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ऑपरेशन सिंदूर ने आधुनिक युद्ध में वायु शक्ति, मिसाइल और ड्रोन के महत्व को उजागर किया, साथ ही हवाई बढ़त बनाए रखने की चुनौतियों को भी दर्शाया। …और पढ़ें
Operation Sindoor भारत के सैन्य भविष्य के लिए 10 बड़े रणनीतिक सबक (फाइल फोटो)
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर ने आधुनिक युद्ध की नई तस्वीर सामने रखी है। इस अभियान ने दिखाया कि आज के समय में एयर पावर यानी वायु शक्ति शुरुआती लड़ाई में बढ़त दिलाने में बेहद अहम भूमिका निभाती है। सटीक हवाई हमलों, दुश्मन के एयर डिफेंस को कमजोर करने और तेजी से सैन्य ताकत पहुंचाने की क्षमता ने भारत को कई मोर्चों पर बढ़त दिलाई।
हालांकि इस ऑपरेशन ने यह भी साबित किया कि हवाई बढ़त हमेशा स्थायी नहीं रहती। लंबे समय तक एयर सुपीरियरिटी बनाए रखना बेहद मुश्किल और संसाधनों पर निर्भर होता है। एयरक्राफ्ट की सीमित संख्या, रखरखाव और एडवांस सिस्टम जैसे एडब्ल्यूएसीएस की उपलब्धता भी चुनौती बनकर सामने आई।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब सिर्फ ज्यादा लड़ाकू विमान खरीदना काफी नहीं होगा, बल्कि एयरबेस को सुरक्षित बनाना, रनवे की जल्दी मरम्मत, अलग-अलग जगहों पर सैन्य संसाधनों की तैनाती और मजबूत कमांड नेटवर्क तैयार करना भी जरूरी होगा।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिसाइल और ड्रोन युद्ध ने नई रणनीतिक चुनौतियां पैदा कीं। स्टैंड-ऑफ हथियारों और लंबी दूरी की मिसाइलों ने बिना सीधे खतरे में आए हमला करने की क्षमता दी, लेकिन इससे मिसाइल भंडार तेजी से कम होने का खतरा भी बढ़ा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों का बड़े पैमाने पर लगातार उत्पादन जरूरी होगा। इसके लिए मल्टी-लाइन प्रोडक्शन, सप्लाई चेन मजबूत करने और जरूरी उपकरणों की अग्रिम खरीद पर जोर देना होगा।
ड्रोन युद्ध ने भी आधुनिक लड़ाई का स्वरूप बदल दिया है। कम लागत वाले ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन ने दुश्मन पर आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ाया। ऐसे में भारत को अपने ड्रोन निर्माण के साथ-साथ एंटी-ड्रोन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और लेजर आधारित सुरक्षा तकनीक को भी मजबूत करना होगा।
ऑपरेशन सिंदूर ने यह भी दिखाया कि मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम के बिना किसी भी देश की सुरक्षा अधूरी है। एस-400 ट्रायम्फ जैसे सिस्टम ने सुरक्षा कवच दिया, लेकिन सीमित संख्या के कारण हर क्षेत्र को कवर करना संभव नहीं था।
भारतीय वायुसेना और सेना के एयर डिफेंस नेटवर्क के बीच बेहतर तालमेल को इस ऑपरेशन की बड़ी सफलता माना गया। अब भारत प्रोजेक्ट कुशा जैसे स्वदेशी लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम को तेजी से आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में एयर डिफेंस को केवल एक जगह की सुरक्षा तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि पूरे देश में एक जुड़े हुए सुरक्षा नेटवर्क के रूप में विकसित किया जाएगा।
ऑपरेशन सिंदूर में रक्षा सैटेलाइट और स्पेस टेक्नोलॉजी की भूमिका भी बेहद अहम रही। सैटेलाइट आधारित निगरानी, नेविगेशन और कम्युनिकेशन सिस्टम ने भारतीय सेना को सटीक जानकारी और लक्ष्य साधने में मदद की।
रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान को चीन के बेईदोउ सैटेलाइट सिस्टम का फायदा मिला, जबकि भारत मुख्य रूप से नाविक सिस्टम पर निर्भर रहा। हालांकि नाविक भारत और हिंद महासागर क्षेत्र में काफी प्रभावी है, लेकिन इसकी पहुंच सीमित मानी जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के युद्धों में स्पेस आधारित तकनीक निर्णायक भूमिका निभाएगी। ऐसे में भारत को ज्यादा सैटेलाइट, एंटी-जैमिंग तकनीक और सैन्य स्पेस नेटवर्क को तेजी से मजबूत करना होगा।
ऑपरेशन सिंदूर ने यह भी साफ किया कि केवल सरकारी रक्षा उत्पादन मॉडल से आधुनिक युद्ध की जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं। अब एमएसएमई, स्टार्टअप और निजी कंपनियों को रक्षा उत्पादन में बड़ी भूमिका देनी होगी।
रिपोर्ट के अनुसार ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मिसाइल तकनीक में निजी क्षेत्र अहम योगदान दे सकता है। इसके लिए सरकार को लंबी अवधि के ऑर्डर, तेज मंजूरी प्रक्रिया और बेहतर सप्लाई नेटवर्क तैयार करना होगा।
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