हल्द्वानी। भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख-कालापानी सीमा विवाद एक बार फिर गर्मा गया है। पिछले तीन दशकों में यह सातवां मौका है जब इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच राजनयिक असहजता पैदा हुई है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के हालिया बयान से पड़ोसी देशों के रोटी-बेटी के रिश्तों में एक बार फिर खटास पैदा हो गई है। बालेन शाह के रविवार को काठमांडू में लिपुलेख-कालापानी को लेकर दिए बयान के बाद फिर बहस छिड़ गई है। लेकिन यह विवाद कोई पहला नहीं है। बल्कि 1998 में बड़े स्तर पर कालापानी को लेकर मामला गहराया था। तब नेपाल ने कालापानी से भारतीय सैनिकों को हटाने की मांग की थी। साल 2015 में भारत-चीन ने मानसरोवर यात्रा के लिए एक ट्रांजिट पॉइंट के रूप में इस मार्ग को विकसित करने की बात कही थी। तब भी नेपाल ने इस पर खुलकर कड़ा विरोध जताया। 2019 में नेपाल ने नक्शा जारी कर लिपुलेख, कालापानी को अपना दिखाया था। वर्ष 2020 में लिपुलेख दर्रे को जोड़ने वाली सड़क के उद्घाटन के बाद भी नेपाल ने सीमा विवाद खड़ा किया। उसी वर्ष नेपाल ने आधिकारिक राजनीतिक नक्शा जारी कर दिया, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को अपने हिस्से में दिखा दिया था。
पिछले महीने ही नेपाल के प्रधानमंत्री शाह ने एक बयान देते हुए कहा था कि भारत के साथ ही नेपाल ने भी कई जगहों पर सीमावर्ती इलाकों में कब्जा जमाया है। इसके बाद उनकी नेपाल में काफी किरकिरी हुई थी। अब रविवार को दिए बयान से दोबारा सामरिक हलचल तेज हो गई है।
दोनों देशों को सीमा विवाद का मिलकर हल निकालना चाहिए। यह सिर्फ लिपुलेख, कालापानी का विवाद नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों में सीमा स्तंभों पर भी रार है। 30 सालों से नेपाल और भारत के बीच सीमा विवाद का एक कारण टेरीटरी भी है। दोनों देशों की सर्वे टीम ही इसे सुलझा सकती हैं। मैं खुद इन विवादों को दशकों से देख रहा हूं।
-देवेंद्र चंद ‘देवा’, वरिष्ठ पत्रकार
दोनों देशों की सर्वे टीम ने हाल ही में बैठक भी की थी। अब जरूरत है कि दोनों देश अपने-अपने पुराने नक्शे सर्वे टीम के सामने रखें। जिसके बाद मिलान के आधार पर सीमा विवाद को खत्म करने के लिए आगे की कार्रवाई करनी चाहिए। ताकि भविष्य में दोनों देशों के रिश्ते पूर्व की तरह बेहतर रहें।
-एमपी जोशी, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ, नेपाल
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