'दुनिया भारत के प्रधानमंत्री की बात सुनती है क्योंकि….', RSS चीफ मोहन भागवत का बड़ा बयान – AajTak

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने महाराष्ट्र में एक कार्यक्रम को संबोधित करने के दौरान बताया कि संघ का काम शक्ति, संवाद और समाज की सामूहिक चेतना से चलता है. उन्होंने कहा कि विविधता में एकता का आधार है. परंपरा और मूल्यों को भूलना सबसे बड़ा संकट है. 
उन्होंने कहा कि भारत की सभी विचारधाराओं का केंद्र यही भूमि है और सबको साथ लेकर चलने के लिए धर्म आवश्यक है. योगी आदित्यनाथ के शब्दों – “सनातन का उत्थान मतलब राष्ट्र का उत्थान”, का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि समाज का आधार न होता तो हम आज यहां तक नहीं पहुंच पाते.
उन्होंने साफ किया कि संघ ने कभी ‘100 साल पूरे करना’ लक्ष्य नहीं रखा. उद्देश्य हमेशा यह था कि काम जल्द और पूरे समाज को जोड़कर हो. विकास तभी सार्थक है जब वह सबके लिए उपयोगी हो, अन्यथा विनाश की संभावना रहती है.
संघ का काम शक्ति, संवाद और समाज की सामूहिक चेतना से चलता है
मोहन भागवत ने कहा कि संघ का मूल भाव ‘आपलेपना’ यानी अपनापन है. संघ का कार्य केवल संगठन खड़ा करना नहीं, बल्कि समाज में शक्ति, संवाद और सामूहिक जीवन की भावना को मजबूत करना है. उन्होंने कहा कि शक्ति के बिना दुनिया किसी की नहीं सुनती, लेकिन यह शक्ति दंड की नहीं, बल्कि संगठन, अनुशासन और सेवा से पैदा होती है.
‘तीस साल देर से आए’ कहने पर जवाब – हम लगातार आते रहे
संघ प्रमुख ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि कई बार लोगों ने कहा, “आप तीस साल देर से आए.” इस पर उन्होंने कहा कि “हम देर से नहीं आए, हम तो लगातार आते रहे.”
उनके मुताबिक, दिल्ली के व्याख्यान में इसका उल्लेख हुआ. अगर हम 30 साल पहले उन्हें बुलाते, तो वे नहीं आते. लेकिन जब लोगों को एक शक्ति दिखाई दी, तब वे आए. शक्ति का अर्थ किसी पर प्रभुत्व नहीं, बल्कि संवाद और जिम्मेदारी निभाने की क्षमता है. संघ का काम इसी शक्ति पर टिका है.
भारतीय विचार परंपरा: विविधता में एकता का आधार
संघ प्रमुख ने कहा कि भारतीय सोच की जड़ विविधता में एकता है. उन्होंने कहा कि दुनिया का भौतिकवादी विचार, विज्ञान या आधुनिकता बदल सकती है, लेकिन भारत की मूल परंपरा ‘शाश्वत सत्य’ पर आधारित है, जो स्थायी रहती है.
उनके अनुसार, “भारतीय विचार का प्रारंभ बिंदु चेतना, विविधता और एकता का संबंध है. अगर यह संबंध टूटे तो समाज बिखर जाता है, और अगर यह कायम रहे तो धर्म अर्थात सामूहिक जीवन को साधने वाला नियम अपना कार्य करता है.”
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‘वसुधैव कुटुम्बकम’ केवल विचार नहीं, आचरण भी होना चाहिए
मोहन भागवत ने कहा कि समाज को अपने आचरण में यह भावना लानी होगी कि दुनिया एक परिवार है.
उन्होंने कहा, “एकता का अर्थ किसी को बांधना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना है. मानव से लेकर सृष्टि तक, सबके कल्याण की कामना ही धर्म का वास्तविक अर्थ है.”
परंपरा और मूल्यों को भूलना सबसे बड़ा संकट
संघ प्रमुख ने चेताया कि आज की पीढ़ी तेजी से बदलती दुनिया में अपने मूल को भूल रही है. उन्होंने कहा, “हमारी शताब्दियों पुरानी परंपरा ने ही हमें टिकाए रखा है. अगर हमने अपनी जड़ें भूल दीं तो जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा.”
