भारत में 18 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या लगभग 100 करोड़ है। इनमें से कितने लोगों के नाम विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पूरा होने के बाद मतदाता सूची में होंगे? इस सवाल का एक मोटा-मोटा जवाब दिया जा सकता है।
13 बड़े राज्यों की एसआईआर की अंतिम मतदाता सूचियां जारी हो चुकी हैं। राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अनुमानों के अनुसार, 1 मार्च 2026 को इन 13 राज्यों में 18 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों की कुल संख्या लगभग 72 करोड़ थी।
दूसरी ओर, इन राज्यों की एसआईआर की अंतिम मतदाता सूची में कुल 63.5 करोड़ लोगों के नाम हैं। यानी वयस्क आबादी के लगभग 88 प्रतिशत लोगों के नाम अंतिम मतदाता सूची में हैं और 12 प्रतिशत वयस्क सूची से बाहर हैं।
अगर यही अनुपात पूरे भारत पर लागू करें तो अनुमान है कि एसआईआर की अंतिम मतदाता सूची में लगभग 12 करोड़ वयस्कों के नाम नहीं होंगे। हम इन्हें “लापता मतदाता’ कह सकते हैं। अगर अंतिम सूची में कुछ ऐसे नाम भी शामिल हों, जो डुप्लीकेट हों या मृत व्यक्तियों के हों तो इनकी संख्या 12 करोड़ से भी अधिक हो सकती है।
इसका यह मतलब नहीं है कि 12 करोड़ लोग मतदाता सूची से हटाए गए हैं। लापता मतदाताओं की भी दो श्रेणियां हैं। पहली श्रेणी में वे लोग हैं, जिनके नाम पहले मतदाता सूची में थे, लेकिन एसआईआर के दौरान काट दिए गए। हम इन्हें “हटाए गए मतदाता’ कह सकते हैं।
इनमें बहुत से प्रवासी मजदूर होंगे, जिनके नाम उनके पुराने निवास स्थान की मतदाता सूची से हटा दिए गए, लेकिन नए निवास स्थान की सूची में नहीं जोड़े गए। दूसरी श्रेणी में वे लोग हैं, जिनके नाम एसआईआर शुरू होने से पहले भी मतदाता सूची में नहीं थे और अंतिम सूची में भी नहीं हैं।
हम इन्हें “छूटे हुए मतदाता’ कह सकते हैं। इन छूटे हुए मतदाताओं में बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की भी है, जिनके नाम कभी मतदाता सूची में दर्ज ही नहीं हुए।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 2024 में 18 से 29 साल की उम्र के कम से कम 40 प्रतिशत युवाओं के नाम मतदाता सूची में नहीं थे।
इस बात की काफी संभावना है कि इनमें से बहुत से युवाओं के नाम अब भी मतदाता सूची से बाहर हैं। एसआईआर के दौरान इन युवा मतदाताओं के नाम क्यों शामिल नहीं किए गए हैं?
इसकी वजह यह है कि एसआईआर में नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के बजाय नाम हटाने पर ज्यादा ध्यान दिया गया। वास्तव में, तमाम एसआईआर के पहले चरण में सिर्फ नाम हटाने पर ध्यान दिया जाता है।
इस चरण में मतदाता सूची का मसौदा तैयार किया जाता है। इसके लिए बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) उन लोगों के नाम हटाते हैं, जिन्हें वे अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या दोहरे दर्ज पाते हैं।
मसौदा सूची तैयार होने के बाद ही कुछ छूटे हुए मतदाताओं को अपना नाम जुड़वाने का मौका मिलता है। लेकिन तब तक बीएलओ बहुत थक चुके होते हैं।
वे तथाकथित तार्किक विसंगतियों को दूर करने में इतने व्यस्त होते हैं कि उनके पास घर-घर जाकर छूटे हुए मतदाताओं को खोजने का समय या ऊर्जा नहीं बचती।
वयस्क आबादी के मुकाबले लापता मतदाताओं का अनुपात अलग-अलग राज्यों में काफी अलग है। केरल में ऐसे मतदाता बहुत कम दिखाई देते हैं। वहां अनुमानित वयस्क आबादी के 97 प्रतिशत लोगों के नाम एसआईआर की अंतिम सूची में हैं।
इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में अनुमानित वयस्क आबादी और अंतिम मतदाता सूची में दर्ज लोगों की संख्या के बीच 17 प्रतिशत का बहुत बड़ा अंतर है। यह अंतर लगभग 2.8 करोड़ लोगों का है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में चुनाव कैसे कराए जा सकते हैं?
केरल में अनुमानित वयस्क आबादी के 97% लोगों के नाम एसआईआर की अंतिम सूची में हैं। इसके विपरीत, यूपी में अनुमानित वयस्क आबादी और अंतिम मतदाता सूची में दर्ज लोगों की संख्या के बीच 17% का बड़ा अंतर है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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