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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस जिस राजनीतिक संकट से गुजर रही है, वो अब सिर्फ चुनावी हार तक सीमित नहीं रह गया है. पार्टी के भीतर असंतोष, बगावती तेवर, नेतृत्व को लेकर सवाल और अब फर्जी हस्ताक्षर मामले में CID जांच ने ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
हालात ऐसे हैं कि राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के बाद सबसे प्रभावशाली नेता माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी खुद जांच एजेंसियों के रडार पर हैं. दूसरी तरफ पार्टी के भीतर भी विरोध के सुर तेज होते दिखाई दे रहे हैं. ममता बनर्जी की बैठक में बड़ी संख्या में विधायकों का नहीं पहुंचना खुलेआम नेतृत्व पर सवाल उठाता नजर आ रहा है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वह फेक साइन यानी फर्जी हस्ताक्षर मामला क्या है, जिसने चुनावी हार के बाद पहले से दबाव झेल रही TMC को और ज्यादा हिला दिया है.
कैसे शुरू हुआ फेक साइन विवाद?
इस पूरे विवाद की जड़ पश्चिम बंगाल विधानसभा सचिवालय को भेजे गए एक पत्र में है. विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस की ओर से विधानसभा सचिवालय को एक प्रस्ताव भेजा गया था. इस प्रस्ताव में वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) बनाए जाने के लिए समर्थन जताया गया था.
बताया गया कि इस प्रस्ताव पर पार्टी के करीब 70 नवनिर्वाचित विधायकों के हस्ताक्षर थे. यह पत्र विधानसभा सचिवालय को भेजा गया. इसके बाद से ही विवाद शुरू हो गया. जब विधानसभा सचिवालय ने पत्र की जांच की, तब कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों को लेकर सवाल खड़े हो गए. जांच में कुछ विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी पाए गए.
विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज उनके मूल हस्ताक्षरों से मेल नहीं खा रहे थे. खास तौर पर चौरंगी से विधायक नैना बनर्जी और कैनिंग पूर्व के विधायक बहारुल इस्लाम के हस्ताक्षरों को लेकर सवाल उठाए गए. आरोप लगा कि कुछ विधायकों की जानकारी के बिना या उनकी अनुपस्थिति में किसी दूसरे ने उनके नाम से हस्ताक्षर किए.
विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज उनके मूल हस्ताक्षरों से मेल नहीं खा रहे थे. खास तौर पर चौरंगी से विधायक नैना बनर्जी और कैनिंग पूर्व के विधायक बहारुल इस्लाम के हस्ताक्षरों को लेकर सवाल उठाए गए. आरोप लगा कि कुछ विधायकों की जानकारी के बिना या उनकी अनुपस्थिति में किसी दूसरे ने उनके नाम से हस्ताक्षर किए.
यहीं से फर्जी हस्ताक्षर का मामला सामने आया और विधानसभा सचिवालय ने इसकी शिकायत दर्ज करा दी. इस केस जुड़ा एक अहम बयान हाल में निष्कासित TMC के पूर्व विधायक ऋतब्रत बनर्जी का सामने आया है, जिससे फर्जीवाड़े का पता चलता है. इस मामले में ऋतब्रत बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी पर सीधा और गंभीर आरोप लगाया है.
ऋतब्रत बनर्जी कहते हैं, ” चुनाव परिणाम आने के बाद 19 मई को पार्टी की मीटिंग बुलाई गई थी. इसमें विधायक पहुंचे थे. मैं और संदीपन साहा भी थे. हमसे एक पेपर पर 6 जून की तारीख के नीचे दस्तखत करने के लिए कहा गया. वहां मौजूद विधायकों ने साइन किए, लेकिन ऐसे विधायकों के साइन भी दिखे, जो मीटिंग में आए ही नहीं थे.”
#WATCH | Kolkata, West Bengal: On his expulsion from the party, former TMC MLA Ritabrata Banerjee says, “… When I went to the party meeting on the 19th May, they told us to sign under the date 6 June… The speaker does not have a political party… When I became the MP, I… pic.twitter.com/NRsUfTAvpi
CID जांच तक मामला कैसे पहुंचा?
इस मामले के सामने आने के बाद विधानसभा सचिवालय की ओर से कोलकाता के हरे स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई गई. शिकायत में कहा गया कि कुछ हस्ताक्षर विधानसभा रिकॉर्ड में उपलब्ध हस्ताक्षरों से मेल नहीं खाते. इसके बाद जांच CID को सौंप दी गई. उसने मामले की जांच शुरू कर दी. कई विधायकों से पूछताछ की गई.
