राजीव रंजन झा,दरभंगा। ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में चल रहे हिन्दी सप्ताह का सोमवार को समापन हुआ। राजभाषा हिन्दी के क्रियान्वयन और प्रचार के लिए गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग से जारी निर्देश के आलोक में साप्ताहिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। विभागाध्यक्ष प्रो. विजय कुमार ने बताया कि विभाग की ओर से 14 से 21 सितंबर तक साहित्य की विविध विधाओं कविता, कहानी, उपन्यास, रेखाचित्र, संस्मरण से विद्यार्थियों को रू-ब-रू कराया गया। साप्ताहिक कार्यक्रम की कड़ी में साहित्य की हिन्दी और कार्यालयी हिन्दी के स्वरूप और प्रविधि पर व्याख्यान का भी आयोजन किया गया। हिन्दी सप्ताह के आयोजन श्रृंखला में साहित्यिक प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया, जिसमें विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी, मनोविज्ञान, राजनीतिशास्त्र और भूगोल आदि विभागों से दर्जनों विद्यार्थियों ने भाग लिया। सोमवार को समापन के अवसर पर हिन्दी विभाग में पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित हुआ। इस मौके पर मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. पुनीता झा ने विद्यार्थियों को पुरस्कृत करते हुए प्रतियोगिता में बढ़-चढ़कर भाग लेने के लिए प्रेरित किया। प्रो. झा ने राजभाषा हिन्दी की वर्तमान परिस्थिति पर भी विचार रखते हुए कहा कि हिन्दी विश्व की भाषा बन चुकी है। ऐसे में यह आवश्यक है कि रोजमर्रा के कार्यालयी कार्यों में राजभाषा हिन्दी को अधिकाधिक प्रयोग में लाना चाहिए。
विभागाध्यक्ष प्रो. विजय कुमार ने विद्यार्थियों को साहित्य के विविध विधाओं में रचनात्मक लेखन के लिए प्रेरित किया। कहा कि भाषा केवल बोली नहीं जाती, भाषा को जिया भी जाता है। हिन्दी केवल हमारे भावों को व्यक्त करने का माध्यम ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, संवेदना और पहचान की अभिव्यक्ति भी है। हिंदी प्राचीनतम भाषा है। आमीर खुसरो के ग्रंथों में तथा तुगलक काल मे भी हिंदी का बोलबाला था।
उन्होनें कहा कि विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी का तीसरा स्थान है और यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक एवं भाषाई विरासत की महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। कहा कि हिंदी बोलने या लिखने में किसी प्रकार की हीन भावना नहीं होनी चाहिए। हिंदी हमारा स्वाभिमान है और इसका प्रयोग हमें गर्व के साथ करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व, विचार और आत्मविश्वास के निर्माण की आधारशिला है। भाषाई शुद्धता, स्पष्टता और दृढ़ता व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाती हैं। विशेषकर युवाओं को अपनी भाषा की समृद्धि और शुद्धता पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि मजबूत भाषा-बोध उनके करियर और भविष्य निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने भी राजभाषा हिन्दी के अनुप्रयोग पर विचार रखते हुए साहित्य-लेखन और पाठन की ओर सबका ध्यान आकृष्ट किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. बिन्दु चौहान ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया。
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