Explainer: क्या बच्चे के खिलाफ पुलिस दर्ज कर सकती है FIR? जानिए क्या कहता है Juvenile Justice Act – India.Com

Juvenile Act: आजकल छोटे बच्चों से जुड़े अपराध के मामले भी सामने आ रहे हैं. हाल ही में जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद एक नाबालिग को लेकर हुई कार्रवाई ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या किसी बच्चे के खिलाफ पुलिस FIR दर्ज कर सकती है?, भारत में किस उम्र से कानून अपराध मानता है? ऐसे कई सवाल लोगों के मन में हैं. चलिए आपके इन्हीं सवालों के जवाब हम इस खबर में देंगे.

बता दें भारत में कानून उम्र के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय करता है. 7 साल से कम उम्र के बच्चे के किसी भी काम को अपराध नहीं माना जाता. वहीं, 7 से 12 साल के बच्चों के मामले में उनकी समझ और मानसिकता को परखा जाता है. इसके अलावा, 12 से 18 साल तक के हर व्यक्ति को कानूनी रूप से नाबालिग माना जाता है. इस उम्र में कोई अपराध करता है तो Juvenile Justice Act के तहत कार्रवाई की जाती है.

Juvenile Justice Act कहता है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों के मामलों की सुनवाई जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) करेगा. यहां बच्चे के भविष्य, शिक्षा, काउंसलिंग और सुधार को प्राथमिकता दी जाती है. दूसरी ओर दोषी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत मुकदमा चलता है. उन्हें जेल, उम्रकैद या अन्य सजा मिल सकती है. हालांकि, 16 से 18 साल के बीच का कोई नाबालिग अगर ऐसा अपराध करता है, तो सजा 7 साल या उससे ज्यादा की हो सकती. लेकिन ऐसे मामलों में JJB पहले नाबालिग की मानसिक और शारीरिक का आकलन करता है. इसके बाद, बाल न्यायालय तय करती है कि उसका ट्रायल वयस्क की तरह होगा या नहीं.

अगर किसी नाबालिग के खिलाफ FIR दर्ज होती है, तो उसके साथ दूसरे आरोपी जैसा व्यवहार नहीं किया जाता. सबसे पहले पुलिस उसके माता-पिता या अभिभावक और प्रोबेशन अधिकारी को सूचना देती है. इसके बाद, बच्चे को 24 घंटे के अंदर JJB के सामने पेश करना होता. इस दौरान, नाबालिग को पुलिस लॉकअप या सामान्य जेल में नहीं रख सकती. जरूरत पड़ने पर उसे ऑब्जर्वेशन होम या प्लेस ऑफ सेफ्टी में रखा जाता है. नाबालिग से पूछताछ भी बच्चों के अनुकूल माहौल में की जाती, साथ ही पुलिस अनावश्यक बल या हथकड़ी का इस्तेमाल नहीं कर सकती.
बता दें कानून हर नाबालिग को कई विशेष अधिकार देता है. उसे मुफ्त कानूनी सहायता मिलती है. साथ ही नाबालिग की पहचान पब्लिक नहीं की जाती और मीडिया उसका नाम, फोटो या पता नहीं बता सकती है. बच्चे को अपनी भाषा न समझ आने पर दुभाषिए की सुविधा भी दी जाती है. अगर जरूरत पड़े, तो इलाज और भोजन की व्यवस्था की जाती है. सबसे बड़ी बात यह है कि बच्चे को वयस्क आरोपियों के साथ ट्रायल नहीं किया जा सकता. कानून उसे तब तक निर्दोष मानता है, जब तक अपराध साबित न हो जाए.

भारत का Juvenile Justice कानून इस सोच पर आधारित है कि बच्चे गलती कर सकते हैं, लेकिन उन्हें सुधारने का मौका भी मिलना चाहिए. इसलिए ज्यादातर मामलों में नाबालिगों को जेल भेजने की बजाय काउंसलिंग, शिक्षा और सामाजिक सुधार पर जोर दिया जाता. सिर्फ बहुत गंभीर अपराधों में 16-18 साल के बच्चों के लिए वयस्क ट्रायल किया जाता है.
1. कितने साल के बच्चे पर FIR नहीं होती?
भारतीय कानून 7 साल से कम उम्र के बच्चे के किसी भी काम को अपराध नहीं मानता. इसलिए उस पर सामान्य आपराधिक जिम्मेदारी लागू नहीं होती
2. क्या 16-18 साल के बच्चे को पुलिस ट्रायल में ले जा सकती है?
इसका जवाब – हां है, लेकिन सिर्फ जघन्य अपराध में और Juvenile Justice Board की जांच के बाद ही ऐसा होता.
3. क्या पुलिस नाबालिग को लॉकअप में रख सकती है?
इस सवाल का जवाब नहीं है. क्योंकि कानून इसकी अनुमति नहीं देता
4. क्या नाबालिग को मौत या उम्रकैद की सजा हो सकती है?
इसका जवाब भी नहीं है. दरअसल, Juvenile Justice कानून ऐसी सजा की अनुमति नहीं देता.
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गार्गी संतोष Zee Media के India.com में सब-एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं. वह हाइपरलोकल, नेशनल और वर्ल्ड न्यूज सेक्शन संभालती हैं. गार्गी को लाइफस्टाइल, स्पोर्ट्स और वायरल … और पढ़ें
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