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में व्रत की परंपराओं में अंतर हो सकता है, इसलिए अपने घर की मान्यता के अनुसार पूजा करना उचित है.
अहोई अष्टमी पर किन बातों का रखें ध्यान?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई अष्टमी पर मिट्टी खोदने और जमीन पर नुकीले औजारों का इस्तेमाल करने से बचा जाता है. व्रत कथा में सेई के बच्चों से जुड़ी घटना का उल्लेख होने के कारण कई परिवार इस दिन जमीन खोदने और पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचाने से परहेज करते हैं.
इस दिन सुई-धागे, कैंची और चाकू जैसी नुकीली वस्तुओं के इस्तेमाल से बचने की परंपरा भी कुछ परिवारों में प्रचलित है. पूजा के समय साफ-सुथरे कपड़े पहनें और परिवार में शांतिपूर्ण माहौल बनाए रखें. काले या गहरे नीले कपड़े न पहनने जैसी मान्यताएं भी कुछ क्षेत्रों में प्रचलित हैं, हालांकि ये सभी परंपराएं हर जगह समान नहीं हैं.
तारों को अर्घ्य देने के लिए मिट्टी या पीतल के बर्तन का उपयोग करने की परंपरा भी कई परिवारों में निभाई जाती है. व्रत के दौरान दिन में सोने से बचने और क्रोध या विवाद से दूर रहने की सलाह धार्मिक मान्यताओं के आधार पर दी जाती है.
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