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By पंकज चतुर्वेदी | Updated: October 24, 2026 07:01 IST2026-10-24T07:00:27+5:302026-10-24T07:01:03+5:30
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ग्रीन इंडिया मिशन पर ऑडिट रिपोर्ट के आंकड़े चिंता पैदा करते हैं. 2015-16 से 2024-25 के बीच मिशन का लक्ष्य लगभग 14 लाख हेक्टेयर में वन व वृक्ष आच्छादन बढ़ाना था. रिपोर्ट के अनुसार वास्तविक बढ़ोत्तरी करीब 30 हजार हेक्टेयर रही, यानी लगभग 97.57 प्रतिशत कम. बिगड़े वनों को सुधारने के इतने ही लक्ष्य के सामने काम सवा लाख हेक्टेयर से भी कम पर हुआ. ऑडिट ने कमजोर योजना, ढीले वित्तीय प्रबंधन, अधूरी निगरानी और विभागों के बीच तालमेल की कमी को गिनाया है. पर इन खामियों के पीछे एक गहरी भूल छिपी है: हम पौधे रोपने को ही जंगल बनाना मान बैठे हैं.
भारतीय वन सर्वेक्षण की ताजा गणना में वन आच्छादन लगभग 21.71 प्रतिशत और वृक्ष आच्छादन करीब 2.91 प्रतिशत बताया गया है. कुल हरित आवरण करीब 24.62 प्रतिशत हुआ. यह तस्वीर आश्वस्त करती है, पर सवाल उस पैमाने का है जिससे यह नापी गई. गणना में एक हेक्टेयर या उससे बड़े ऐसे भू-खंड जोड़ लिए जाते हैं जहां कम से कम दस प्रतिशत भूमि पर वृक्षों का छत्र हो. भूमि निजी बाग हो या व्यावसायिक रोपण, इससे फर्क नहीं पड़ता. यानी आम का बाग, सफेदे की कतारें और शहर की हरियाली, सब ‘आच्छादन’ में गिने जाते हैं. संयुक्त राष्ट्र के मानदंड खेती और शहरी भूमि के पेड़ों को जंगल नहीं मानते. तब ‘हरित आवरण’ का बढ़ना और ‘जंगल’ का बचना अलग-अलग बातें हैं. एक आंकड़ा बढ़ सकता है और दूसरा घट सकता है.
पेड़ों की गिनती से जंगल नहीं बनता. जंगल एक जीवित व्यवस्था है. उसमें ऊंचे वृक्ष, मझोले पेड़, झाड़ियां, घास, लताएं, पत्तियों की परत, मिट्टी के नीचे की फफूंद और सूक्ष्मजीव, कीट-पतंगे, पक्षी और वन्यजीव सब एक-दूसरे पर टिके रहते हैं. यह संतुलन दशकों में बनता है, अक्सर सदियों में. वर्षा का जल इसकी जड़ों और पत्तियों की परत में रुककर धीरे-धीरे भूजल बनता है. ऐसे जंगल की जगह एक ही प्रजाति के पेड़ कतार में लगा देने से हरे रंग की उपस्थिति तो बढ़ जाती है, पर जैव-विविधता, जल-संग्रहण और मिट्टी की सेहत वापस नहीं आती. एकल प्रजाति का रोपण प्रशासन के लिए सुविधाजनक है. उसे गिनना आसान है और रिपोर्ट में अच्छा दिखता है. लेकिन पारिस्थितिकी के लिए वह अक्सर एक हरा रेगिस्तान साबित होता है.
सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि जंगल के बदले जो रोपण हुआ, वह बराबरी का नहीं था. 2003 के बाद लगभग 20 हजार वर्ग किलोमीटर घने जंगल गैर-वन कार्यों के लिए अधिसूचित हुए. उनकी भरपाई में लगभग 11 हजार वर्ग किलोमीटर में पेड़ लगाए गए, और वह भी ऐसी जगह जहां पहले जंगल था ही नहीं. ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के अनुसार 2001 से 2018 के बीच देश ने करीब 18 लाख हेक्टेयर वन और वृक्ष आच्छादन खोया. सबसे ज्यादा चोट नगालैंड, त्रिपुरा, मेघालय और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों पर पड़ी, जो अपनी प्राकृतिक छटा के लिए जाने जाते हैं. इसके बाद मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र का नंबर आया. वन सर्वेक्षण ने 2011 में खुद माना था कि कागजों में दर्ज वन-भूमि के एक बड़े हिस्से पर असल में जंगल नहीं था.
कैग की रिपोर्ट इससे भी कड़वी बात कहती है. कुछ रोपणों में अकेशिया ऑरिकुलिफाॅर्मिस जैसी प्रजाति लगाई गई, जिसे ऑडिट ने आक्रामक प्रजाति माना. जो पौधा स्थानीय वनस्पति को दबा दे और स्थानीय पारिस्थितिकी को चोट पहुंचाए, उसे लगाना बहाली नहीं, उल्टा नुकसान है. हमारा अनुभव भी यही रहा है. विलायती बबूल जैसी बाहरी प्रजातियां कई इलाकों में चरागाह और स्थानीय पेड़ों को निगल चुकी हैं. तेज बढ़ने वाली कुछ विदेशी प्रजातियां पानी भी ज्यादा पीती हैं.
जलवायु संकट के दौर में जंगल केवल सुंदर दृश्य या कार्बन सोखने का साधन नहीं हैं, वे पारिस्थितिक आधारभूत ढांचा हैं. वे मिट्टी को बांधते हैं, जलग्रहण क्षेत्रों की रक्षा करते हैं, वर्षा के जल को सोखकर नदियों और भूजल को धीरे-धीरे लौटाते हैं, बाढ़ और कटाव का असर घटाते हैं और भीषण गर्मी में आसपास का तापमान थामते हैं. यह काम वही पेड़ ठीक से कर पाते हैं जो इस भूमि और इसके मौसम के साथ हजारों साल में ढले हैं.
साल, सागौन, महुआ, पीपल, बरगद, नीम, आम, जामुन, अर्जुन, खेजड़ी, तेंदू जैसे देसी पेड़ स्थानीय वर्षा, मिट्टी और कीट-पक्षियों के साथ तालमेल में उगते हैं. उनके फल-फूल-पत्ते पक्षियों और जानवरों का भोजन बनते हैं और उनकी छांव में ऐसी जैव-विविधता पनपती है जिसे कोई आयातित प्रजाति नहीं दे सकती. उनमें से अनेक पेड़ ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की आजीविका, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा से अलग नहीं किए जा सकते. महुआ, तेंदू, चिरौंजी, आंवला और ईंधन-चारे का सहारा कितने ही परिवारों के लिए सीधे जंगल से जुड़ा है.
लेखक: पंकज चतुर्वेदी
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