अप्रैल-जून तिमाही में भारत की GDP ग्रोथ 7.8% रही है. यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 7% अनुमान से भी ज्यादा है. हालांकि, GDP के इसी आंकड़े को लेकर अब राजनीतिक बहस तेज हो गई है. पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने जून तिमाही की ग्रोथ 2.6% बताई, जिसके बाद कांग्रेस ने सरकार पर GDP आंकड़ों में हेरफेर का आरोप लगाया. कांग्रेस ने मंगलवार को नए GDP आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए इन्हें ‘स्टैटिस्टिकल जिम्नास्टिक्स’ बताया. पार्टी का आरोप है कि इन आंकड़ों के जरिए देश की कमजोर आर्थिक स्थिति को छिपाने की कोशिश की जा रही है.
अब सरकारी सूत्रों ने पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के 2.6% के दावे को ‘आंकड़ों के लिहाज से बेमतलब’ बताया है. पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहा था कि वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही के लिए नई GDP सीरीज में रियल GDP का आंकड़ा उस समय उपलब्ध नहीं था, क्योंकि तब इसे पुरानी सीरीज के आधार पर जारी किया गया था. उन्होंने कहा, ‘इसलिए अब 2025-26 की पहली तिमाही के लिए जिस आंकड़े को बेस बनाया गया है, वह ऐसा आंकड़ा है जिसे सरकार ने पहली बार जारी किया है. इसलिए इसकी तुलना उस बेस से करते समय थोड़ा सावधान रहना चाहिए.’
सुभाष गर्ग ने कहा कि GDP ग्रोथ का विश्लेषण मौजूदा कीमतों के आधार पर भी किया जाता है और सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही के करंट प्राइस पर GDP में बड़े स्तर पर संशोधन किया है. उन्होंने कहा, ‘बेस ईयर की पहली तिमाही की करंट प्राइस GDP में इतनी बड़ी और व्यापक कटौती की गई है कि अब ग्रोथ 10.3% हो गई है. अगर पिछले साल जारी किए गए करंट प्राइस वाले GDP आंकड़ों को लिया जाता और कीमतें नहीं बदली होतीं, तो नॉमिनल GDP की ग्रोथ 2.5% से भी कम होती.’ गर्ग ने आगे कहा कि इन दोनों बातों से उन्हें इस बात पर कुछ संदेह होता है कि 7.8% की वास्तविक GDP ग्रोथ कितनी वास्तविक है.
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कहां से आया 2.6% का आंकड़ा?
सरकारी सूत्रों ने पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के दावे को खारिज करते हुए कहा, उन्होंने 2.6% की ग्रोथ निकालने के लिए Q1 FY27 के ₹88.27 लाख करोड़ वाले नए GDP आंकड़े की तुलना Q1 FY26 के ₹86.05 लाख करोड़ से की. समस्या यह है कि ₹88.27 लाख करोड़ का आंकड़ा नई GDP सीरीज का है, जबकि ₹86.05 लाख करोड़ का आंकड़ा पुरानी सीरीज से लिया गया है. सूत्रों का कहना है कि अलग-अलग GDP सीरीज के आंकड़ों को इस तरह मिलाकर ग्रोथ रेट निकालना सही नहीं है. सूत्रों के मुताबिक, इसमें नई सीरीज के न्यूमेरेटर और पुरानी सीरीज के डिनोमिनेटर का इस्तेमाल किया गया है. इसलिए 2.6% को वास्तविक GDP ग्रोथ रेट बताने का पूर्व वित्त सचिव का दावा गलत है.
नई GDP सीरीज में क्या है?
सांख्यिकी मंत्रालय के मुताबिक, GDP की तुलना तभी सही मानी जाएगी जब दोनों अवधियों के लिए एक जैसी मेथोडोलॉजी और डेटा सोर्स का इस्तेमाल किया जाए. नई सीरीज के आंकड़ों के अनुसार, Q1 में नॉमिनल GDP ₹80.00 लाख करोड़ से बढ़कर ₹88.27 लाख करोड़ हो गई. यानी इसमें करीब 10.3% की बढ़ोतरी हुई. वहीं, रियल GDP ₹75.46 लाख करोड़ से बढ़कर ₹81.36 लाख करोड़ हो गई, जिससे वास्तविक GDP ग्रोथ 7.8% निकलती है.
