कृपया धैर्य रखें।
भारत और रूस के बीच व्यापार घाटा कम करना एक बड़ी चुनौती है। दिसंबर 2025 की बैठक में भारतीय निर्यात बढ़ाने पर सहमति बनी थी, लेकिन रूस के आयात बास्केट मे …और पढ़ें
पीएम मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन। (फाइल फोटो)
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। दिसंबर, 2025 में जब राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और पीएम नरेन्द्र मोदी के बीच सालाना बैठक हुई तो उसमें द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग को सबसे ज्यादा प्रमुखता दी गई। द्विपक्षीय कारोबार को ज्यादा संतुलित बनाने यानी भारत से रूस को होने वाले निर्यात को बढ़ाने पर सहमति बनी।
लेकिन जब दोनों देशों के अधिकारियों के बीच हाल ही में इस बारे में शुरुआती बातचीत हुई तो यह बात सामने आई है कि भारत से रूस को निर्यात बढ़ाने की चुनौती जितना सोचा गया था, उससे कहीं ज्यादा है। वजह यह है कि रूस के आयात बास्केट (यानि जिन उत्पादों का रूस आयात करता है) में 80 फीसद हिस्से को भारत ने कभी छुआ ही नहीं है। इसमें मशीनरी, उपकरण, परिवहन उपकरण, इलेक्टि्रकल उपकरण, चिप्स व सेमीकंडक्टर, रसायनिक उत्पाद आदि हैं। इन सभी चीजों के आयात के लिए रूस 60-70 फीसद तक चीन पर निर्भर है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि रूस की अगुवाई वाली जल्द ही ईस्टर्न यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (ईएईयू) और भारत के बीच होने मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर होने वाली वार्ता में ये मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाएंगे। ईएईयू में रूस के अलावा आर्मेनिया, बेलारूस, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान शामिल हैं।
वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच व्यापार रिकॉर्ड 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो महामारी से पहले के स्तर से लगभग 5.8 गुना अधिक है। इसमें भारत के आयात (मुख्य रूप से कच्चा तेल, उर्वरक और कोयला) का हिस्सा 63.8 अरब डॉलर के आसपास रहा, जबकि निर्यात केवल 4.9 अरब डॉलर का। भारत का रूस के साथ व्यापार घाटा लगभग 60 अरब डॉलर के करीब पहुंच गया है, जो मुख्य रूप से रूस से भारी मात्रा में कच्चे तेल के आयात के कारण पैदा हुआ है।
दूसरी तरफ, रूस का कुल आयात वर्ष 2024-25 में 280 अरब डॉलर की रही है जिसमें 50 फीसद हिस्सा मशीनरी व रक्षा उपकरणों, 20 फीसद इलेक्ट्रिक उपकरणों, 10 फीसद वाहनों से जुड़े उत्पादों का है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक भारत मशीनरी व परिवहन उपकरणों का निर्यात तो रूस को कर सकता है लेकिन समस्या यह है कि इस क्षेत्र की प्रमुख कंपनियां अमेरिका व यूरोपीय बाजारों में भी भारी निर्यात करती हैं। रूस से कारोबार करने पर उन्हें अमेरिकी व पश्चिमी देशों के प्रतिबंध का सामना करना पड़ सकता है। यह बड़ी वजह है कि भारत व रूस के बीच आपसी करेंसी में कारोबार करने को लेकर भी अधिकांश कंपनियां उत्साहित नहीं है।
इसके बावजूद फार्मास्यूटिकल्स और खाद्य सामग्रियों के निर्यात को बढ़ाने की उम्मीद जताई जा रही है। रूस के कुल कारोबार में दवाओं की हिस्सेदारी 12 फीसद है और भारतीय कंपनियों को इस बाजार में बड़ी हिस्सेदारी मिलने की संभावना है। इसी तरह से रसायन व रबर आयात भी रूस में बढ़ रहा है जहां भारतीय कंपनियों की नजर है।
लेकिन इनका निर्यात बढ़ा कर भी 60 अरब डॉलर का व्यापार घाटा पूरा होता नहीं दिख रहा है। खाद्य सामग्रियों जैसे चावल, चाय और मसालों में भी संभावनाएं हैं लेकिन यहां भी यूरोपीय संघ और अमेरिका के प्रतिबंध इन प्रयासों को बाधित कर रहे हैं।
यह भी पढ़ें: दिसंबर में भारत का रूस से कच्चे तेल का घट सकता है आयात, 2022 के बाद सबसे निचला स्तर