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राधिका मदान ‘लस्ट स्टोरीज 3’ में अली फजल के साथ अपनी फिल्म के लिए मिल रही तारीफ को इन्जॉय कर रही हैं. इस शॉर्ट फिल्म के जरिए शकुन बत्रा उसी विषय पर वापस लौटे हैं जिसे उन्होंने ‘गहराइयां’ में दिखाया था. यहां, वह शादी टूटने के नजरिए से इच्छा को दिखाते हैं, जहां सेक्स एक ऐसी भाषा बन जाता है जिसके जरिए अलग हो रहे कपल एक-दूसरे से अपनी बातें कह पाते हैं.
2018 में जब इस फ़्रैंचाइजी का पहला पार्ट रिलीज हुआ था, तब से लेकर अब तक राधिका का मानना है कि काफी कुछ बेहतर हुआ है. करण जौहर की शॉर्ट फिल्म में कियारा आडवाणी के वाइब्रेटर के साथ ‘सेल्फ-प्लेजर’ (खुद को संतुष्ट करने) वाले सीन ने महिलाओं की कामुकता पर एक बात कही थी, लेकिन इसकी काफी आलोचना भी हुई थी. कियारा ने इस आलोचना को स्वीकार किया था और कहा था कि लोगों को ऐसी चीजों को खुले मन से स्वीकार करने में समय लगेगा.
राधिका मदान ने क्या कहा?
करण ने भी माना था कि उस सीन से उनकी मां, हीरू जौहर, असहज हो गई थीं. News18 को दिए इंटरव्यू में राधिका का कहना है कि आज ऐसे सीन पर कम रोक-टोक होगी. वह कहती हैं, ‘पीछे न हटने के लिए उन्हें श्रेय जाता है! करण को उस कहानी को कहने, उस विचार पर भरोसा करने, उसे सबके सामने लाने और उसके महत्व पर जोर देने के लिए श्रेय जाता है! उन्होंने इसे अपनाया और इसे सेलिब्रेट किया.’
दिलचस्प बात यह है कि ‘लस्ट स्टोरीज‘ के अलग-अलग भागों में ज्यादातर शॉर्ट फिल्में महिलाओं की अपनी मर्जी और उनकी यौन इच्छाओं पर केंद्रित हैं. राधिका मानती हैं कि ‘हाइपर-मस्कुलिन’ (बहुत ज्यादा मर्दानगी दिखाने वाले) सिनेमा की भीड़ में ऐसी फिल्में बहुत कम हैं और कहती हैं, ‘अगर तुलना करें तो कम हैं, लेकिन हैं जरूर. हो सकता है कि ऐसी कहानियां कहने वाली आवाजें बहुत कम हों, लेकिन वे सभी बहुत अहम आवाजें हैं.’
इस बात पर जोर देते हुए कि पिछले कुछ सालों में दर्शक भी कम संकोची हुए हैं, वह कहती हैं, ‘जब ‘लस्ट स्टोरीज’ का पहला सीजन आया था, तो लोग कहते थे, ‘अरे! यह तो बहुत बोल्ड है.’ लेकिन मेकर्स ने हार नहीं मानी. उन्होंने सिर्फ दर्शकों को लुभाने के लिए अपनी कहानियों में इंटीमेट सीन शामिल नहीं किए. इस फ़्रैंचाइजी ने ऐसी अहम आवाजों को सामने लाया, जिन्होंने सेक्स और इच्छा पर अपने विचार शेयर करना जारी रखा.’
राधिका कहती हैं, ‘देश के चार बड़े फिल्ममेकर्स ने मिलकर बहुत संवेदनशीलता के साथ ‘लस्ट स्टोरीज 3’ बनाई है. वासना (lust) से जुड़ी कहानियों पर ‘हाय-तौबा’ नहीं मचनी चाहिए. और इस बार, ज्यादा ‘हाय-तौबा’ नहीं हुई है. बातचीत के विषय के तौर पर वासना अब सामान्य हो गई है, जो एक बड़ी जीत है. हमें इसे जारी रखना होगा. हाइपर-मस्कुलिनिटी (अत्यधिक मर्दानगी) पर फिल्में बनेंगी और महिलाओं की अपनी मर्जी और आजादी (agency) पर भी कहानियां बनेंगी.’
वह आगे बताती हैं कि सालों में लस्ट को लेकर उनकी अपनी समझ भी बदली है. वह कहती हैं, ‘हमारी सोच एक खास तरह से ढल जाती है. हमें सिखाया गया था कि वासना महसूस करने का मतलब है कि आप पवित्र नहीं हैं और वासना गंदी और भद्दी चीज है. अगर कोई सेक्स के बारे में भी सोचता था, तो उसे बुरा-भला कहा जाता था और ‘कामुक’ (lusty) होने का ठप्पा लगा दिया जाता था. लेकिन यह सबसे बुनियादी भावना है जिसे हर इंसान महसूस करता है.’
एक्ट्रेस आगे कहती हैं, ‘यह खुशी, उत्साह, भूख और दुख की तरह ही स्वाभाविक है. यह आपके अपने व्यक्तित्व का उतना ही खूबसूरत हिस्सा है. इससे शर्मिंदा क्यों हों? इसे वर्जित (taboo) क्यों माना जाए? मुझे उन सब बातों को दिमाग से निकालने में समय लगा और जब मैंने ऐसा किया, तो मैंने सच में खुद को पूरी तरह अपनाया; इससे मुझे अपने आप में एक अलग तरह का सुकून और आत्मविश्वास मिला.’
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