वाराणसी, मुख्य संवाददाता। गुरु पूर्णिमा एक ऐसी तिथि है जब संसार की सभी विधाओं के गुरुओं का पूजन उनके शिष्य करते हैं। भारत की सांस्कृतिक राजधानी काशी में शायद ही कोई ऐसी विधा हो जिसके गुरु और चेले यहां मौजूद न हों। उनमें एक लोकगायन की विधा बिरहा है। एक समय था जब बिरहा के अखाड़े पूरे वर्ष चेलों से गुलजार रहते थे। बदलते दौर में मनोरंजन के साधन बदले तो इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव इसी लोकविधा पर पड़ा। उदाहरण के तौर पर काशी के कपिलधारा स्थित बिहारी गुरु के अखाड़े को ही लीजिए। बिरहा का यह 172 साल पुराना अखाड़ा करीब दो दशक पहले तक पूरे साल गुलजार रहा करता था। अब वह अवैध कब्जों से जूझ रहा है। जो हिस्सा बिरहा कलाकार यशभारती से सम्मानि विष्णु यादव के अधीन है, वह जर्जर हो चुका है। बिरहा समाज के लोग उसकी स्थिति में सुधार के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल रही है। तमाम प्रयास के बाद भी उन्हें शासन का सहयोग नहीं मिल पा रहा। विष्णु यादव ने कहा कि असल समस्या अवैध कब्जा की है। अखाड़ा को अवैध कब्जों से मुक्त करा दिया जाए तो इसका नवनिर्माण बिरहा समाज के लोग आपसी आर्थिक सहयोग से करने को तैयार हैं। बिरहा गायन में प्रयुक्त होने वाले वाद्ययंत्रों ढोलक, हरमोनियम, करताल, दुक्कड़ आदि के प्रशिक्षण की योजना तो बनी है लेकिन उसे मूर्त रूप नहीं दे पा रहे हैं।
बिरहा का इतिहास बनारस की गलियों से लेकर गाजीपुर के खेतों तक से जुड़ा है। इसकी औपचारिक शुरुआत 1837 के आसपास हुई। किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले बिहारी यादव ने जब बनारस को अपनी कर्मभूमि बनाया तो उन्होंने अपने साथी पत्तू यादव के साथ रामायण की चौपाइयों और लोक कथाओं को भोजपुरी गीतों में पिरोना शुरू किया। यही प्रयास आगे चलकर बिरहा की परंपरा बन गया।
इस अखाड़ा में मुख्य रूप से सरजू खलीफा, गणेश, रमन, शिवचरण, अकलू, महावीर, छेदी यादव, पंचम, करिया, मौलवी, मुंशी, बरसाती, राम लोचन जैसे कलाकार शामिल थे। विष्णु यादव ने बताया कि मेरे परिवार की 10वीं पीढ़ी भी अखाड़ा की सेवा में लगी है। गुरु पूर्णिमा के दिन यूपी और बिहार के लगभग सभी बिरहा कलाकारों की जुटान होगी।
बिरहा गायक हीरालाल यादव भी इस परंपरा के मजबूत स्तंभ थे। 2019 में निधन से पहले उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया। उन्होंने सन 2000 में लाल किले के प्राचीर से बिरहा गाया था। हीरालाल यादव के परिवार में अब बिरहा गायन करने वाला कोई नहीं बचा। बड़े बेटे रामजी यादव इस परंपरा को निभा जरूर रहे थे, लेकिन अस्वस्थ होने के कारण उन्होंने दूरी बना ली है।
इस खबर पर आपकी क्या राय है?
आरएसएसविज्ञापन र॓टहमार॓ साथ काम करेंहमारे बारे मेंसंपर्क करेंगोपनीयतासाइट जानकारी
Advertise with usAbout usCareers Privacy Contact usSitemapCode Of Ethics
Partner sites: Hindustan TimesMintHT TechShineHT AutoHealthshotsHT SmartcastFAB Play