Mob Lynching in India: शुक्रवार को जारी हुई शुक्रवार को सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म की रिपोर्ट ने सभी को हैरान कर दिया है. जिसके मुताबिक 2025 में देश भर में 14 मॉब लिंचिंग के मामले सामने आए हैं. जिनमें से 8 में मुस्लिम नौजवानों की मौत हूई है.
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Mob Lynching in India: एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि साल 2025 के दौरान देश में मॉब लिंचिंग की 14 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें आठ मुसलमानों की मौत हो गई. वहीं, देशभर में हुई 28 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में चार लोगों की जान गई और कम से कम 360 लोग घायल हुए. खास बात यह है कि इन सभी 14 घटनाओं में मुतास्सिर होने वाले मुसलमान थे.
शुक्रवार को जारी रिपोर्ट में खुलासा
यह रिपोर्ट शुक्रवार को सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म (CSSS) की ओर से जारी की गई. रिपोर्ट मीडिया में आई उन खबरों के आधार पर तैयार की गई है, जो सांप्रदायिक दंगों, मॉब हिंसा और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत से जुड़े अपराधों से संबंधित थीं.
क्या कहती है रिपोर्ट
रिपोर्ट के मुताबिक, लिंचिंग की घटनाओं में 14 मुसलमान घायल भी हुए हैं. इन हमलों के पीछे दो मुख्य कारण सामने आए हैं- पहला, गौ-रक्षा के नाम पर की जाने वाली हिंसा, जिसे रिपोर्ट में अक्सर वसूली का जरिया बताया गया है, और दूसरा, ‘लव जिहाद’ या अंतरधार्मिक प्यार या शादी के आरोप.
इसके अलावा चोरी के आरोप, अवैध घुसपैठ की आशंका, पाकिस्तान समर्थक नारे लगाने के आरोप और जय श्री राम का नारा लगाने से इनकार जैसे कारण भी हमलों की वजह बने हैं
मॉब लिंचिंग में मामूली बढ़ोतरी
CSSS के मुताबिक, 2024 की तुलना में 2025 में मॉब लिंचिंग की घटनाओं में मामूली बढ़ोतरी हुई है. वर्ष 2024 में ऐसी 13 घटनाएं दर्ज की गई थीं. 2025 में हुई 14 घटनाओं में से चार उत्तर प्रदेश में, तीन मध्य प्रदेश में, जबकि महाराष्ट्र, उत्तराखंड, कर्नाटक, झारखंड, राजस्थान, ओडिशा और बिहार में एक-एक घटना दर्ज की गई.
रिपोर्ट में कहा गया है कि मॉब लिंचिंग के मामलों में राज्य की भूमिका कई स्तरों पर गंभीर रूप से चिंताजनक रही है. अक्सर सरकारी प्रतिक्रिया उदासीन, देरी वाली या कुछ मामलों में आरोपियों से मिलीभगत जैसी नजर आई. इससे पीड़ितों को न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया कमजोर पड़ी है.
मोहम्मद अशरफ की लिंचिंग का मामला
रिपोर्ट में कर्नाटक के मंगलुरु जिले में 39 साल के मोहम्मद अशरफ की लिंचिंग का उदाहरण देते हुए इसे संस्थागत विफलता बताया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने शुरुआत में इस हत्या को लिंचिंग मानने से इनकार करते हुए इसे ‘अस्वाभाविक मौत’ बताया था. बाद में नागरिक संगठनों के दबाव और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट आने के बाद ही मामला हत्या की धाराओं में दर्ज किया गया.
पुलिस ने शुरुआत में कार्रवाई न करने का कारण यह बताया था कि अशरफ ने कथित तौर पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा लगाया था, जिसे उनके परिवार ने सिरे से खारिज किया और कहा कि वह ऐसी बातें कहने की स्थिति में ही नहीं थे.
अखलाक का केस वापस लेने को बताया फिक्र की बात
रिपोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मोहम्मद अखलाक की लिंचिंग के आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की कोशिश को ‘बेहद चिंताजनक’ बताया है. रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे कदम न केवल जवाबदेही से इनकार करते हैं, बल्कि गौ-रक्षा से जुड़ी हिंसा में दंडहीनता को बढ़ावा देने का खतरा भी पैदा करते हैं.
इरफान इंजीनियर, नेहा दाभाडे और दिया पाडलकर द्वारा लिखी गई यह रिपोर्ट ‘द इंडियन एक्सप्रेस’, ‘द हिंदू’, ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’, ‘सहाफत’ और ‘इंकलाब’ जैसे अखबारों की रिपोर्टिंग पर आधारित है.
हिंसा के लिए ठहराया गया सिर्फ मुसलमानों को जिम्मेदार
CSSS का कहना है कि कई बड़े सांप्रदायिक दंगों में सरकारी बयान और मीडिया का एक वर्ग ऐसी कहानियां गढ़ता रहा, जिनमें हिंसा के लिए सिर्फ मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराया गया. आधिकारिक बयानों में मुस्लिम ‘मास्टरमाइंड’ या ‘सरगना’ गढ़े गए और इसके बाद मुसलमानों के खिलाफ असमान रूप से गिरफ्तारी और सख्त पुलिस कार्रवाई की गई.
समी सिद्दीकी उप्र के शामली जिले के निवासी हैं, और 6 से दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे हैं. राजनीति, मिडिल ईस्ट की समस्या, देश में मुस्लिम माइनॉरिटी के मसले उनके प्रिय विषय हैं. इन से जुड़ी सटीक, सत्य …और पढ़ें
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