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गरबा (Garba) गुजरात का एक पारंपरिक लोक नृत्य है, जिसका संबंध राज्य की लोक संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से है. यह नृत्य मुख्य रूप से नवरात्रि के दौरान किया जाता है. भारत के अलावा विदेशों में रहने वाले भारतीय समुदायों के बीच भी गरबा प्रचलित है. धार्मिक आयोजनों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और उत्सवों में लोग सामूहिक रूप से इस नृत्य में भाग लेते हैं.
गरबा का संबंध हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहार नवरात्रि से है. नवरात्रि नौ रातों तक मनाई जाती है और इस दौरान मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है. गुजरात में गरबा के आयोजन मां अंबा की आराधना से भी जुड़े हैं. मां अंबा को शक्ति का स्वरूप माना जाता है. नवरात्रि के दौरान लोग मंदिरों, सार्वजनिक स्थलों और खुले मैदानों में एकत्र होकर गरबा करते हैं.
गरबा नृत्य में लोग गोल घेरे में खड़े होकर संगीत की लय पर कदम मिलाते हैं. कई बार प्रतिभागी एक-दूसरे के चारों ओर कई गोल घेरे बनाते हैं. नृत्य के दौरान घेरे में शामिल लोग सामान्य रूप से वामावर्त दिशा में आगे बढ़ते हैं. संगीत की गति के साथ नृत्य के कदम भी बदलते जाते हैं. इसमें बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी भाग ले सकते हैं.
परंपरागत रूप से गरबा के घेरे के बीच में मिट्टी का एक घड़ा रखा जाता है. इस घड़े में छोटे छेद होते हैं, जिनसे भीतर रखे दीपक का प्रकाश बाहर दिखाई देता है. इसे गर्भ और जीवन की ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है. कुछ आयोजनों में घड़े के स्थान पर मां अंबा की तस्वीर या प्रतिमा रखी जाती है. इसके चारों ओर लोग नृत्य करते हैं.
गरबा के साथ डांडिया रास का भी विशेष संबंध है. डांडिया में प्रतिभागी हाथों में लकड़ी की छोटी छड़ियां लेकर एक-दूसरे के साथ ताल मिलाते हैं. आधुनिक समय में गरबा और डांडिया रास के कई रूप एक साथ देखने को मिलते हैं. हालांकि, दोनों की अपनी अलग परंपराएं हैं.
गरबा में ढोल, ढोलक, मंजीरे और शहनाई जैसे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है. समय के साथ इसके संगीत और नृत्य शैली में बदलाव आया है. आज गरबा गुजरात की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है और नवरात्रि के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में इसके आयोजन किए जाते हैं.
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