बिलासपुर। 04 नवंबर 2026| भिलाई एजुकेशन ट्रस्ट के संचालन और प्रबंधन में भिलाई स्टील प्लांट BSP के प्रतिनिधित्व को लेकर चल रहे विवाद में छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता को दीवानी अदालत जाने की छूट दी है।
कोर्ट ने कहा है, ट्रस्ट के मूल विलेख में संशोधन की वैधता और उससे जुड़े पक्षकारों के अधिकारों की जांच सक्षम दीवानी अदालत में अधिक उपयुक्त तरीके से हो सकती है।
जानिए क्या है मामला?
भिलाई महिला महाविद्यालय की सहायक प्राध्यापक डॉ. सुनीता जी. राव ने वर्ष 2021 में याचिका दायर कर पांच दिसंबर 2018 को पंजीकृत संशोधित ट्रस्ट विलेख को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि तीन जून 1978 को बने मूल ट्रस्ट विलेख के खंड 12 में प्रावधान था कि बीएसपी के अधिकारियों की संख्या कुल न्यासियों की एक-तिहाई से कम नहीं होगी। आरोप है कि संशोधन के जरिए यह प्रावधान हटा दिया गया, जिससे वर्ष 2018 के बाद ट्रस्ट के प्रबंधन में बीएसपी के अधिकारियों का प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया।
BSP ने महाविद्यालय के लिए दी थी 14 एकड़ जमीन
याचिकाकर्ता के अनुसार, ट्रस्ट की स्थापना में बीएसपी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उसने भिलाई महिला महाविद्यालय, छात्रावास और अन्य सुविधाओं के निर्माण के लिए करीब 14 एकड़ जमीन आवंटित की थी।
याचिका में आरोप लगाया गया कि संशोधन के जरिए ट्रस्ट का नियंत्रण निजी प्रतिवादियों के हाथों में केंद्रित कर दिया गया और मूल उद्देश्य तथा प्रबंधन व्यवस्था को कमजोर किया गया। याचिकाकर्ता ने संशोधन की प्रक्रिया और सार्वजनिक न्यास के पंजीयक द्वारा उसके पंजीकरण पर भी सवाल उठाई थीं।
याचिका में ट्रस्ट के प्रबंधन पर कई अन्य आरोप भी लगाए गए थे। इनमें करीब 7.13 करोड़ रुपये के पट्टा किराये का बकाया, महाविद्यालय के प्रशासन में हस्तक्षेप, सहायक प्राध्यापकों की समयपूर्व सेवानिवृत्ति और वेतन रोके जाने जैसे मुद्दे शामिल थे। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि संशोधित विलेख निरस्त किया जाए और बीएसपी को ट्रस्ट का प्रभार लेकर मूल विलेख के अनुसार न्यासियों की नियुक्ति करने का निर्देश दिया जाए।
दीवानी अदालत में होगा विवाद का परीक्षण
राज्य शासन, ट्रस्ट के मानद सचिव और बीएसपी की ओर से याचिका की सुनवाई पर आपत्ति करते हुए कहा गया कि विवाद ट्रस्ट के प्रबंधन, संशोधित विलेख की वैधता और पक्षकारों के अधिकारों से जुड़ा है। इसमें दस्तावेजों, प्रस्तावों और संशोधन की प्रक्रिया की जांच जरूरी है, जिसके लिए सक्षम दीवानी अदालत उचित मंच है।
याचिका की सुनवाई जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने माना कि संशोधन की वैधता तय करने के लिए मूल और संशोधित ट्रस्ट विलेख, संबंधित प्रस्तावों, अपनाई गई प्रक्रिया तथा लागू कानूनी प्रावधानों की जांच करनी होगी। कोर्ट ने कहा कि वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होना रिट याचिका पर सुनवाई की पूर्ण रोक नहीं है, लेकिन मौजूदा मामले में विवाद का परीक्षण सक्षम अदालत में अधिक उपयुक्त होगा।
हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए, याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार उपलब्ध उपाय अपनाने की छूट दी। कोर्ट ने साफ किया कि संशोधित ट्रस्ट विलेख वैध है या अवैध, इस मुद्दे पर सक्षम अदालत स्वतंत्र रूप से फैसला करेगी।
राधाकिशन शर्मा: शिक्षा: बीएससी, एमए राजनीति शास्त्र व हिन्दी साहित्य में मास्टर डिग्री, वर्ष 1998 से देशबंधु से पत्रकारिता की शुरुआत। हरिभूमि व दैनिक भास्कर में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया। 2007 से जुलाई 2024 तक नईदुनिया में डिप्टी न्यूज एडिटर व सिटी चीफ के पद पर कार्य का लंबा अनुभव। 1 अगस्त 2024 से एनपीजी न्यूज में कार्यरत।