भारत छोड़ो आंदोलन के समय महज 22 साल की एक लड़की ने 'सीक्रेट रेडियो' चलाकर संभाली थी आजादी की कमान। …और पढ़ें
उषा मेहता के साथ और भी सेनानी थे शामिल (Image Source: AI Generated)
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 8 अगस्त 1942 वो तारीख थी जब भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई। अंग्रेजों ने महात्मा गांधी, सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू समेत सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर आंदोलन को दबाने की पूरी कोशिश की, पर आजादी की आग फैल चुकी थी।
उस समय ब्रिटिश अधिकारियों ने संचार के सभी साधनों जैसे अखबार और भाषणों पर भी पूरी तरह से बैन लगा दिया। इसके बावजूद कुछ स्वतंत्रता सेनानी हार मानने वाले नहीं थे और इन्हीं में से एक थी उषा मेहता। वो पूरे भारत में गुप्त रेडियो के माध्यम से खबरें पहुंचा रही थीं।
आंदोलन के सभी बड़े नेता तो जेल में थे लेकिन कांग्रेस के कुछ छोटे-मोटे नेता अभी भी जमीनी स्तर पर काम में लगे हुए थे। बापू की गिरफ्तारी पर भी सबके हौसले पस्त नहीं हुए, सभी ने बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान पर तिरंगा फहराते हुए आंदोलन की आवाज बनने की पुरजोर कोशिश की।
इसी दौरान तय किया गया कि चाहे कुछ भी हो जाए आंदोलन कमजोर नहीं पड़ना चाहिए। इसके लिए पहले सोचा कि अखबार निकाला जाए पर वो सीक्रेट तरीके से घर-घर पहुंचाना संभव नहीं था। ऐसे में अखबार के विचार को त्याग कर रेडियो स्टेशन शुरू करने की बात कही गई। उषा मेहता आगे आईं क्योंकि उन्हें रेडियो की अच्छी-खासी समझ थी।
इस मीटिंग में तय किया गया कि उषा मेहता के साथ ही बाबूभाई ठक्कर, विट्ठलदास झवेरी और नरीमन अबराबाद प्रिंटर गुप्त रूप से रेडियो स्टेशनों का संचालन करेंगे। इन सभी के पास रेडियो चलाने की ट्रेनिंग थी। नरीमन अबराबाद प्रिंटर जहां एक तरफ इंग्लैंड से रेडियो की तकनीक सीखकर आए थे तो वहीं दूसरी तरफ उषा मेहता को सीक्रेट रेडियो सर्विस का एनआउंसर बनाया गया।
इसमें शिकागो रेडियो के मालिक ननका मोटवानी ने बड़ी मदद की। उन्होंने ट्रांसमिशन के लिए कामचलाऊ टूल्स मुहैया करवाए। इस तरह पुराने ट्रांसमीटर को तोड़कर रेडियो अब काम करने लायक बन चुके थे। अब इसके माध्यम से लोगों तक आवाज पहुंचाने की देरी थी।
वैसे तो इस रेडियो स्टेशनन की स्थापना का दिन 14 अगस्त 1942 था, लेकिन इसका पहला प्रसारण उषा मेहता ने अपनी आवाज में 27 अगस्त 1942 को किया था। उनके शब्द कुछ ऐसे थे कि ‘ये कांग्रेस रेडियो की सेवा है, जो 42.34 मीटर पर भारत के किसी हिस्से से प्रसारित की जा रही है’।
फिर देखते ही देखते बापू समेत डॉ. राममनोहर लोहिया, अच्युतराव पटवर्धन और पुरुषोत्तम जैसे कांग्रेस के सभी बड़े नेता इससे जुड़ गए। अफसोस कि उषा मेहता और उनके साथियों को 12 नवंबर 1942 को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया गया। इतिहास में यह बात दर्ज है कि अंग्रेजों ने करीब 6 महीने तक इस बात की खोजबीन की कि आखिर यह रेडियो स्टेशन कैसे चल रहा था।
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