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इजरायल की राजनीति में गादी आइजनकोट प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बड़े विरोधी बनकर उभरे हैं. अगर उनका गठबंधन 61 सीटों का आंकड़ा जुटा लेता है, तो वह देश के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं.
आइजनकोट इजरायली सेना के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं. वह नेतन्याहू सरकार में मंत्री भी थे, लेकिन जून 2024 में सरकार से अलग हो गए. गाजा युद्ध, हमास, ईरान और फिलिस्तीन को लेकर उनका रुख काफी सख्त है. हालांकि, वह नेतन्याहू की युद्ध नीति की आलोचना भी करते रहे हैं. आइए 5 पॉइंट में समझते हैं कि इन मुद्दों पर आइजनकोट की क्या सोच है.
1. हमास को खत्म करना चाहते हैं आइजनकोट
आइजनकोट हमास को इजरायल की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानते हैं. उनका कहना है कि हमास के सैन्य ढांचे को खत्म करना जरूरी है. सितंबर 2026 में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने साफ कहा था कि जो राजनीतिक दल हमास को आतंकी संगठन नहीं मानता और उसे खत्म करने की बात स्वीकार नहीं करता, वह उनकी सरकार में शामिल नहीं हो सकता.
वह गाजा से हमास का शासन खत्म करने के पक्ष में हैं. हालांकि, उनका मानना है कि सिर्फ सैन्य कार्रवाई से इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा. इसके लिए कूटनीतिक कोशिशें भी जरूरी हैं.
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2. ईरान को इजरायल के लिए बड़ा खतरा मानते हैं
आइजनकोट ईरान को इजरायल के सामने सबसे बड़ी बाहरी सुरक्षा चुनौती मानते हैं. उनकी चिंता खास तौर पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है. वह नहीं चाहते कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की स्थिति में पहुंचे.
हालांकि, वह ईरान के खिलाफ लगातार सैन्य कार्रवाई के बजाय आर्थिक दबाव और बातचीत को भी जरूरी मानते हैं. उनका मानना है कि आर्थिक दबाव बनाकर ईरान को पीछे हटने के लिए मजबूर किया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर वह ईरान के परमाणु ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई के भी समर्थक हैं. लेकिन वह ईरान में सत्ता बदलने को आसान या व्यावहारिक लक्ष्य नहीं मानते.
3. फिलिस्तीन के लिए अलग देश बनाने के विरोधी
आइजनकोट फिलिस्तीन के लिए अलग देश बनाने यानी दो-राष्ट्र समाधान के विरोधी हैं. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उन्होंने कभी दो देशों के समाधान का समर्थन नहीं किया. वह वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गाजा में फिलिस्तीनी देश बनाने के विचार के खिलाफ हैं.
वह वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के विस्तार के भी समर्थक हैं. उन्होंने कहा था कि वह यहूदी बस्तियों के विचार में विश्वास रखते हैं. हालांकि, सितंबर 2026 में उन्होंने यह भी कहा कि इन बस्तियों को इजरायल के सुरक्षा हितों और कानून के दायरे में होना चाहिए.
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4. ‘दहिया डॉक्ट्रिन’ बनाने में रही अहम भूमिका
आइजनकोट का नाम इजरायली सेना की ‘दहिया डॉक्ट्रिन’ से भी जुड़ा है. यह सैन्य नीति 2006 में लेबनान के बेरूत स्थित दहिया इलाके में हुई तबाही के बाद चर्चा में आई थी. उस समय आइजनकोट इजरायली सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख थे.
2008 में उन्होंने कहा था कि भविष्य में लेबनान के जिन गांवों से इजरायल पर हमला होगा, वहां भारी सैन्य ताकत का इस्तेमाल किया जाएगा. उन्होंने बड़े पैमाने पर नुकसान और तबाही की बात भी कही थी. उनके मुताबिक, ऐसे गांवों को सैन्य ठिकानों की तरह देखा जाएगा. मार्च 2026 में भी उन्होंने इस नीति को फिर लागू करने की मांग की थी. इस नीति की आलोचना होती रही है, क्योंकि इसमें आम लोगों के इलाकों पर भी बड़े हमले किए जाने का खतरा है.
