Feedback
अमेरिका आज इजरायल का सबसे बड़ा सहयोगी माना जाता है. अमेरिकी राष्ट्रपति से लेकर विदेश मंत्री तक अक्सर कहते हैं कि अमेरिका हमेशा इजरायल के साथ खड़ा रहा है. लेकिन अगर इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है. 1948 में अस्तित्व में आने के बाद इजरायल ने अपनी ज्यादातर लड़ाइयां अकेले दम पर लड़ी हैं. कई बार उसे हथियार या कूटनीतिक समर्थन जरूर मिला, लेकिन युद्ध के मैदान में उसके साथ खड़े होने वाले देश बेहद कम रहे.
करीब 75 साल के इतिहास में सिर्फ एक बार ऐसा हुआ, जब ब्रिटेन और फ्रांस ने इजरायल के साथ मिलकर सीधे युद्ध लड़ा. वहीं अमेरिका ने कुछ मौकों पर हथियार, खुफिया जानकारी और सैन्य सामग्री देकर मदद की, लेकिन सैनिक भेजकर मोर्चे पर नहीं उतरा. अब 2023 में हमास के हमले के बाद पहली बार हालात ऐसे बने हैं कि इजरायल, हमास, हिजबुल्लाह और ईरान के टकराव में अमेरिका भी प्रत्यक्ष रूप से शामिल दिखाई देने लगा है.
आइए समझते हैं कि इजरायल ने कब-कब जंग लड़ी, किसके खिलाफ लड़ी और उसमें कौन उसके साथ खड़ा था.
1. 1948: देश बना और उसी दिन छिड़ गई पहली जंग
14 मई 1948 को डेविड बेन-गुरियन ने इजरायल को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया. इससे पहले संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन को यहूदी और अरब राज्यों में बांटने की योजना मंजूर की थी, लेकिन अरब देशों ने इसे स्वीकार नहीं किया. इजरायल के गठन के अगले ही दिन मिस्र, जॉर्डन, इराक, सीरिया और लेबनान की सेनाएं उस पर टूट पड़ीं. यह पहला अरब-इजरायल युद्ध था.
उस समय न अमेरिका की सेना इजरायल के साथ लड़ी और न ही किसी यूरोपीय देश ने उसके लिए मोर्चा संभाला. इजरायल ने अकेले लड़ाई लड़ी और युद्ध के अंत तक न सिर्फ खुद को बचा लिया बल्कि अपने नियंत्रण वाला इलाका भी बढ़ा लिया.
2. 1956: जब पहली और आखिरी बार ब्रिटेन-फ्रांस साथ उतरे
1948 के बाद मिस्र और इजरायल के रिश्ते लगातार खराब रहे. फिर मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया. इसके बाद 1956 में इजरायल, ब्रिटेन और फ्रांस ने मिलकर मिस्र पर हमला किया. इसे स्वेज संकट कहा जाता है.
इजरायल के इतिहास में यह पहला और लगभग एकमात्र बड़ा युद्ध था, जिसमें दूसरे देशों की सेनाएं उसके साथ सीधे मैदान में उतरीं. हालांकि अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते बाद में तीनों देशों को पीछे हटना पड़ा.
3. 1967: सिर्फ 6 दिन में इजरायल ने तीन देशों को हरा दिया
1967 तक इजरायल और उसके पड़ोसी देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच चुका था. सीरिया समर्थित फिलिस्तीनी लड़ाके लगातार इजरायली सीमा पर हमले कर रहे थे. मिस्र ने सिनाई में सेना भेज दी थी और इजरायली जहाजों के लिए तिरान जलडमरूमध्य बंद कर दिया था. 5 जून 1967 को इजरायल ने पहले हमला करने का फैसला किया. इस युद्ध को इतिहास में सिक्स डेज वॉर के नाम से जाना जाता है. सिर्फ 6 दिनों में इजरायल ने बिना किसी दूसरे राष्ट्र की मदद के तीन देशों को शिकस्त दी थी.
