Ganesh Chaturthi 2025 : हिंदू धर्म में गणेश चतुर्थी 2025 का पर्व बेहद खास महत्व रखता है। इस साल यह त्योहार 26 अगस्त को मनाया जाएगा। 10 दिनों तक चले वाले इस पर्व के बीच बप्पा के भक्त गणपति दर्शन के लिए उनके फेमस मंदिर जाएंगे। भगवान गणेश के ज्यादातर सभी मंदिरों में आपने उनकी प्रतिमा को एक सूंड धारण किए हुए अपनी सवारी मूषक के साथ देखा होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं गणपति का एक ऐसा अनोखा मंदिर भी है, जिसमें गणपति की मूर्ति की एक नहीं बल्कि तीन सूंड और सवारी चूहा नहीं बल्कि मोर है।
त्रिशुंड मयुरेश्वर गणपति मंदिर, पुणे के मयूरेश्वर गांव में स्थित है। इस मंदिर में गणपति भगवान अपने दुर्लभ और अलग रूप में विराजते हैं। उनकी इस मूर्ति की एक नहीं बल्कि तीन सूंड, 6 हाथ और वाहन मूषक की जगह मोर है। गणपति के इस मंदिर का नाम भगवान मयूरेश्वर के नाम पर रखा गया है, जो गणेश भगवान का ही एक रूप है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणपति के इस रूप को बाधाओं को दूर करने वाला और कला, ज्ञान और समृद्धि का संरक्षक माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार गणपति की ये तीन सूंड उनकी बहुमुखी क्षमताओं और शक्तियों का प्रतीक हैं। जो उनके भौतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक पहलुओं को एक साथ नियंत्रित करने की क्षमता का प्रतीक मानी गई हैं।
त्रिशुंड मयुरेश्वर गणपति मंदिर का इतिहास कई 100 वर्ष पुराना है। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भीमजीगिरि गोसावी ने 18वीं सदी में करवाया था। यह मंदिर लोंक बीच अपनी सुंदर वास्तुकला, जटिल नक्काशी और शांत वातावरण की वजह से काफी फेमस है। इस मंदिर में राजस्थान, मालवा और दक्षिण भारत की स्थापत्य शैलियों का मिश्रण देखने को मिलेगा। लोककथाओं के अनुसार, विघ्नेश्वर नाम के एक संत को त्रिशुंड मयूरेश्वर की यह मूर्ति जमीन में दबी मिली थी। जिसके बाद गणपति जी के इस रूप की पूजा यहां की जाती है।
त्रिशुंड मयुरेश्वर गणपति मंदिर में भगवान गणेश की मूर्ति में बप्पा की तीन सूंड और छह भुजाओं वाले रूप को दिखाया गया है। इतना ही नहीं उनके इस रूप में वो अपनी सवारी मूषक पर नहीं बल्कि मोर पर सवार हैं। बता दें, इस मंदिर का नाम भगवान मयूरेश्वर के नाम पर रखा गया है, जो गणेश के एक ऐसे रूप हैं जिन्हें विघ्नहर्ता और कला, ज्ञान और समृद्धि का संरक्षक माना जाता है। जबकि त्रिशुंड मयूरेश्वर गणपति की मूर्ति में उकेरी गई तीन सूंड उनकी बहुमुखी क्षमताओं और शक्तियों का प्रतीक मानी जाती हैं। माना जाता है कि गणपति की ये तीन सूंड जीवन के 3 विभिन्न पहलुओं- भौतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक को एक साथ संभालने की उनकी क्षमता का प्रतिनिधित्व करती हैं। वहां के स्थानीय नागरिकों के अनुसार गणपति भगवान की ये तीन सूंड ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पवित्र त्रिमूर्ति का प्रतीक हैं, जो सृजन, पालन और संहार का प्रतिनिधित्व करती हैं। कुछ अन्य लोग इन्हें समय, भूत, वर्तमान और भविष्य का प्रतिबिंब भी मानते हैं।
बुद्धि, धन और सफलता का आशीर्वाद पाने के लिए लोग खासतौर पर गणेश चतुर्थी के पर्व पर दूर-दूर से गणपति दर्शन के लिए इस मंदिर में आते हैं।
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