'निजी स्थान में भी जातिसूचक अपमान पब्लिक व्यू माना जा सकता है', एससी/एसटी एक्ट मामले में केरल हाईकोर्ट – Jagran

केरल हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के तहत 'पब्लिक व्यू' की परिभाषा का विस्तार किया है, जिसमें निजी स्थान पर भी जातिसूचक टिप्पणी को सार्वजनिक माना जाएगा य …और पढ़ें
केरल हाईकोर्ट।
केरल हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट में ‘पब्लिक व्यू’ की व्याख्या की।
निजी स्थान पर भी जातिसूचक टिप्पणी सार्वजनिक मानी जाएगी।
अन्य लोगों की मौजूदगी में अपमानजनक शब्द अपराध माना जाएगा।
माला दीक्षित, जागरण। क्या घर के आंगन में कही गई बात भी सार्वजनिक मानी जा सकती है? केरल हाईकोर्ट के ताजा फैसले ने इस सवाल का जवाब हां में देते हुए एससी, एसटी एक्ट के तहत पब्लिक व्यू की परिभाषा को व्यापक बना दिया है।
उच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एससी, एसटी एक्ट) के तहत “पब्लिक व्यू” की महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए कहा है कि किसी निजी स्थान पर की गई जातिसूचक टिप्पणी भी सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में आ सकती है, यदि वहां अन्य लोग मौजूद हों और अपमानजनक शब्द सुन सकें।
केरल हाईकोर्ट के न्यायाधीश ए.बदरुद्दीन ने कानून की अहम व्याख्या करते हुए एससी, एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामले में दो आरोपितों को अग्रिम जमानत देने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मामले में प्रथम दृष्टया अपराध बनता है, इसलिए कानून की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत देने पर रोक लागू होगी।
यह फैसला महत्वपूर्ण और व्यापक असर वाला है क्योंकि अब आरोपी यह निजी जगह थी कहकर आसानी से नहीं बच सकेंगे। यदि यह साबित हो जाए कि घटना के दौरान अन्य लोग मौजूद थे या अपमानजनक शब्द किसी तीसरे व्यक्ति ने सुने, तो मामला एससी, एसटी एक्ट के दायरे में आएगा। ये कानून अग्रिम जमानत की मनाही करता है।
हाई कोर्ट ने कहा कि यह एक तय बात बात है कि सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाली जगह (पब्लिक व्यू), सार्वजनिक जगह के समान नहीं होती है। अगर किसी निजी जगह पर भी आम लोगों या तीसरे पक्ष की मौजूदगी में ऐसे अपशब्द या अपमानजनक बातें कही जाती हैं जिनसे पीड़ित व्यक्ति को शर्मिंदगी महसूस हो, तो उस जगह को भी ”सार्वजनिक नजर में” (पब्लिक व्यू में) माना जाएगा।
इसके अलावा, जब एक से ज्यादा आरोपी हों और वे मिलकर पीड़ित को नीचा दिखाने के इरादे से गाली-गलौज और अपमान करें, तो एक से ज्यादा आरोपियों की मौजूदगी वैसी ही मानी जाएगी जैसे अपमानजनक और डराने-धमकाने वाली बातें सुनने के लिए आम लोग या तीसरे पक्ष मौजूद हों, इससे वह जगह भी ”सार्वजनिक दृष्टि” वाली जगह (पब्लिक व्यू) बन जाएगी।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में, ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को जानते हैं और उन्होंने काफी समय तक एक ही राजनीतिक पार्टी में साथ काम किया है। ऐसे में, जब पहले आरोपी ने सबके सामने जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया, तो इस स्तर पर यह निष्कर्ष निकालना सही है कि प्रथम दृष्टया एससी, एसटी अत्याचार निरोधक संशोधन अधिनियम, 2018 की धारा 3(1)(एस) के तहत अपराध बनता है।
मालूम हो कि एससी, एसटी एक्ट की धारा 3(1)(एस) के तहत अपराध तभी बनता है जब जातिसूचक अपमान “पब्लिक व्यू” में किया गया हो। इसी आधार पर कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया अपराध बनता है और धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लागू होगी। हाई कोर्ट ने अग्रिम जमानत खारिज करने के विशेष अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
त्रिशूर जिले के वलप्पड थाना क्षेत्र के इस मामले में दो आरोपितों भागीश पूराधन और श्रीजीत पर आरोप है कि उन्होंने अपने छह साथियों के साथ मिलकर शिकायतकर्ता के घर में घुसकर आंगन में धमकी दी और विस्फोटक पदार्थ का इस्तेमाल किया। इतना ही नहीं, आरोप है कि मुख्य आरोपी ने महिला को उसकी जाति के नाम से अपमानित किया था। जिस पर अन्य धाराओं के अलावा एससी एसटी एक्ट के तहत भी मामला दर्ज हुआ था जिसमें अग्रिम जमानत की मनाही है।

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