भले ही पृथ्वी वर्तमान में जीवन का एकमात्र ज्ञात घर है, लेकिन 'सुपर-हैबिट-एबल वर्ल्ड्स' ग्रहों की खोज और उनका सिद्धांत …और पढ़ें
(AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)
‘सुपर-हैबिट-एबल वर्ल्ड्स’ पृथ्वी से बेहतर जीवन स्थितियां देते हैं।
K-ड्वार्फ तारे इन ग्रहों के लिए आदर्श ऊर्जा स्रोत हैं।
वैज्ञानिक उन्नत टेलीस्कोप से इन रहस्यमयी ग्रहों की तलाश कर रहे हैं।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अब तक हम यही मानते आए हैं कि सौरमंडल में केवल पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है, जहां जीवन पनप सकता है। हालांकि सामने आए एक नए रिसर्च में यह पता चला है कि ये बात पूरी तरह से सच नहीं है।
ब्रह्मांड में जीवन को लेकर खगोल वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने एक चौंकाने वाली संभावना जताई है। उनका मानना है कि ब्रह्मांड में ऐसे ग्रह भी मौजूद हो सकते हैं, जो इंसानों और अन्य जीवों के रहने के लिए पृथ्वी से भी कहीं अधिक बेहतर और सुविधाजनक स्थिति प्रदान करते हैं। इन ग्रहों को ‘सुपर-हैबिट-एबल वर्ल्ड्स’ नाम दिया गया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, सुपरहैबिटेबल ग्रह वे दुनिया हैं जहां जीवन के विकसित होने और फलने-फूलने के लिए पृथ्वी की तुलना में भी ज्यादा बेहतरीन और स्थिर माहौल मिल सकता है। इसकी वजह है कि ये ग्रह पृथ्वी से लगभग 20 से 30 प्रतिशत अधिक चौड़े और इसके द्रव्यमान से लगभग दोगुने हो सकते हैं।
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि अधिक द्रव्यमान होने के कारण इनका गुरुत्वाकर्षण मजबूत होगा, जिससे वे एक घना वायुमंडल बनाए रख सकेंगे। इससे वहां का मौसम अधिक गर्म और स्थिर रहेगा।
इसके अलावा, एक बड़ा लोहे का कोर एक मजबूत चुंबकीय क्षेत्र पैदा करेगा, जो अंतरिक्ष से आने वाले खतरनाक रेडिएशन से इन ग्रहों की रक्षा करेगा।
बता दें कि पृथ्वी के उष्णकटिबंधीय द्वीप और उथला पानी सबसे भरपूर जीवन चक्र का समर्थन करते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ‘सुपर-हैबिट-एबल वर्ल्ड्स’ ग्रहों पर बड़े क्षेत्रफल में फैले ऐसे ही उथले समुद्र और झीलें हो सकती हैं, जो भारी जैव विविधता को बढ़ावा दे सकती हैं।
अब इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि इन खोजों में सबसे दिलचस्प बात एक खास प्रकार के तारे को लेकर है, जिसे K-ड्वार्फ कहा जाता है। ये तारे हमारे सूरज की तुलना में छोटे, ठंडे और अधिक नारंगी रंग के होते हैं।
खास बात यह है कि ये अपने ईंधन को बहुत धीरे-धीरे जलाते हैं, जिससे ये अरबों-खरबों साल तक लगातार चमक सकते हैं। इसके उलट, हमारा सूरज भविष्य में बूढ़ा होकर और अधिक चमकीला बनकर पृथ्वी को गर्म कर देगा।
बर्लिन में हुई एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला के प्रयोग में यह सामने आया कि K-ड्वार्फ जैसे नारंगी प्रकाश में पौधे जैसे गार्डन क्रेस नकली धूप की तुलना में तेजी से और लंबे बढ़े। इससे यह साबित होता है कि ऐसे तारों के आसपास घूमने वाले ग्रहों पर फोटोसिंथेसिस (प्रकाश संश्लेषण) बहुत प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।
इस बात को ऐसे समझिए कि 2010 के दशक में खगोलविदों रेन हेले और जॉन आर्मस्ट्रांग ने यह विचार रखा था कि जरूरी नहीं कि पृथ्वी ही जीवन के लिए सबसे आदर्श मॉडल हो। पृथ्वी पर जीवन की गाड़ी बहुत ही नाजुक संतुलन पर टिकी है।
इसकी वजह है कि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि पृथ्वी सूरज से थोड़ी भी और पास होती, तो हमारे समुद्र इस तरह कभी बन ही नहीं पाते। इसके अलावा, हमारा सूरज समय के साथ लगातार गर्म और चमकीला होता जा रहा है। ऐसे में अनुमान है कि लगभग 50 करोड़ वर्षों में पृथ्वी इतनी गर्म हो जाएगी कि यहां जटिल जीवन का टिक पाना मुश्किल हो जाएगा।
अब इसके विपरीत, K-ड्वार्फ तारों के चक्कर काटने वाले ग्रह बहुत लंबे समय तक पृथ्वी से कई गुना अधिक समय तक जीवन के अनुकूल बने रह सकते हैं, जिससे वहां जीवों को विकसित होने और अधिक जटिल रूप लेने का अपार समय मिल सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि ऐसे ग्रह मौजूद हैं, तो वहां पौधों और जानवरों जैसे समृद्ध पारिस्थितिक तंत्र पनप सकते हैं। हालांकि, अभी तक इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला है कि सौरमंडल के बाहर जीवन वास्तव में मौजूद है या नहीं।
हालांकि इस बात को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। इसकी वजह है कि भले ही किसी ग्रह पर अनुकूल परिस्थितियां हों, इसका यह मतलब नहीं है कि वहां जीवन अपने आप उत्पन्न हो ही जाए। इसलिए वैज्ञानिक ऐसे ग्रहों की तलाश कर रहे हैं जहां सही तापमान, तरल पानी और वायुमंडल में जैविक गतिविधियों के संकेत मिल सकें।
अब सवाल- इन रहस्यमयी ग्रहों की तलाश कैसे होगी?
गौरतलब है कि खगोलविद अंतरिक्ष की गहराइयों में इन सुपरहैबिटेबल दुनिया को ढूंढने के लिए अत्याधुनिक स्पेस टेलीस्कोप्स की तैयारी कर रहे हैं। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) का PLATO मिशन जिसे 2027 में लॉन्च किया जाना है K-ड्वार्फ के पास बड़े चट्टानी ग्रहों को खोजने में मदद करेगा।
फिर क्या? जेम्स वेब और चिली में बन रहा ‘एक्सट्रीमली लार्जेस्ट टेलीस्कोप’ (ELT) इन ग्रहों के वायुमंडल का अध्ययन कर उनके रासायनिक और जैविक रहस्यों से पर्दा उठाने में मदद करेंगे और अंत: नासा का नियोजित ‘हैबिटेबल वर्ल्ड्स ऑब्जर्वेटरी’ 2040 के दशक तक इस खोज को और आगे बढ़ाएगा।