वाराणसी, मुख्य संवाददाता। हिंदी आलोचक नामवर सिंह काशी से गहरे जुड़े थे। वह हिंदी आलोचना के गौरव थे जिसकी पुष्टि प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल की किताब ‘आलोचना की जमीन और नामवर सिंह’ करती है। बीएचयू में रविवार को मुक्ताकाशी मंच पुलिया प्रसंग के ‘जनसंवाद’ कार्यक्रम में यह विचार मुख्य अतिथि प्रो. विजयनाथ मिश्र ने व्यक्त किया। उन्होंने प्रो. शुक्ल की किताब का लोकार्पण किया। कहा कि नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य में नई रेखा खींची जिसने कई बार लोगों को असहज किया। इसके बाद भी उनकी स्थापनाओं की चर्चा होती रही। उन्होंने उन्हें नई पीढ़ी का प्रेरणास्रोत बताया।
नामवर सिंह जन्म शताब्दी वर्ष के तहत आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता आलोचक प्रो. कमलेश वर्मा ने की। उन्होंने कहा कि हिंदी आलोचना में नामवर सिंह दिशासूचक यंत्र की तरह थे। प्रो.शुक्ल ने अपनी पुस्तक में इसकी पड़ताल की है। किताब में उनके व्यक्तित्व में नायकत्व की बात है। आत्म वक्तव्य में लेखक प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने ‘आलोचना की जमीन और नामवर सिंह’ को आलोचना पुस्तक ‘नामवर की धरती’ से अलग बताया। कहा कि इसमें नामवर सिंह की आलोचना की काव्यशास्त्रीय जमीन, बनारस से उनके जुड़ाव, हिंदी विभागों के प्रति उनकी राय और उनके लिखे पत्रों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है।
डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने कहा कि प्रो. शुक्ल की किताब नामवर सिंह के आलोचनात्मक वैभव और उनकी स्वीकार्यता की पहचान करती है। रांची के डॉ. उपेंद्र सत्यार्थी ने कहा कि यह जरूरी पुस्तक है। डॉ. शैलेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि इस पुस्तक के बहाने नामवर सिंह के अखिल भारतीय महत्व की पड़ताल की गई है। इस दौरान शिवम यादव, राकेश गुप्त, आलोक गुप्त ने भी विचार साझा किए। स्वागत डॉ. आर्यपुत्र दीपक, संचालन अक्षत पांडेय तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ.उदय प्रताप पाल ने किया।
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