सिर्फ कुछ घंटों में इजरायली वायुसेना ने मिस्र की लगभग 90 प्रतिशत वायुसेना को जमीन पर ही तबाह कर दिया. इसके बाद जॉर्डन, सीरिया और इराक की वायुसेनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचाया गया.छह दिन के भीतर इजरायल ने मिस्र, जॉर्डन और सीरिया को हरा दिया. गाजा पट्टी, सिनाई, वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गोलान हाइट्स उसके कब्जे में आ गए.यह जीत पूरी तरह इजरायल की अपनी सैन्य ताकत पर हासिल हुई थी.
4. 1973: योम किप्पुर युद्ध
6 अक्टूबर 1973 को यहूदियों के सबसे पवित्र त्योहार योम किप्पुर के दिन मिस्र और सीरिया ने अचानक हमला कर दिया. शुरुआत में अरब सेनाओं को सफलता मिली. इराक भी युद्ध में शामिल हो गया और जॉर्डन ने भी सीरिया की मदद की. यहां पहली बार अमेरिका ने इजरायल हथियारों और सैन्य उपकरणों को एयरलिफ्ट करने में मदद की.फिर भी युद्ध मैदान में लड़ाई इजरायली सैनिकों ने ही लड़ी. कुछ ही दिनों में इजरायल ने हालात पलट दिए और गोलान हाइट्स पर दोबारा नियंत्रण हासिल कर लिया.
5. 1982: लेबनान में घुसकर PLO को बाहर निकाला
1982 में इजरायल ने लेबनान पर हमला किया.यह पहला लेबनान युद्ध था. उसका मकसद फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन (PLO) को खत्म करना था. PLO लंबे समय से इजरायल के खिलाफ हमले कर रहा था. यह समूह, जिसकी स्थापना 1964 में हुई थी और जिसने 1947 तक फिलिस्तीन में रहने वाले सभी अरब नागरिकों को ‘फ़िलिस्तीनी’ घोषित किया था, इजरायल के भीतर एक फfलिस्तीनी राज्य बनाने पर केंद्रित था. इस युद्ध में भी कोई विदेशी सेना इजरायल के साथ नहीं थी. इजरायल ने अकेले अभियान चलाया और PLO को लेबनान से बाहर निकाल दिया.
6. 1987: पहला फिलीस्तीनी इंतिफादा
गाजा और वेस्ट बैंक में इजरायली कंट्रोल के खिलाफ फिलिस्तीनियों ने बड़ा विद्रोह शुरू किया. 1987 में शुरू हुए इस फिलिस्तीनी विद्रोह में सैकड़ों लोगों की जान गई. यह पारंपरिक युद्ध नहीं था बल्कि लंबे समय तक चलने वाला जनआंदोलन और हिंसक संघर्ष था. इजरायल ने इसे भी अपने दम पर संभाला.
ओस्लो शांति समझौते के नाम से जानी जाने वाली एक शांति प्रक्रिया ने इंतिफादा (एक अरबी शब्द जिसका अर्थ है ‘झटका देना’) को समाप्त कर दिया. इसके बाद, फिलिस्तीनी प्राधिकरण का गठन हुआ और उसने इजरायल के कुछ क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया. 1997 में, इजरायली सेना वेस्ट बैंक के कुछ हिस्सों से पीछे हट गई.
7. 2000: दूसरा फिलीस्तीनी इंतिफादा
फिलिस्तीनी समूहों ने 2000 में आत्मघाती हमले शुरू किए. इसके परिणामस्वरूप कई साल तक यह हिंसा चलती रही.जब तक कि युद्धविराम नहीं हो गया. इजरायल ने 2005 के अंत तक गाजा पट्टी से सभी सैनिकों और यहूदी बस्तियों को हटाने की योजना की घोषणा की. यह लड़ाई भी इजरायल ने अपने दम पर लड़ी.
8. 2006: हिजबुल्लाह से टकराव या दूसरा लेबनान युद्ध
लेबनान के शिया संगठन हिजबुल्लाह ने इजरायली सैनिकों का अपहरण कर लिया. इसके जवाब में इजरायल ने युद्ध छेड़ दिया. करीब दो महीने तक लड़ाई चली. इस युद्ध में भी इजरायल अकेला था. संयुक्त राष्ट्र की बातचीत से हुए युद्धविराम ने संघर्ष शुरू होने के कुछ महीनों बाद ही इसे समाप्त कर दिया.
