भास्कर संवाददाता | गुना
हिन्दी पत्रकारिता का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्या योगदान रहा, यह किसी से छिपा नहीं है। बावजूद इसके, आज हिन्दी पत्रकारिता को शासन और प्रशासन द्वारा उपेक्षित किया जाना गंभीर चिंता का विषय है। उक्त विचार लेखक अनिरुद्ध सिंह सेंगर ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्यकारों और पत्रकारों ने जिस प्रकार से राष्ट्रप्रेम की भावना को अपने पत्रों और लेखों के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया, वहीं आजादी के आंदोलन की बुनियाद बनी।
उन्होंने बताया कि 30 मई 1826 को पं. जुगुल किशोर शुक्ल द्वारा कानपुर से उदंत मार्तंड का प्रकाशन किया गया था, जो हिन्दी पत्रकारिता का प्रारंभिक स्वरूप था। इस पत्र ने अंग्रेज सरकार की नींद उड़ा दी थी, लेकिन संसाधनों की कमी और सरकारी उपेक्षा के चलते यह अखबार केवल 50 अंक ही निकाल सका और दिसंबर 1827 में बंद हो गया। इसके बाद भी हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा थमी नहीं। राजाराम मोहन राय का बंगदूत, भारतेन्दु हरिश्चंद्र की कवि वचन सुधा, चिंतामणि घोष की सरस्वती जैसी पत्रिकाओं ने समाज सुधार, शिक्षा और राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सेंगर ने बताया कि आज हिन्दी पत्रकारिता अंग्रेजी पत्रकारिता के दबाव को मात देकर आगे बढ़ चुकी है, फिर भी उसे वह सम्मान और संसाधन नहीं मिल पा रहे हैं जिसके वह योग्य है। सरकार को चाहिए कि वह आगामी वर्ष 2026 में हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने पर इसकी गरिमा और योगदान को सम्मान दे। उन्होंने अपेक्षा जताई कि सरकार हिन्दी के संपादकों और प्रकाशकों को सहयोग एवं संरक्षण देने की ठोस नीति बनाए, ताकि हिन्दी पत्रकारिता फिर से अपने स्वर्ण युग की ओर अग्रसर हो सके।
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