इनमें नैना बनर्जी, चंद्रनाथ सिन्हा, कुणाल घोष और बहारुल इस्लाम जैसे नेताओं का नाम शामिल हैं. जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, उसका दायरा बढ़ता गया और आखिरकार जांच की आंच अभिषेक बनर्जी तक पहुंच गई. CID का कहना है कि जिस बैठक के बाद नेता प्रतिपक्ष के चयन से जुड़ा प्रस्ताव तैयार हुआ था, उसमें अभिषेक की अहम भूमिका थी.
6 मई को चुनाव परिणाम आने के करीब 48 घंटे बाद ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर नव निर्वाचित विधायकों की बैठक बुलाई थी. इसी बैठक में अभिषेक बनर्जी ने विधायकों से बातचीत की थी और आगे की रणनीति तथा नेता प्रतिपक्ष के चयन पर चर्चा हुई थी. इसी वजह से CID ने अभिषेक बनर्जी को नोटिस भेजकर पूछताछ के लिए बुलाया.
CID की टीम अभिषेक के घर पहुंची
CID ने अभिषेक बनर्जी को समन जारी किया. पांच अधिकारी दक्षिण कोलकाता स्थित उनके आवास पहुंचे. हालांकि उस समय वो वहां मौजूद नहीं थे. अधिकारियों ने कुछ देर इंतजार किया और फिर उनके दूसरे आवास पर पहुंचे. करीब डेढ़ घंटे तक चले घटनाक्रम के बाद अधिकारियों ने आखिरकार अभिषेक बनर्जी को नोटिस सौंप दिया.
नोटिस मिलने के बाद अभिषेक ने कहा कि वह अपने वकीलों से सलाह लेंगे और जांच में पूरा सहयोग करेंगे. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित है. उन्होंने कहा कि वो पहले भी ED और CBI की जांच का सामना कर चुके हैं. वो किसी के भी दबाव के आगे झुकने वाले बिल्कुल नहीं हैं.
नोटिस के बाद सड़क पर घिरे अभिषेक
CID नोटिस विवाद के बीच एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया. चुनावी हिंसा में मारे गए एक कार्यकर्ता के परिवार से मिलने जाते समय अभिषेक बनर्जी को रास्ते में भारी विरोध का सामना करना पड़ा. उनके काफिले को घेर लिया गया. प्रदर्शनकारियों ने पत्थर और अंडे फेंके. धक्का-मुक्की और मारपीट तक की नौबत आ गई.
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि सुरक्षा कर्मियों को उन्हें हेलमेट पहनाकर वहां से निकालना पड़ा. इस घटना ने साफ संकेत दिया कि चुनावी हार के बाद राजनीतिक माहौल कितना तनावपूर्ण हो चुका है.
ममता की बैठक में नहीं पहुंचे विधायक
इस पूरे विवाद के बीच ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर सभी विधायकों की बैठक बुलाई. लेकिन यहां जो हुआ, उसने पार्टी नेतृत्व की चिंता और बढ़ा दी. बताया गया कि करीब 80 विधायकों में से सिर्फ 20 विधायक ही बैठक में पहुंचे. करीब 60 विधायक अनुपस्थित रहे. अंततः बैठक को रद्द करना पड़ा.
हालांकि TMC प्रवक्ता कुणाल घोष ने दावा किया कि कई विधायकों ने पहले ही सूचना दे दी थी कि वे अपने क्षेत्रों में हिंसा के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त हैं. फिर भी इतनी बड़ी संख्या में विधायकों की गैरमौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए. TMC विधायक संदीपन साहा ने बैठक में शामिल न होने की वजह बताई.
उन्होंने कहा कि पार्टी नेता, उपनेता और चीफ व्हिप की नियुक्ति को लेकर पहले ही एक बैठक हो चुकी थी. उसमें प्रस्ताव भी पारित हो चुका था. उनका आरोप था कि बाद में विधानसभा को प्रस्ताव भेजने से पहले जरूरी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया. उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से उसी प्रक्रिया पर सवाल उठाया, जिसकी जांच CID कर रही है.
दो विधायकों का निष्कासन क्यों हुआ?
इस मामले ने नया मोड़ तब लिया जब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि विधानसभा में कथित हस्ताक्षर जालसाजी मामले की CID जांच दो TMC विधायकों की शिकायत के आधार पर शुरू हुई थी. उन्होंने रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा का नाम लिया. इस दावे के बाद ममता बनर्जी ने दोनों विधायकों को निष्कासित कर दिया.
संदीपन साहा पहले ही बैठक से दूरी बनाकर बगावती संकेत दे चुके थे. राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पार्टी के भीतर असंतोष रखने वाले नेताओं की संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है. फिलहाल इतना तय है कि चुनावी हार के बाद शुरू हुआ संकट अब फर्जी हस्ताक्षर विवाद के बहाने पार्टी के भीतर गहरे राजनीतिक भूकंप का रूप लेता दिखाई दे रहा है.
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