23 सितंबर 2026 को भारत के निर्वाचन आयोग के भीतर की कलह उजागर हो गई. चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई. आरोप यह है कि आयोग के नाम पर बड़े फैसले लिए गए, लेकिन दोनों आयुक्तों को पहले से जानकारी तक नहीं दी गई. दोनों ने इन कार्रवाइयों को ‘अनधिकृत और अवैध’ कहा. विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से लेकर महाभियोग तक की मांग शुरू कर दी. हालांकि, चुनाव आयोग के भीतर खिटपिट पहली बार नहीं है…
भारत में यह सिलसिला शुरू कब और कहां से हुआ था?
चुनाव आयोग की शुरुआत 1950 में हुई. पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन थे. 1952 के पहले आम चुनाव में 17 करोड़ वोटरों में सिर्फ 15 प्रतिशत पढ़े-लिखे थे, लेकिन आयोग ने चुनाव करवा दिखाया. उस दौर में आयोग की छवि अच्छी थी, लेकिन भीतर की खिटपिट का एक बड़ा उदाहरण 1960 के दशक में सामने आया.
1962 में जम्मू-कश्मीर में चुनाव के दौरान मतपेटियों को लेकर समस्या आई. तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त केवीके सुंदरम ने खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से शिकायत की कि जम्मू में पीठासीन अधिकारियों का कामकाज खराब है और वे आयोग के निर्देशों का पालन नहीं कर रहे.
यह उस दौर की बात है जब पूरा आयोग सिर्फ एक मुख्य चुनाव आयुक्त होता था, लेकिन राज्य स्तर पर आयोग के अधिकारियों पर कंट्रोल की लड़ाई शुरू हो चुकी थी.
1990-96: टीएन शेषन के दौर में आयोग ‘संस्था’ बना
टीएन शेषन दिसंबर 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने. उन्होंने आयोग को सरकार के दबाव से आजाद रखने की कोशिश की. 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने 650 कंपनियों की अर्धसैनिक बल तैनात की, चुनाव चार बार स्थगित किया और चार चरणों में कराया.
लालू प्रसाद यादव ने उस वक्त शेषन के खिलाफ भड़क कर कहा था कि उन्हें भैंस पर बिठाकर गंगा में गिरा देंगे. शेषन की सबसे बड़ी लड़ाई आयोग के भीतर ही थी.
अक्टूबर 1993 में सरकार ने चुनाव आयोग में दो और चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिए- एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति. इसके साथ ही आयोग एक सदस्यीय से बहुसदस्यीय हो गया. शेषन ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.
जुलाई 1995 में कोर्ट ने साफ किया कि संविधान बहुसदस्यीय आयोग की परिकल्पना करता है और चुनाव आयुक्तों को भी फैसला लेने का अधिकार है. अगर तीनों सदस्यों की राय अलग हो तो बहुमत का फैसला लागू होगा.
गिल और कृष्णमूर्ति ने आरोप लगाया कि शेषन उन्हें आयोग के काम में शामिल नहीं कर रहे. शेषन पर आरोप था कि वे आयुक्तों को मीटिंग में नहीं बुलाते, कागजात नहीं दिखाते और अकेले फैसले लेते हैं.
एमएस गिल ने मीडिया से कहा था, ‘मुख्य चुनाव आयुक्त ने ऐसा व्यवहार किया जैसे हम मौजूद ही नहीं हैं.’ दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ पत्र लिखते रहे और आयोग का कामकाज प्रभावित हुआ.
शेषन ने जून 1995 में अमेरिका जाने से पहले अपनी शक्तियां डिप्टी चुनाव आयुक्त डीएस बग्गा को सौंप दीं. सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया और बग्गा को तुरंत गिल को चार्ज सौंपने का निर्देश दिया. कोर्ट ने कहा, ‘किसी भी व्यक्ति को उस संस्था से ऊपर नहीं रखा जा सकता जिसकी वह सेवा करता है.’
यह फैसला शेषन के लिए बड़ी हार था, लेकिन इससे साबित हुआ कि आयोग में कोई भी सदस्य ‘औपचारिक’ नहीं है.
2009: जब CEC ने आयुक्त को हटाने की सिफारिश की
जनवरी 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश भेज दी. आरोप था कि चावला कांग्रेस पार्टी के प्रति झुकाव रखते हैं और निष्पक्ष चुनाव नहीं करा सकते.
यह सिफारिश संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत की गई थी, जिसमें कहा गया है कि कोई अन्य चुनाव आयुक्त, मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना अपने पद से नहीं हटाया जा सकता.
सरकार ने इस सिफारिश को किनारे कर दिया. नवीन चावला पद पर बने रहे और बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त भी बने. इस घटना ने यह सवाल खड़ा किया कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश को दबाया जा सकता है, तो फिर आयोग की स्वतंत्रता का क्या मतलब है?
इस मामले ने यह भी दिखाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त का ‘मुख्य’ होना सिर्फ एक नाम नहीं है. वह दूसरों पर हावी हो सकता है और अगर वह निष्पक्ष नहीं है, तो भीतर कोई रोक नहीं है.
2024: अरुण गोयल का अचानक इस्तीफा
मार्च 2024 में लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा से कुछ दिन पहले चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने अचानक इस्तीफा दे दिया. उनका कार्यकाल नवंबर 2027 तक था.
मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के साथ मतभेद की वजह से उन्होंने यह कदम उठाया. चुनाव से ठीक पहले आयोग के एक सदस्य का जाना संस्था की स्थिरता पर सवाल खड़े करता है. बाद में खाली हुई सीट पर ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति हुई.
नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का दबदबा
आयोग की स्वतंत्रता पर सबसे गहरा सवाल नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर है. सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में अनूप बरनवाल केस में कहा था कि CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक समिति बनेगी. इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष का नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे. मोदी सरकार ने इसके बाद ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति) अधिनियम, 2023’ पारित कर दिया.
इस कानून में CJI की जगह एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया, जिसे प्रधानमंत्री नामित करते हैं. इसका मतलब यह हुआ कि चयन समिति में सरकार के पास बहुमत 2:1 का हो गया.
जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा, ‘क्या निष्पक्षता का कोई प्रदर्शन ही नहीं होना चाहिए?’ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की राय अलग-अलग रही. इसके बाद मामला संविधान पीठ को भेज दिया गया. ज्ञानेश कुमार इसी कानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले CEC हैं.
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठते सवालों की जड़ दो जगह है:
ज्ञानेश कुमार का मामला इन दोनों समस्याओं को एक साथ सामने लाता है. अगर आयोग के भीतर ही सदस्य यह कह रहे हैं कि उन्हें फैसलों की जानकारी नहीं दी जाती, तो बाहर से आयोग की निष्पक्षता पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है.
ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.
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