बिलासपुर। 30 अक्टूबर 2026| छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा है, मध्य प्रदेश के पुनर्गठन से पहले एक ही राज्य का हिस्सा रहे क्षेत्रों के बीच स्थान परिवर्तन को सामान्य रूप से दूसरे राज्य में पलायन मानकर अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र का दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में राज्य पुनर्गठन से जुड़ी परिस्थितियों, पुराने अभिलेखों और लागू कानूनी प्रावधानों पर विचार करना जरूरी है। कोर्ट ने राजनांदगांव जिले की रहने वाली पल्लवी मेश्राम की याचिका स्वीकार करते हुए उनके जाति प्रमाणपत्र के दावे को खारिज करने वाले दोनों आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने सक्षम अधिकारी को नए सिरे से विचार कर 60 दिन के भीतर कारण सहित निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
पढ़िए क्या है मामला?
छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ निवासी पल्लवी मेश्राम ने महार अनुसूचित जाति का स्थायी सामाजिक प्रास्थिति प्रमाणपत्र जारी करने की मांग की थी। SDM अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), डोंगरगढ़ ने 12 अगस्त 2022 को उनका आवेदन खारिज कर दिया था। एसडीएम के आदेश को चुनौती देते हुए पल्लवी ने अपर कलेक्टर के कोर्ट में अपील पेश की थी। मामले की सुनवाई के बाद एसडीएम के आदेश को सही ठहराते हुए अपर कलेक्टर ने अपील खारिज कर दी थी। कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा, अपीलार्थी पल्लवी के पूर्वज मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के निवासी थे और परिवार के पास 10 अगस्त 1950 से पहले वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र में निवास का पर्याप्त दस्तावेजी प्रमाण नहीं है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को दी ये जानकारी
याचिका की सुनवाई जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता लव कुमार रामटेके ने कहा कि उनके पिता वर्ष 1987 से डोंगरगढ़ में रह रहे हैं और पल्लवी का जन्म भी इसी क्षेत्र में हुआ। मध्य प्रदेश के पुनर्गठन से पहले बालाघाट और डोंगरगढ़ एक ही राज्य में थे। इसलिए पुराने निवास संबंधी दस्तावेजों को राज्य पुनर्गठन की परिस्थितियों के साथ देखकर दावे पर निर्णय लिया जाना चाहिए।
अधिवक्ता रामटेके ने सुप्रीम कोर्ट के पंकज कुमार बनाम झारखंड राज्य और अखिलेश प्रसाद बनाम झारखंड लोक सेवा आयोग के फैसलों का हवाला दिया। राज्य सरकार ने दलील दी कि याचिकाकर्ता 1950 से पहले वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अपने पूर्वजों के निवास का विश्वसनीय प्रमाण पेश नहीं कर सकी और अधिकारियों ने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही निर्णय लिया था।
पढ़िए हाई कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
हाई कोर्ट ने माना कि बालाघाट और डोंगरगढ़ पहले अविभाजित मध्य प्रदेश का हिस्सा थे। इसलिए इस मामले को सामान्य अंतरराज्यीय पलायन मानकर नहीं देखा जा सकता। केवल 1950 से पहले वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र के दस्तावेज नहीं होने के आधार पर दावा खारिज करना पर्याप्त नहीं है। अधिकारियों को पुराने अभिलेखों, राज्य पुनर्गठन की परिस्थितियों और 2013 के संबंधित नियमों के तहत उपलब्ध दस्तावेजों का मूल्यांकन करना चाहिए था। अदालत ने दोनों पुराने आदेश निरस्त कर मामला सक्षम अधिकारी को वापस भेज दिया है।
राधाकिशन शर्मा: शिक्षा: बीएससी, एमए राजनीति शास्त्र व हिन्दी साहित्य में मास्टर डिग्री, वर्ष 1998 से देशबंधु से पत्रकारिता की शुरुआत। हरिभूमि व दैनिक भास्कर में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया। 2007 से जुलाई 2024 तक नईदुनिया में डिप्टी न्यूज एडिटर व सिटी चीफ के पद पर कार्य का लंबा अनुभव। 1 अगस्त 2024 से एनपीजी न्यूज में कार्यरत।