उनके मुताबिक, परिवार से लेकर गांव, जिला, प्रांत और देश सभी व्यवस्था इसी अधिष्ठान पर खड़ी थी.
आज दुनिया भारत के प्रधानमंत्री की बात सुनती है
मोहन भागवत ने कहा कि आज दुनिया भारत के प्रधानमंत्री की बात गंभीरता से सुनती है, क्योंकि भारत की उभरती हुई शक्ति को पूरी दुनिया महसूस कर चुकी है. उन्होंने कहा कि दुनिया भारत से सीखना चाहती है, और यही कारण है कि वह भारत की आवाज़ को महत्व देती है. 
भारत का विकास विश्व कल्याण से जुड़ा है
उन्होंने कहा कि भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि ज्ञान और प्रकाश की परंपरा है. “अगर भारत का विकास सबके विकास का कारण बने तो वही सच्चा विकास है, अन्यथा वह विनाश का प्रतीक बन सकता है,” उन्होंने कहा.
संघ प्रमुख के अनुसार, भारत जब बढ़ता है तो दुनिया को शांति और स्थिरता मिलती है.
संघ कार्यकर्ता की तपस्या, सेवा और कृतज्ञता
संघ प्रमुख ने संघ स्वयंसेवकों की कड़ी मेहनत और समर्पण का उल्लेख करते हुए कहा कि डॉक्टर हेडगेवार और गुरुजी ने जो बीज बोया, वह आज वटवृक्ष बन चुका है.
उन्होंने कहा कि जंगलों, दूर-दराज़ इलाकों और कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले कार्यकर्ता राष्ट्र के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं.
“स्वयंसेवक अपने प्राणों तक की आहूति देकर संघ का कार्य करते हैं. यह भक्ति से अधिक कर्तव्य और शक्ति का काम है,” उन्होंने कहा.
राम मंदिर और राष्ट्रीय मंदिर का भाव
राम मंदिर अब भव्य रूप में खड़ा हो चुका है. ध्वजारोहण भी हो गया है. और इसी के साथ यह संदेश भी उभर रहा है कि देश का “राष्ट्र मंदिर” भी जल्द ही आकार लेगा और वह इससे भी अधिक विशाल और भव्य होगा.
इस पृष्ठभूमि में हनुमान की व्याकुलता एक अलग ही भाव जगाती है. रामचंद्र का भाषण समाप्त होने के बाद हनुमान अपने मन की पीड़ा व्यक्त करते हैं. वे बेचैनी से पूछते हैं, “मैंने ऐसा कौन-सा अपराध किया है कि मुझे यह दंड मिल रहा है? किस बात की सज़ा मुझे विनाश की ओर भेज रही है?

जो कुछ भी घट रहा है, वह तो आपकी ही शक्ति से होता आया है… मेरे भीतर जो अहंकार जन्म ले रहा है, वह भाषण भी क्या आप ही नहीं देते? फिर मेरा अपराध क्या है?”
हनुमान के इन शब्दों में एक गहरी उलझन, आत्मव्यथा और प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण झलकता है. मानो वे अपने अस्तित्व और भूमिका पर सवाल उठा रहे हों.
“मंदिर केवल पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि समाज की शक्ति का आधार है. जैसे राम मंदिर बन रहा है, वैसे ही राष्ट्र मंदिर भी बने. अधिक भव्य, अधिक सुंदर,” वे बोले.
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देश का सामर्थ्य, समाज की एकता से ही खड़ा होगा
मोहन भागवत ने कहा कि संघ का उद्देश्य किसी का विरोध नहीं, बल्कि समाज को संगठित करना है. उनके अनुसार, “जब समाज खड़ा होता है, तो राष्ट्र शक्तिशाली होता है. जब राष्ट्र शक्तिशाली होता है, तभी दुनिया में शांति आती है.”
उन्होंने कहा कि क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और शत्रुता से मुक्त चरित्र ही भारत को विश्व के कल्याण की दिशा में आगे ले जा सकता है.
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