Pitru Paksha 2026: आखिर 16 दिनों का क्यों होता है पितृपक्ष? इसके पीछे छिपा है महाभारत काल का रहस्य – Bharat24live

Yuvraj Singh
Date: 28-09-26 16:47
Pitru Paksha 2026 Date: हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है. साल 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर, शनिवार को भाद्रपद पूर्णिमा से होगी और इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा. इस दौरान लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पितृपक्ष की अवधि 16 दिनों की ही क्यों होती है? इसके पीछे पंचांग की तिथियों के साथ-साथ कई पौराणिक मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं.
16 तिथियों से जुड़ा है पितृपक्ष का संबंध
पितृपक्ष की 16 दिनों की अवधि को हिंदू पंचांग की तिथियों से जोड़कर देखा जाता है. पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक कुल 16 तिथियों का चक्र माना जाता है और पूर्वज की मृत्यु जिस तिथि को हुई होती है, उसी तिथि के अनुसार पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस विशेष अवधि में पितरों के निमित्त जल और अन्न अर्पित करने से उन्हें तृप्ति प्राप्त होती है. इसी वजह से पितृपक्ष की प्रत्येक तिथि को श्राद्ध और तर्पण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है.
दानवीर कर्ण से जुड़ी है 16 दिनों की कथा
पितृपक्ष की 16 दिनों की परंपरा को लेकर महाभारत से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा भी प्रचलित है. मान्यता के अनुसार, दानवीर कर्ण की मृत्यु के बाद जब उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंची तो उन्हें भोजन के बजाय सोना-चांदी दिया गया. कारण पूछने पर उन्हें बताया गया कि जीवनभर उन्होंने खूब धन-दौलत का दान किया, लेकिन अपने पूर्वजों के लिए अन्न और जल का तर्पण नहीं किया था. इसके बाद कर्ण को 16 दिनों के लिए पृथ्वी पर लौटने का अवसर मिला, जहां उन्होंने अपने पूर्वजों के लिए तर्पण और दान किया. धार्मिक परंपरा में इसी कथा को 16 दिनों के पितृपक्ष से जोड़कर देखा जाता है.
श्राद्ध और तर्पण का धार्मिक महत्व
पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण को पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने का माध्यम माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान पितरों के निमित्त अन्न, जल और दान करने से उन्हें तृप्ति मिलती है और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है. मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा होने के कारण पितृपक्ष की अलग-अलग तिथियों का अपना महत्व है. वहीं सर्वपितृ अमावस्या को उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध करने का विशेष अवसर माना जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध किसी कारण से निर्धारित तिथि पर न हो पाया हो.
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. भारत 24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.
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