9. 2008 से 2021: हमास के खिलाफ लगातार जंग
हमास के सत्ता में आने के बाद गाजा से इजरायल पर रॉकेट हमले बढ़ने लगे. इस वजह से इजरायल का हमास के साथ बार-बार हिंसात्मक संघर्ष होता रहा है. हमास एक सुन्नी इस्लामी आतंकवादी समूह है जिसने 2006 में फिलिस्तीनी सत्ता संभाली थी. 2008, 2012, 2014 और 2021 में इजरायल और हमास के बीच कई बड़े संघर्ष हुए. हर बार लड़ाई मुख्य रूप से इजरायल और हमास के बीच रही.
10. 2023: जिसने सब कुछ बदल दिया
7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजरायल पर अब तक का सबसे बड़ा हमला किया. हजारों रॉकेट दागे गए, 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए और 200 से ज्यादा लोगों को बंधक बना लिया गया. इसके जवाब में इजरायल ने गाजा में बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया. लेकिन इस बार मामला सिर्फ हमास तक सीमित नहीं रहा. इस बार लेबनान से हिजबुल्लाह सक्रिय हो गया. यमन के हूती भी शामिल हो गए. बाद में ईरान ने भी सीधे मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए.
11. पहली बार इजरायल के खिलाफ ईरान सीधे युद्ध में उतरा
अप्रैल 2024 में ईरान ने पहली बार अपने क्षेत्र से सीधे इजरायल पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें दागीं. इसके बाद अक्टूबर 2024 में उसने फिर बड़ा मिसाइल हमला किया. यहां तक इजरायल अकेले मोर्चा संभाल रहा था. इसके बाद से तस्वीर बदल गई.
अमेरिका ने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप शुरू किया
अब अमेरिका सिर्फ हथियार भेजने तक सीमित नहीं रहा. अमेरिकी युद्धपोत, मिसाइल रक्षा प्रणाली और लड़ाकू विमान इजरायल की सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभाने लगे. ब्रिटेन और फ्रांस ने भी कुछ मौकों पर मिसाइल रोकने और हवाई सुरक्षा में मदद की.
क्यों अलग है 2023 के बाद की जंग?
1948 से लेकर 2023 तक इजरायल की ज्यादातर लड़ाइयों में उसकी सेना ही मुख्य लड़ाकू शक्ति रही. 1956 के स्वेज संकट को छोड़ दें तो किसी बड़े देश ने उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध नहीं लड़ा.अमेरिका ने कई बार हथियार दिए, खुफिया जानकारी दी और कूटनीतिक ढाल बनकर खड़ा रहा, लेकिन सीधे युद्ध में नहीं उतरा.
यह भी पढ़ें: पैलेस ऑफ वर्साय जहां ट्रंप ने डील साइन की, वहां हुई संधि से पड़ी थी दूसरे वर्ल्ड वॉर की नींव
लेकिन 2023 के बाद पहली बार संघर्ष का दायरा इतना बढ़ गया कि हमास, हिजबुल्लाह और ईरान के खिलाफ चल रहे मोर्चे में अमेरिका भी सक्रिय भूमिका निभाने लगा. यही वजह है कि इजरायल के इतिहास की यह लड़ाई बाकी सभी जंगों से अलग मानी जाती है. पिछले सात दशकों में इजरायल ने ज्यादातर युद्ध अकेले लड़े और जीते, लेकिन ईरान की सीधी एंट्री ने ऐसा समीकरण बना दिया है, जिसमें अब अमेरिका भी खुद को पूरी तरह अलग नहीं रख पाया.
12. 2025 से साथ-साथ लड़े अमेरिका और इजरायल
2025 में इजरायल के साथ मिलकर अमेरिका ने भी ईरान पर बमबारी की और परमाणु ठिकानों को तबाह कर दिया. इसके बाद मार्च 2026 में अमेरिका और इजरायल ने साथ मिलकर ईरान पर हमला शुरू कर दिया. अब जब ईरान के साथ युद्ध विराम को लेकर अमेरिका का समझौता हो चुका है. फिर भी इजरायल ने लेबनान पर हमले जारी रखे हैं. इस वजह से अमेरिका अब इजरायल को धौंस दिखा रहा है.
Copyright © 2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today
होम
वीडियो
लाइव टीवी
न्यूज़ रील
मेन्यू
मेन्यू