नई दिल्ली : इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) का अनुमान है कि, एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 (ESY27) में एथेनॉल खरीद से गन्ने के रस, सिरप और बी-हेवी शीरे को बाहर रखने के फैसले से एकीकृत चीनी मिलों को चीनी की अधिक बिक्री के जरिए लाभ मिल सकता है। वहीं, मक्का आधारित एथेनॉल उत्पादकों के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है। यह जानकारी 21 अक्टूबर की एक शोध रिपोर्ट में दी गई है। एजेंसी का अनुमान है कि, एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी का इस्तेमाल पूरी तरह बंद होने से बाजार में लगभग 30 लाख टन अतिरिक्त चीनी उपलब्ध हो सकती है। मौजूदा कीमतों पर इससे 13,500 करोड़ रुपये से 15,000 करोड़ रुपये तक का राजस्व प्राप्त हो सकता है। इससे एकीकृत चीनी मिलों को एथेनॉल से होने वाले 10,000 करोड़ रुपये से अधिक के संभावित राजस्व नुकसान की काफी हद तक भरपाई करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, मक्का आधारित एथेनॉल की कीमत में 3 रुपये प्रति लीटर की कटौती कर इसे 68.86 रुपये प्रति लीटर करने से इस क्षेत्र की ब्याज, कर, मूल्यह्रास और परिशोधन से पहले की कमाई (EBITDA) में लगभग 1,500 करोड़ रुपये की कमी आ सकती है। Ind-Ra के अनुसार, मक्का की बढ़ती कीमतों के कारण वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही से मुनाफे पर दबाव और बढ़ने की आशंका है।एजेंसी का अनुमान है कि, एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2026-27 में चीनी आधारित कच्चे माल की हिस्सेदारी एथेनॉल खरीद में कम दोहरे अंकों के स्तर पर रह सकती है, जबकि 2025-26 में यह लगभग 25 प्रतिशत थी। अब सी-हेवी शीरा ही चीनी उद्योग से संबंधित एकमात्र पात्र कच्चा माल होगा। इसके अलावा, भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अतिरिक्त अधिशेष चावल का अधिक आवंटन एथेनॉल आपूर्ति में संभावित कमी को पूरा करने में मदद कर सकता है।
Ind-Ra ने कहा कि, केवल गन्ने पर आधारित स्वतंत्र डिस्टिलरी और अधिक कर्ज वाली ऐसी मक्का आधारित कंपनियों को ज्यादा जोखिम का सामना करना पड़ सकता है, जिनके पास कच्चे माल के विकल्प सीमित हैं। इसके विपरीत, एकीकृत चीनी मिलें और विविध प्रकार के कच्चे माल का उपयोग करने वाले उत्पादक इस नीतिगत बदलाव से बेहतर तरीके से निपट सकते हैं।एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी का उपयोग शून्य रहने के बावजूद, एजेंसी को उम्मीद है कि 2026-27 में भारत में चीनी की उपलब्धता और मांग के बीच संतुलन तंग बना रहेगा। देश में चीनी का सकल उत्पादन लगभग 2.8 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जबकि खपत करीब 2.85 करोड़ टन हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि उत्पादन मौजूदा अनुमान से अधिक नहीं होता है, तो घरेलू मांग पूरी करने के लिए चीनी का आयात करना पड़ सकता है।


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