Chanakya Niti: बच्चों की परवरिश में किस उम्र तक दिखाना है लाड और कब रखनी है नजर? जानिए पेरेंटिंग का सबसे सटीक – India.Com

Parenting Tips from Chanakya Niti: बच्चों की परवरिश करना दुनिया के सबसे मुश्किल कामों में से एक माना जाता है. हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा संस्कारी, अनुशासित और जीवन में सफल बने. लेकिन कई बार बहुत अधिक लाड-प्यार या फिर जरूरत से ज्यादा सख्ती बच्चों को बागी (rebellious) बना देती है.

अगर आप भी इस बात को लेकर उलझन में रहते हैं कि बच्चे के साथ कब कैसा व्यवहार करना चाहिए, तो महान कूटनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री आचार्य चाणक्य ने इसके लिए एक बेहद सटीक ‘टाइमलाइन’ तय की है. आचार्य चाणक्य का एक श्लोक सदियों से पेरेंटिंग का सबसे बड़ा मंत्र माना गया है:

लालयेत् पंचवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्।

प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्॥
इस एक श्लोक में आचार्य चाणक्य ने बच्चे के जन्म से लेकर उसके युवा होने तक के व्यवहार को 3 अलग-अलग पड़ावों में बांटा है. आइए जानते हैं कि चाणक्य ने बच्चे की उम्र 16 वर्ष होते ही माता-पिता को अपना बर्ताव तुरंत बदलने की चेतावनी क्यों दी है.

आचार्य चाणक्य के अनुसार, बच्चे के जन्म से लेकर उसके 5 साल का होने तक माता-पिता को उसे सिर्फ और सिर्फ प्यार देना चाहिए. इस उम्र में बच्चे को डांटना या मारना उसके मानसिक विकास को नुकसान पहुंचा सकता है. इस दौरान बच्चा जो भी सीखता है, वह खेल-खेल में और प्यार से सीखता है. उसे गलतियों पर सजा देने के बजाय प्यार से समझाना जरूरी है ताकि उसके भीतर असुरक्षा की भावना पैदा न हो.
जब बच्चा छठे साल में प्रवेश करे और 15 साल का होने तक (यानी अगले 10 साल), यह समय उसे अनुशासन सिखाने का है.
ध्यान दें: यहाँ ‘ताडयेत्’ शब्द का अर्थ निर्दयता से पिटाई करना बिल्कुल नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है कड़ी निगरानी रखना, गलतियों पर टोकना और अनुशासन में रखना.
चाणक्य का मानना था कि यह उम्र बच्चों की आदतें बनने की होती है. अगर इस उम्र में बच्चों को सही-गलत का फर्क नहीं सिखाया गया, तो वे भटक सकते हैं. इसलिए इस दौरान माता-पिता को थोड़ा सख्त रुख अपनाना चाहिए ताकि बच्चा मर्यादा और संस्कारों को सीख सके.
अब बात करते हैं आचार्य चाणक्य की उस चेतावनी की, जो आज के समय में सबसे ज्यादा प्रासंगिक (relevant) है. चाणक्य कहते हैं कि जैसे ही बच्चा 16वें साल में कदम रखे, माता-पिता को तुरंत अपनी ‘सख्ती’ की चाबी जेब में रख लेनी चाहिए और बच्चे के साथ एक दोस्त  की तरह व्यवहार करना शुरू कर देना चाहिए.
बागी हो सकते हैं बच्चे: 16 साल की उम्र यानी कि किशोरावस्था (Teenage). इस उम्र में बच्चों के शरीर और दिमाग में कई हार्मोनल बदलाव होते हैं. अगर इस उम्र में भी आप उन पर 10 साल के बच्चे की तरह हुक्म चलाएंगे या डांटेंगे, तो वे आपसे दूर हो जाएंगे और अपनी बातें बाहर दोस्तों से शेयर करने लगेंगे.
सलाह दें, हुक्म नहीं: 16 साल का बच्चा खुद को समझदार मानने लगता है. इस उम्र में उसे यह अहसास दिलाएं कि परिवार में उसकी राय का महत्व है. उससे करियर, पढ़ाई या घर के मामलों पर एक दोस्त की तरह चर्चा करें.
गलत संगति से बचाव: अगर घर का माहौल दोस्ताना होगा, तो बच्चा अपनी जिंदगी की हर अच्छी-बुरी बात, अपने डर और अपनी उलझनें सबसे पहले आपसे शेयर करेगा. इससे आप उसे समय रहते गलत संगति या गलत रास्तों पर जाने से बचा सकेंगे.
आचार्य चाणक्य की यह नीति आज के ‘मॉडर्न पेरेंटिंग’ के कांसेप्ट से पूरी तरह मेल खाती है. बच्चों को एक सफल इंसान बनाने का नियम सीधा है बचपन में भरपूर प्यार दें, स्कूल के दिनों में अनुशासन की उंगली थामकर चलाएं, और जैसे ही वह युवा होने लगे, उसके सबसे अच्छे दोस्त बन जाएं. जो माता-पिता उम्र के इस गणित को समझ लेते हैं, उनके बच्चे कभी असफल नहीं होते.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.
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नेहा अवस्थी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 18 सालों का अनुभव है. नेहा टीवी और डिजिटल दोनों माध्यमों की जानकार हैं. इन 18 सालों में इन्होंने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों … और पढ़ें
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