5. गाजा युद्ध के शुरुआती महीनों में नेतन्याहू सरकार का हिस्सा थे
अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध शुरू होने के समय आइजनकोट नेतन्याहू की आपातकालीन सरकार में मंत्री बने थे. उनके पास कोई विभाग नहीं था. वह युद्ध कैबिनेट में पर्यवेक्षक के तौर पर भी शामिल थे. जून 2024 में वह बेनी गैंट्ज के साथ सरकार से अलग हो गए.
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आइजनकोट ने नेतन्याहू पर गाजा युद्ध को लेकर गलत रणनीति अपनाने और राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया था. इस युद्ध में उन्होंने अपने बेटे और दो भतीजों को भी खोया. इससे पहले 2018 में गाजा में हुए ‘ग्रेट मार्च ऑफ रिटर्न’ के दौरान भी वह इजरायली सेना के प्रमुख थे. उस समय इजरायली सैनिकों की गोलीबारी में करीब 189 फिलिस्तीनी प्रदर्शनकारियों की मौत हुई थी. संयुक्त राष्ट्र के जांच आयोग ने कहा था कि इस दौरान मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन के पर्याप्त आधार मिले थे.
नेतन्याहू से कम सख्त नहीं हैं आइजनकोट
गादी आइजनकोट को नेतन्याहू का बड़ा विरोधी माना जाता है, लेकिन फिलिस्तीन और इजरायल की सुरक्षा के मुद्दे पर उनका रुख भी सख्त है. नेतन्याहू की तरह वह भी फिलिस्तीन के लिए अलग देश बनाने के पक्ष में नहीं हैं. वह वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के विस्तार का समर्थन करते हैं और हमास को खत्म करना चाहते हैं. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भी वह इजरायल के लिए बड़ा खतरा मानते हैं.
दोनों के बीच बड़ा अंतर गाजा युद्ध को संभालने की रणनीति को लेकर है. आइजनकोट नेतन्याहू की युद्ध नीति और सरकार के फैसलों की आलोचना करते रहे हैं. यानी नेतन्याहू के विरोधी होने के बावजूद कई अहम मुद्दों पर उनकी सोच भी काफी सख्त है.
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हमास को आतंकी संगठन मानने की शर्त पर अड़े
आइजनकोट ने अपनी अगली सरकार में शामिल होने वाले दलों के सामने एक शर्त रखी है. उनका कहना है कि जो पार्टी हमास को आतंकी संगठन नहीं मानती और उसे खत्म करने की बात स्वीकार नहीं करती, वह उनकी सरकार में शामिल नहीं हो सकती. लेकिन उनकी संभावित सहयोगी पार्टी राम (Ra’am) के प्रमुख मंसूर अब्बास ने इस मुद्दे पर हमास को आतंकी संगठन कहने से इनकार कर दिया है. गुरुवार को राष्ट्रपति इसाक हर्जोग के साथ बैठक में अब्बास ने आइजनकोट को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने की सिफारिश की. हालांकि, उन्होंने हमास को लेकर अपना रुख साफ नहीं किया.
‘हम फिलिस्तीनियों के बीच पुल बने रहना चाहते हैं’
अब्बास ने कहा कि उनकी पार्टी लंबे समय से राजनीतिक हिंसा का विरोध करती रही है. उन्होंने कहा कि उनसे बार-बार अपनी वफादारी साबित करने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए. अब्बास के मुताबिक, वह फिलिस्तीनियों और दूसरे पक्ष के बीच एक पुल की तरह बने रहना चाहते हैं. इससे उन्हें दोनों पक्षों को प्रभावित करने का मौका मिलेगा.
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उन्होंने यह भी कहा कि हमास को आतंकी संगठन कहने से उनके और उनके परिवार के लिए खतरा पैदा हो सकता है. अब्बास ने दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया. उनका कहना है कि हमास समेत सभी सशस्त्र संगठनों को हथियार छोड़ देने चाहिए.
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