पुरानी और नई सीरीज में क्या बदला?
सरकारी सूत्रों का कहना है कि ₹86.05 लाख करोड़ का आंकड़ा अगस्त 2025 में 2011-12 बेस ईयर वाली पुरानी GDP सीरीज के तहत जारी किया गया था. बाद में बेस ईयर को बदलकर 2022-23 किया गया. नई सीरीज में सिर्फ बेस ईयर ही नहीं बदला है, बल्कि कवरेज, सेक्टोरल वेट, एस्टिमेशन प्रोसीजर, प्राइस ट्रीटमेंट और डेटा सोर्स में भी बदलाव किए गए हैं. ऐसे में पुरानी सीरीज के आंकड़े को नई सीरीज के आंकड़े के साथ सीधे जोड़कर ग्रोथ रेट निकालना सांख्यिकीय तौर पर सही नहीं माना जाता.
स्टैटिस्टिकल डिस्क्रेपेंसी ने बढ़ाया अंतर
सरकारी सूत्रों ने GDP में स्टैटिस्टिकल डिस्क्रेपेंसी (सांख्यिकीय विसंगति) का भी जिक्र किया है. यह उत्पादन के आधार पर निकाली गई GDP और खर्च के आधार पर निकली GDP के बीच का अंतर होता है. Q1 FY26 में यह डिस्क्रेपेंसी ₹1.37 लाख करोड़ पॉजिटिव थी, जबकि Q1 FY27 में यह ₹1.06 लाख करोड़ नेगेटिव रही. सूत्रों के मुताबिक, इस बदलाव का असर ताजा GDP ग्रोथ रेट पर करीब 3.2 प्रतिशत अंक का रहा. सूत्रों के मुताबिक, अगर इस स्टैटिस्टिकल डिस्क्रेपेंसी को हटाकर खर्च वाले घटकों को देखा जाए, तो यह आंकड़ा ₹74.10 लाख करोड़ से बढ़कर ₹82.42 लाख करोड़ हो जाता है. यानी इसमें करीब 11.2% की ग्रोथ दिखाई देती है.
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GDP डिफ्लेटर पर भी उठे सवाल
GDP के आंकड़ों में नॉमिनल और रियल ग्रोथ के अंतर को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. Q1 में नॉमिनल GDP ग्रोथ 10.3% और रियल GDP ग्रोथ 7.8% रही. इससे GDP डिफ्लेटर में करीब 2.3% की बढ़ोतरी का संकेत मिलता है. हालांकि, सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया कि GDP डिफ्लेटर की तुलना सीधे CPI या WPI से नहीं की जा सकती. GDP में घरेलू खपत, सरकारी सेवाएं, निवेश, निर्यात और देश में पैदा हुई वैल्यू एडेड शामिल होती है.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नई सीरीज के तहत डबल डिफ्लेशन भी लागू किया गया है. इसका मतलब है कि आउटपुट और इनपुट कीमतों में बदलाव को अलग-अलग देखा जाता है. अगर इनपुट कीमतें आउटपुट कीमतों की तुलना में तेजी से बढ़ती हैं, तो नॉमिनल वैल्यू एडेड की ग्रोथ रियल वैल्यू एडेड की तुलना में कम हो सकती है.
संजीव सान्याल ने भी किया बचाव
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने मंगलवार को नई GDP सीरीज और पद्धति का बचाव किया. इंडिया टुडे से बातचीत में उन्होंने कहा कि कोई गंभीर अर्थशास्त्री आंकड़ों को देखकर यह नहीं कह रहा कि डेटा भरोसेमंद नहीं है.
सान्याल के मुताबिक, बेस ईयर को अपडेट करने की जरूरत लंबे समय से थी, लेकिन कोविड-19 के कारण सामान्य आर्थिक गतिविधियों वाला साल चुनना मुश्किल था. उनके मुताबिक, 2024 तक इंतजार इसलिए करना पड़ा ताकि ऐसा सामान्य साल उपलब्ध हो सके जिसे नए बेस ईयर के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके. उन्होंने यह भी कहा कि GDP के मजबूत आंकड़ों की झलक कॉरपोरेट मुनाफे और कार बिक्री जैसे दूसरे आर्थिक संकेतकों में भी दिखाई दे रही है.
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