Doctor's Day 2026: कौन हैं 'देवताओं के डॉक्टर'? ब्रह्मांड के पहले 'एस्थेटिक सर्जन' औ – India.Com

Doctor’s Day 2026: हर साल 1 जुलाई को पूरा देश ‘राष्ट्रीय डॉक्टर्स डे’ मनाता है. आधुनिक चिकित्सा विज्ञान आज ऑर्गन ट्रांसप्लांट, प्लास्टिक सर्जरी और एंटी-एजिंग थेरेपी पर गर्व करता है, लेकिन भारत की सनातन परंपरा में यह चिकित्सा विज्ञान लाखों वर्ष पुराना है. हमारे ऋग्वेद और पुराणों में एक ऐसे दैवीय डॉक्टरों के जोड़े का वर्णन है, जिन्हें ब्रह्मांड का पहला चिकित्सक माना जाता है. इन्हें हम अश्विनी कुमार के नाम से जानते हैं. आज डॉक्टर्स डे के इस विशेष अवसर पर आइए जानते हैं देवलोक के इन डॉक्टरों के उन अनसुने वैज्ञानिक रहस्यों को, जिन्हें जानकर आधुनिक मेडिकल साइंस भी हैरान रह जाता है.

शास्त्रों के अनुसार, अश्विनी कुमार कोई साधारण देवता नहीं, बल्कि स्वयं भगवान सूर्य के पुत्र हैं. पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्य देव का तेज इतना प्रचंड था कि उनकी पत्नी संज्ञा उसे सहन नहीं कर पा रही थीं. अपने तेज को संतुलित करने के लिए माता संज्ञा ने एक अश्व का रूप धारण किया और वन में तपस्या करने चली गईं. जब सूर्य देव को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने भी एक घोड़े अश्व का रूप धारण किया. इसी ‘अश्व’ रूप के मिलन से दो जुड़वां भाइयों का जन्म हुआ. घोड़े के रूप से उत्पन्न होने के कारण ही इन्हें ‘अश्विनी कुमार’ कहा गया. इनके व्यक्तिगत नाम ‘नासत्य’ और ‘दस्त्र’ हैं.

अश्विनी कुमारों को आयुर्वेद में चिर-यौवन और एस्थेटिक मेडिसिन का प्रतीक माना गया है. चिकित्सा के क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा और लोकप्रिय चमत्कार महर्षि च्यवन से जुड़ा है. आज हम और आप जिस ‘च्यवनप्राश’ का इस्तेमाल करते हैं, उसे लेकर आम धारणा यह है कि इसे च्यवन ऋषि ने बनाया था लेकिन शास्त्रों का सच इसके बिल्कुल विपरीत है.

वास्तव में, च्यवनप्राश की मूल रेसिपी और फॉर्मूला अश्विनी कुमारों के दिव्य चिकित्सा कक्ष की उपज थी. महर्षि च्यवन जब अत्यंत वृद्ध, जर्जर और कमजोर हो गए थे, तब इन दिव्य डॉक्टरों ने उनके कायाकल्प के लिए हिमालय की दुर्लभ जड़ी-बूटियों और अष्टवर्ग के पौधों को मिलाकर एक विशेष अवलेह यानि की पेस्ट तैयार किया. इसके सेवन से बूढ़े च्यवन ऋषि दोबारा पूरी तरह युवा, ऊर्जावान और कांतिवान हो गए चूंकि यह चमत्कारी औषधि च्यवन ऋषि के लिए विशेष रूप से बनाई गई थी, इसीलिए उनके सम्मान में अश्विनी कुमारों ने इसका नाम ‘च्यवन-प्राश’ रख दिया यानी च्यवन ऋषि इसके पहले उपभोक्ता या मरीज थे, इसके निर्माता नहीं.
आज का विज्ञान अंगों के प्रत्यारोपण को आधुनिक युग की खोज मानता है, लेकिन ऋग्वेद के अनुसार, अश्विनी कुमार शल्य-क्रिया (Surgery) में अनादि काल से निपुण थे. पुराणों में कथा है कि राजा दक्ष के यज्ञ के दौरान एक बड़ी दुर्घटना में एक देवता का सिर धड़ से अलग हो गया था. उस समय अश्विनी कुमारों ने ही अपनी अद्वितीय शल्य-चिकित्सा की शक्ति से उस कटे हुए सिर को दोबारा धड़ से जोड़ा और उन्हें नया जीवन दिया. शास्त्रों में दर्ज इस घटना को ब्रह्मांड की सबसे पहली ‘एस्थेटिक या प्लास्टिक सर्जरी’ माना जाता है. इसके अलावा, ऋग्वेद में यह भी वर्णन है कि उन्होंने युद्ध में घायल हुए घोड़ों और पक्षियों के कटे अंगों को जोड़कर उनके पैरों में लोहे के पैर (Prosthetic Legs) लगाए थे, जो उन्हें ब्रह्मांड का पहला पशु चिकित्सक (Veterinary Surgeon) भी बनाता है.

दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन काल में भी डॉक्टरों को अपने हक और सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ा था. पुराणों में कथा है कि देवराज इंद्र ने अश्विनी कुमारों को सोमरस पीने और यज्ञ का भाग लेने से रोक दिया था. इंद्र का तर्क था कि चूंकि ये वैद्य हैं और इलाज करने के लिए पृथ्वी पर इंसानों, गरीबों और पशुओं के बीच घूमते रहते हैं, इसलिए इनका स्तर देवताओं जैसा नहीं रहा लेकिन बाद में महर्षि च्यवन ने इंद्र के इस अहंकार को तोड़ा और यह सिद्ध किया कि मरीजों की सेवा करने वाला चिकित्सक सबसे पवित्र होता है. इसके बाद अश्विनी कुमारों को देवलोक में उनका सर्वोच्च सम्मान वापस मिला.
ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों को ‘नासत्य’ कहा गया है, जिसका अर्थ है ‘जो कभी असत्य नहीं हो सकते’ और ‘जिनका किया हुआ इलाज कभी असफल नहीं होता’.आज जब हम डॉक्टर्स डे मनाते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि जब कोई आधुनिक डॉक्टर अपनी रात की नींद, अपनी भूख और अपनी सुख-सुविधा छोड़कर किसी अनजान मरीज की जान बचाने के लिए थियेटर में खड़ा होता है, तो वह वास्तव में अश्विनी कुमारों की उसी दैवीय परंपरा और वैद्य धर्म को आगे बढ़ा रहा होता है. धरती के इन साक्षात भगवानों को शत-शत नमन!
डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.
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